Tuesday, March 30, 2010

आंगनबाडी केन्द्रों पर मांग सकेंगे काम

चूरू 29 मार्च । पारदर्शिता को लेकर हिचकोले खाती महानरेगा की नैया आंगनबाडी केन्द्र पार लगाएंगे। अब आंगनबाडी केन्द्रों पर न केवल नरेगा में कार्यरत श्रमिकों की सूची हर पखवाडे देखी जा सकेगी बल्कि नरेगा में काम मांगने वालों को सरपंच, ग्राम सेवक व ग्राम रोजगार सहायक आदि के चक्कर भी नहीं लगाने पडेंगे। महानरेगा में यह नई व्यवस्था एक अप्रेल से पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चूरू जिले में लागू होगी।
जयपुर में हाल ही सम्पन्न बैठक में पंचायती राज विभाग के मंत्री, महानरेगा की पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व विंग की मुखिया एवं सामाजिक कार्यकर्ता अरूणा राय समेत अन्य अघिकारियों ने चूरू जिला प्रशासन की इस योजना को स्वीकृति दी है।
* केन्द्र पर मांग पत्र
योजना के तहत जिले के प्रत्येक आंगनबाडी केन्द्र पर नरेगा के कम से कम दो सौ मांग पत्र रखवाएं जाएंगे। केन्द्र से कोई भी व्यक्ति काम मांग पत्र प्राप्त करने के साथ ही जमा भी करवा सकेगा। इस काम की देखरेख का जिम्मा आंगनबाडी कार्यकर्ता को सौंपा जाएगा। इसके लिए कार्यकर्ता को प्रतिमाह करीब दो सौ रूपए मानदेय मिलेगा। जिले में पांच सौ की आबादी पर एक आंगनबाडी केन्द्र स्थापित है।

* हर पखवाडे जारी होगी सूची
नरेगा में सौ दिन काम कर चुके तथा कार्यरत श्रमिकों की सूची साल के अंत में पंचायत भवन पर चस्पा की जाती है। जिसमें पारदर्शिता की गुंजाइश कम रहती है। लेकिन अब एक अप्रेल के बाद पंचायत समिति से कम्प्यूटराइज्ड मस्टररोल जारी होने के साथ ही श्रमिकों की सूची आंगनबाडी केन्द्रों पर उपलब्ध करवाई दी जाएगी। जिसे कोई भी व्यक्ति देख सकेगा।

*प्रदेशभर में लागू होने की उम्मीद
पारदर्शिता बनाए रखने व श्रमिकों की ढेरों समस्याओं का समाधान करने वाली यह नई व्यवस्था छह माह बाद प्रदेशस्तर पर लागू होने की उम्मीद है। गत वर्ष सितम्बर में चूरू जिला प्रशासन ने महानरेगा में देश में पहली बार कम्प्यूटराइज्ड मस्टररोल जारी किया था। जिसे वर्तमान में प्रदेशभर में लागू कर दिया गया है।

*यह होगा लाभ
नई व्यवस्था के लागू होने के बाद काम मांगने वालों को ग्राम पंचायत कार्यालय नियमित नहीं खुलने, सरपंच, ग्रामसेवक व ग्राम रोजगार सहायक द्वारा द्वेषता के चलते काम नहीं देने, गांव से पंचायत मुख्यालय तक मीलों का सफर तय करने की समस्या से निजात मिल सकेगी।
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महानरेगा को अघिक पारदर्शी बनाने की यह नई व्यवस्था इस साल एक अप्रेल से पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चूरू में लागू की जा रही है। परिणाम अच्छे रहे तो उम्मीद है कि आगामी छह माह में इसे प्रदेश स्तर पर लागू कर दिया जाएगा।
-डा. केके पाठक, जिला कलक्टर, चूरू

