Saturday, May 29, 2010

'गजलर' बुझाएंगे प्यास

पांच स्थानों का चयन, सालभर मिल सकेगा पानी
विश्वनाथ सैनी @ चूरू।
वन्यजीवों को भीषण गर्मी में प्यास बुझाने के लिए अब जंगल में ज्यादा नहीं भटकना पड़ेगा। वन विभाग ने वन्यजीवों के पानी के लिए होने वाले पलायन को रोकने तथा वन सम्पदा को संरक्षित और संवद्धित बनाने के लिए महती योजना बनाई है।
जयपुर के डेली न्यूज़ में छपी खबर

इसके तहत वन क्षेत्रों में पानी के ऐसे कुण्ड विकसित किए जाएंगे जहां बरसात का पानी एकत्र कर वन्य जीवों को सालभर पानी उपलब्ध कराया जा सकेगा। विशेष तौर पर बनने वाले कुण्डों को गजलर कहा जाएगा।
शुरुआती चरण में तालछापर कृष्णमृग अभयारण्य समेत वन क्षेत्र में पांच स्थानों का गजलर के लिए चयन किया गया है। योजना सफल रही तो इनकी संख्या बढ़ाई जाएगी। समस्त गजलर राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के माध्यम से विभाग की ईको रिस्टोरेशन योजना के तहत बनेंगे। विभाग ने गजलर के प्रस्ताव हाल ही मुख्यालय को भिजवाए

हैं।

चालू वित्तीय वर्ष में इनका निर्माण कार्य शुरू होने की उम्मीद है।
वन क्षेत्र में वन्यजीवों के लिए वर्तमान में बने जलस्रोतों की तुलना में गजलर में 35 से 40 हजार लीटर से अधिक पानी संग्रहित किया जा सकेगा। बारिश के पानी से एक बार गजलर भर जाने पर सालभर तक पानी की कमी नहीं रहेगी। बारिश नहीं हुई तो टैंकर के जरिए गजलर को भरा जा सकेगा।

बूंद-बूंद आ सकेगी काम
गजलर का डिजाइन इस तरह तैयार किया गया है, जिससे बारिश के पानी की बूंद-बूंद वन्यजीवों के काम आ सकेगी। बारिश का पानी सबसे पहले चालीस हजार लीटर क्षमता के एक कुण्ड में जमा होगा। कुण्ड ऊपर से बंद होगा, लेकिन उसके पास बनने वाले विशेष घाट में कुण्ड का पानी पहुंचेगा, घाट पर पानी की उपलब्धता कुण्ड में भरे पानी के दबाव के अनुपात में कम-ज्यादा होती रहेगी। इससे पानी की छीजत नहीं होगी।जहां वन्यजीव हलक तर कर सकेंगे।

चयन का रखा खास आधार
वन विभाग ने गजलर निर्माण के चयन का खास आधार रखा है। गजलर उन स्थानों पर बनाया जाएगा जहां वर्तमान में वन सम्पदा की स्थिति खराब है। पेड़-पौध, झाड़, खरपतवार, घास आदि विकसित नहीं हो पा रही है। साथ ही वहां पानी के अभाव में वन्यजीवों को विचरण नहीं हो पाता है। गजलर के निर्माण से वन्यजीव पानी पीने तो वहां पहुंचेंगे ही साथ ही पानी होने पर आस-पास के क्षेत्र में बीजारोपण के माध्यम से पौध, घास आदि विकसित कर क्षेत्र को हराभरा किया जा सकेगा।

कटाई व चराई पर प्रतिबंध
नए सिरे से विकसित किए गए क्षेत्र में पौधों व पेड़ों की कटाई व चराई पर प्रतिबन्ध रहेगा। इनक्षेत्रों को तारबंदी कर सुरक्षित किया जाएगा। ग्रामीण इलाकों से लगते क्षेत्र में पक्की दीवार का निर्माण कराया जाएगा।

चयनित वन क्षेत्र
-लीलकी बीड़
-सांखू बीड़
-तालछापर कृष्णमृग अभयारण्य
-तारानगर बीड़
-ढाणी लालसिंह पुरा बीड़

जिले में वन्यजीव
काले हरिण -2025
चिंकारा -2705
नीलगाय -1036
जंगली बिल्ली -129
मरु लोमड़ी -124
गिद्ध -48
चील/बाज -141
साण्डा -4109