Tuesday, March 23, 2010

नया तंत्र बिजली में फूंकेगा मंत्र

चूरू। ग्रामीण क्षेत्रों में फीडर सुधार कार्यक्रम के सफल क्रियान्वयन के बाद अब निगम ने शहरी रोशनी पर नजर टिका दी है। शहरी क्षेत्रों में वॉल्टेज की समस्या से निजात पाने तथा तकनीकी छीजत घटाने के मकसद से निगम ने नए तंत्र पर काम शुरू कर दिया है।
निगम के नए कार्यक्रम आर-एपीडीआरपी के तहत जिले में पचास हजार से अघिक आबादी वाले छह शहर व कस्बों का चयन किया गया है। कार्यक्रम के तहत चयनित क्षेत्रों के लिए विशेष योजना तैयार कर स्वीकृत के लिए मुख्यालय को भिजवाई जा चुकी है। सब कुछ योजनानुसार हुआ तो शहरी क्षेत्र की विद्युत आपूर्ति व्यवस्था में नई जान आ जाएगी। उपभोक्ताओं को सुचारू बिजली आपूर्ति मिलने के साथ ही तकनीकी छीजत भी घटकर 15 प्रतिशत तक आने की उम्मीद है।
कार्यक्रम में शामिल चूरू, सादुलपुर, सरदारशहर, बीदासर, सुजानगढ व रतनगढ में फिलहाल 25 से 50 प्रतिशत तक छीजत हो रही है। कार्यक्रम के तहत विभिन्न स्थानों पर 33 केवी के नए जीएसएस स्थापित किए जाएंगे। जिला मुख्यालय पर मोचाीवाडा व लाल घंटाघर के पास जीएसएस प्रस्तावित है। इसके अलावा लम्बी लाइन को छोटी करने के लिए चूरू शहर में करीब 70 नए ट्रांसफार्मर लगाए जाने हैं।
ये होंगे काम
* जहां थ्री फेज ट्रांसफार्मर लगाना संभव नहीं वहां पर सिंगल फेज ट्रांसफार्मर लगाए जाएंगे।
* एलटी लाइन को छोटा किया जाएगा ताकि वोल्टेज पूरा मिल सके।
* मुख्य स्थान पर टावर लगाए जाएंगे।
* सामान्य कण्डक्टर की जगह विशेष कण्डक्टर लगेंगे।
* विभिन्न स्थान पर 33 केवी के जीएसएस स्थापित होंगे।
* 11 केवी की नई विद्युत लाइन डाली जाएगी।
* पुराने व डिफेक्टिव मीटर बदलेंगे
* घरों के बाहर लगेंगे मीटर।
शहरी क्षेत्र में सुचारू बिजली की आपूर्ति तथा छीजत का प्रतिशत घटाकर 15 फीसदी तक लाने के लिए मुख्यालय को आर-एपीडीआरपी के तहत प्रस्ताव भेजा है। प्रस्ताव को जल्द स्वीकृति मिलने की उम्मीद है।-एनएम चौहान, अधीक्षण अभियंता, जोधपुर विद्युत वितरण निगम, चूरू

Sunday, March 21, 2010

कली को खिलने दो

मेरी तरह आपका भी दिल चाहता होगा कि घर के किसी कोने में कोई बगिया हो...उसमें अलग-अलग रंगों के ढेरों फूल मुस्कुराते नजर आए...रोजाना एक नई कली खिले और फूल बने...ताकि घर का कोना-कोना महक उठे...घर का हर सदस्य उनकी महक का आदी हो जाए...बारिश, आंधी या तूफान में उन्हें जरा सी भी चोट पहुंचे तो दिल बेचैन हो उठे...घर आने वाले हर मेहमान उनकी तारीफ करते नहीं थके...एक-एक कली मानो जाने-अनजाने मेहमान से बतियातीं दिखे...।
पर हर कली के खिलने का अपना एक मौसम होता है...किसी को खून जमा देने वाली सर्दी प्यारी लगती है तो कोई भीषण गर्मी में भी खिल उठती है...बगिया में शायद ही कभी ऐसी कली खिले...जो हर मौसम में हंसती रहे...उसकी महक हर वक्त हमारे साथ रहे...लेकिन दोस्तों दुनिया बनाने वाला एक ऐसी कली भी बनाता है...जिसकी हम कल्पना कर रहे हैं...जो घर तो क्या हमारी पूरी दुनिया महका सकती हो...पर विडम्बना है कि लोग उस कली को खिलने से पहले उजाड़ रहे हैं...।
उसके लिए अपनी मां की कोख सबसे सुरक्षित जगह है...फिर भी देश के लाखों लोग रोजाना उसके खून से अपने हाथ रंग रहे हैं...मेरे अपने अंचल शेखावाटी के लोग तो काफी पढ़-लिख रहे हैं...शायद यहां पर उस नन्ही की जान लेने वाले बहुत कम होंगे...यह बात सिर्फ दो दिन पहले तक मेरा भ्रम थी...।
स्वयंसेवी संस्था शिक्षित रोजगार केन्द्र की 20 मार्च को सीकर में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस यह खुलासा हुआ कि शेखावाटी में हर साल 46 हजार कन्याओं की गर्भ में ही हत्या कर दी जाती है...और घिनौने कार्य में सीकर जिला पहले पायदान पर है...जहां हर साल 18 हजार कन्या भ्रूण हत्याएं होती हैं...वहीं झुंझुनूं जिले में 15 हजार व चूरू जिले में 13 हजार कन्याओं को जन्म लेने से पूर्व ही मार दिया जाता है...।
शेखावाटी के तीनों जिलों में से चूरू में इस सामाजिक बुराई का आंकड़ा सबसे कम है। दोस्तों सवाल आंकड़ों का नहीं बल्कि यह है कि आखिर यह अपराध खत्म होने का नाम क्यों नहीं ले रहा...क्यों बेटियों से उनका जन्म लेने का हक छीना जा रहा है...? क्यों उन्हें दुनिया में आने से पहले विदा किया जा रहा है...? आखिर 21वीं सदी में भी लोग पुत्रमोह के जाल से मुक्त क्यों नहीं हो पा रहे हैं...? आज तो बेटियां बुलंद हौसलों के दम पर ऊंची उड़ान भर रही हैं...इसके बावजूद लोग उनकी किलकारी सुनना क्यों पसंद नहीं कर रहे हैं...हरके सवाल मन को झकझोर देता है...।
चूरू में भले ही यह आंकड़ा 13 हजार को छू रहा हो...मगर इसका यह मतलब कतई नहीं कि यहां के वाशिन्दे बेटियों से प्यार नहीं करते...चंद उदाहरण देखें तो सबसे पहले नाम जिला कलक्टर डा. केके पाठक का लेना चाहूंगा...हालांकि उनकी शादी हाल ही हुई है...हाल ही उन्होंने कन्या भू्रण हत्या को रोकने का संदेश देता वार्षिक कलेण्डर जारी किया है...जिसमें संदेश के रूप में लिखी कविताएं पढ़कर उस अबोली के प्रति उनकी समझ का अंदाजा सहज लगाया जा सकता है...सारी कविताएं उन्होंने खुद लिखी हैं...इसी कड़ी में दूसरा नाम युवा साहित्यकार दूलाराम सहारण का लेना चाहूंगा जो अपनी नन्ही और प्यारी सी बेटी कृतिका चौधरी के नाम से एक ब्लॉग संपादित कर रहे हैं....दोस्तों इस कड़ी में आपका नाम भी शामिल हो सकता है...।
कन्या भ्रूण हत्या रोकें...दूसरों को भी इसकी रोकथाम के लिए प्रेरित करें।

Wednesday, March 17, 2010

तन्हाई के आलम में...

मैं और मेरी तन्हाई अक्सर मिलकर बातें किया करते हैं...
कि ये प्यार क्यों होता है
प्यार में ये दर्द क्यों होता है
उस दर्द में भी हल्का मजा क्यों होता है
कोई अपना नहीं फिर भी उसका इंतजार क्यों होता है
मैं और मेरी तन्हाई अक्सर मिलकर बातें किया करते हैं....

क्यों भीग जाती है ये पलकें किसी की याद में
क्यों उदास हो जाता है ये दिल किसी की याद में
क्यों बेचैन हो जाता है ये मन किसी की याद में
क्यों नहीं मिलता वो सुकून हमें, तड़प है जिसकी याद में
मैं और मेरी तन्हाई अक्सर मिलकर बातें किया करते हैं...

क्यों हमारी नजर को तलाश एक नजर की है
क्यों हमारी चाहत को तलाश एक चाहत की है
क्यों हमारे दिल को तलाश एक हमसफर की है
क्यों हमारे दिल को तलाश एक अनदेखे सहारे की है
मैं और मेरी तन्हाई अक्सर मिलकर बातें किया करते हैं...

क्यों हर सवाल का जवाब नहीं मिलता हमको
क्यों खुदा से मांगा हर ख्वाब नहीं मिलता हमको
यदि जवाब मिलता है हमें तो वो क्यों पसंद नहीं हमको
क्या यह सच है कि प्यार में ऐसा ही होता है
मैं और मेरी तन्हाई अक्सर मिलकर बातें करते हैं...
कि ये प्यार क्यों होता है
प्यार में ये दर्द क्या होता है
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यह कविता मेरे दोस्त गिरीश जांगिड़ ने मुझे अहमदाबाद से मेल की है। वह एमबीए की पढ़ाई कर रहा है। हम दोनों अपने गांव की एक ही स्कूल में पढ़ा करते थे। एक दिन उसने मेरे ब्लॉग पर 'मैं और मेरी तन्हाई' शीर्षक से प्रकाशित पोस्ट पढ़कर कहा कि यह सब बातें काल्पनिक हैं। इनका वास्तविक जीवन से कोई लेना-देना नहीं। मैंने कहा कि कभी कल्पना करके देखना वास्तविक जीवन की झलक उसमें साफ दिखाई देगी। मैंने उसे 'मैं और मेरी तन्हाई' विषय पर लिखने को कहा। दो दिन बाद उसकी कविता मेरे सामने थी।
दोस्तों, क्या आपकों नहीं लगता कि इस कविता में कहीं ना कहीं किसी ना किसी की वास्तविकता छुपी हुई है। किसी का दर्द इससे बयां हो रहा है। काफी हद तक यह युवा दिलों की कहानी लग रही है। हम में से पता नहीं कितनों की यह आपबीती हो सकती है। प्यार में तन्हाई ना हो, भला ऐसा भी कभी हो सकता है।
दोस्तों, बिन मांगे एक छोटी सी सलाह देना चाहूंगा कल्पना का कभी मन में गला मत घोट देना, क्योंकि खुदा हर किसी को कल्पनाशील नहीं बनाता। कभी अपने मन को टटोलना कल्पना खुद आपके सामने होगी। यदि ऐसा होता है तो उसे शब्दों के पंख लगाने में देर मत करना। ताकि उड़ सके वो नीले गगन में।
दोस्तों, शायद आप यकीं नहीं करोगे कि मैंने तन्हाई को अपना सबसे अच्छा दोस्त बना रखा है। जब मैं तन्हा हो जाता हूं तो वह हर बार पूरी शिद्दत से मेरा साथ देती है। तन्हाई एक दिन बता रही थी कि उसके किसी भी दोस्त को उससे शिकायत नहीं है और ना ही कोई गिला-शिकवा।
दोस्तों मेरी तन्हाई को मैंने शब्द कुछ यूं दिए....
यहां पर देखें

http://vishwanathnews.blogspot.com/2010/02/blog-post_3007.html
आपकी भी कोई कल्पना हो तो जरूर लिखना

Thursday, March 11, 2010

जाळों ने रोका पानी का प्रवाह

अब दो दिन से मिलेगा पानी, पर्याप्त आपूर्ति भी नहीं संभव
चूरू, 11 मार्च। गर्मी अभी बढऩी शुरू ही हुई है कि पीने के पानी की कमी से लोगों के कण्ठ सूखने लगे हैं। जलदाय विभाग ने चूरू में अब 48 घंटे में जलापूर्ति शुरू कर दी है। उपलब्ध मीठे पानी की भी स्थिति यह है कि आने वाले दिनों में इतना भी पानी आपूर्ति नहीं किया जा सकेगा जितना अब तक किया जा रहा था। यानि जलापूर्ति का अंतराल भी बढ़ गया और पानी की उपलब्ध मात्रा भी घट गई। ऐसा प्रकृति प्रदत्त बरसात की कमी से तो है ही इसके अतिरिक्त विभागीय अनदेखी और प्रशासनिक लापरवाही बरते जाने से भी है।
जानकारी के अनुसार हनुमानगढ़ के गांव गंधेली से मसीता वाली हैड के बीच रावतसर वितरिका तथा गंधेली से कर्मसाना व ललानिया कैनाल की लम्बे समय से सफाई नहीं की गई है। इससे कैनाल और वितरिकाओं में पेड़-पौधे उग आए हंै। जाळे व मिट्टी (गाद) जमा होने से जल प्रवाह क्षमता प्रभावित हो गई है। हालात यह है कि एक दिन में पचास क्यूसेक के बजाय आठ-नौ क्यूसेक पानी ही उपलब्ध हो पा रहा है।आधिकारिक जानकारी के अनुसार यह सब विभागीय क्षेत्राधिकार की लड़ाई में लम्बित रहा। वितरिकाएं सिंचाई विभाग क्षेत्राधिकार में है जबकि कैनाल जलदाय विभाग के क्षेत्राधिकार में आती है। इनमें सामान्य तौर पर प्रति दो माह में सफाईकी जानी चाहिए थी। लेकिन प्रशासनिक स्तर पर इस ओर उच्चाधिकारियों को ध्यान दिलाए जाने के बाद भी कतई गंभीरता से नहीं लिया गया।
मोटे तौर पर देखा जाए तो 'बाड़ खेत ने खायÓ वाली कहावत आपणी योजना पर सटीक बैठ रही है। गर्मियों की शुरुआत में ही योजना की जलापूर्ति व्यवस्था गड़बड़ा गई है। चूरू-बिसाऊ परियोजना के शहरी व ग्रामीण क्षेत्र को दो दिन में एक बार मीठा पानी दिया जाने लगा है। निकट भविष्य में अन्य क्षेत्रों की जलापूर्ति में भी कटौती की जा सकती है। इंदिरा गांधी नहर से जुड़ी वितरिकाओं व कैनाल में घटते जल प्रवाह के चलते जल्द राहत मिलने की उम्मीद नहीं है। ऐसे में गर्मियों में मीठे पानी की भंयकर किल्लत रहने की आशंका पैदा हो गई है।

45 की बजाय 10 क्यूसेक
जिले में मीठे पानी की जलापूर्ति सुचारु बनाए रखने के लिए इंदिरा गांधी नहर से रोजाना 45 क्यूसेक पानी की आवश्यकता है। जबकि इन दिनों महज 10 क्यूसेक पानी मिल पा रहा है। हालांकि नहर से पानी तो छोड़ा जा रहा है, लेकिन वितरिका व कैनाल की सफाई के अभाव में पानी पहुंच नहीं पा रहा है।

चूरू-बिसाऊ परियोजना
सबसे अधिक परेशानी चूरू-बिसाऊ परियोजना से जुड़े उपभोक्ताओं को होगी। परियोजना को रोजाना 18 हजार किलोलीटर पानी की तुलना में 7 हजार किलोलीटर पानी मिल रहा है। वह भी एक दिन के अंतराल से आपूर्ति किया जा रहा है। गत गर्मियों में रोजाना 15 हजार किलोलीटर से अधिक पानी मिला था।
सन्तोष गुप्ता/विश्वनाथ सैनी

Monday, March 8, 2010

बुलंद हौसलों की उड़ान

महिला दिवस पर कुछ खास
महिला दिवस पर राजस्थान पत्रिका के चूरू पुलआउट में छपे इस लेख को अच्छी तरह देखने के लिए यहां क्लिक करें http://1.bp.blogspot.com/_6pKtENkBGKk/S5SS4CM2p8I/AAAAAAAAAeI/jKsuJSVy-qs/s1600-h/Page+2+copy.jpg

हिसाब-किताब

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