इनका कहना है...
महानरेगा के माध्यम से ईको रिस्टोरेशन योजना के तहत गजलर निर्माण के प्रस्ताव मुख्यालय को भेजे हैं। प्रस्ताव को मंजूरी मिलते ही निर्माण कार्य शुरू करवा देंगे। जिले में गजलरों की शुरुआत पांच स्थानों से होगी।
-केसी शर्मा, डीएफओ, चूरू

Wednesday, May 26, 2010

पढ़बा सूं रैग्या टाबर

सर्वे में हुआ खुलासा, सर्वाधिक सरदारशहर में
नए शिक्षा सत्र से जोडऩे के होंगे खास प्रयास

विश्वनाथ सैनी @ चूरू
जिले में करीब सात हजार बच्चे शिक्षा से महरूम हैं। इनमें अधिकांश ने तो स्कूल की दहलीज पर कभी कदम ही नहीं रखा जबकि शेष ने बीच में पढ़ाई छोडऩे के बाद फिर कभी स्कूल की सुध नहीं ली। सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से हाल ही करवाए गए चाइल्ड ट्रेकिंग सर्वे में यह आंकड़ा सामने आया है।
सर्वे के दौरान बच्चे पढऩे-लिखने की उम्र में घरेलू कामों में जुटे अथवा गली-मोहल्लों में मटरगस्ती करते मिले। परिवार की माली हालत खराब होने के कारण कई बच्चे कहीं ना कहीं मजदूरी करते भी पाए गए। सर्वे में इन बच्चों को अनामांकित व ड्रापआउट के रूप में चिह्नित किया गया है। अब नए शिक्षा सत्र में इन बच्चों को शिक्षा की मुख्य धारा से जोडऩे के विशेष प्रयास किए जाएंगे।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार जिलेभर में कुल 6 हजार 956 बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। छह से चौदह साल तक के इन बच्चों में से अधिकांश कभी स्कूल नहीं गए। शेष ने स्कूल में कभी ना कभी दाखिला तो लिया लेकिन आठवीं कक्षा से पूर्व ही पढ़ाई छोड़ दी।
शिक्षकों ने विद्यालय रिकॉर्ड तथा घर-घर जाकर बच्चों का सर्वे किया है। पढ़ाई से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रखने वाले सबसे अधिक 1 हजार 795 बच्चे सरदारशहर ब्लॉक तथा सबसे कम 276 बच्चे सादुलपुर ब्लॉक में सामने आए हैं।

नए सत्र मे पढ़ाएंगे
सर्वे में चिह्नित किए गए बच्चों का जुलाई से शुरू हो रहे प्रवेशोत्सव के दौरान स्कूलों में दाखिला करवाने का प्रयास किया जाएगा। अभिभावकों को बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित भी करेंगे। इसके अलावा आवासीय ब्रिज कोर्स, गैर आवासीय ब्रिज कोर्स, शिक्षा मित्र केन्द्र, कस्तूरबा गांधी विद्यालय आदि में भी बच्चों के लिए पढऩे-लिखने की वैकल्पिक व्यवस्था की जाएगी।

कहां कितने वंचित
ब्लॉक बच्चे
तारानगर- 1025
सरदारशहर- 1795
राजगढ़- 276
चूरू- 670
रतनगढ़- 1680
सुजानगढ़- 1510
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16 से 21 मई तक हुए सर्वे के दौरान जिले में करीब सात हजार बच्चे अनामांकित व ड्रापआउट हैं। सर्वे की रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को भेज दी है। नए शिक्षा सत्र में इन बच्चों को पढ़ाया जाएगा।
-मोहन लाल त्रिवेदी, प्रभारी अधिकारी, वैकल्पिक शिक्षा (एसएसए) चूरू

Tuesday, May 25, 2010

तपिश से बुझेगी धोरों की प्यास

इस बार अच्छी बारिश के आसार
मानसून एक जुलाई तक आने की उम्मीद

कार्यालय संवाददाता @ चूरू. थळी में पड़ रही भीषण गर्मी भले ही लोगों के पसीने छुड़ा रही हो, लेकिन यह अच्छी बारिश का संकेत भी है। सब कुछ ठीक रहा तो इस बार थळी के धोरों की प्यास पूरी तरह बुझ सकेगी। थळी की भौगोलिक एवं पारस्थितिकी स्थितियां इस तरह की हैं कि यहां जितनी तेज गर्मी पड़ती है उतनी ही अधिक बारिश की संभावना बनती है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार इस बार गत वर्षों की तुलना में इन्द्रदेव अधिक मेहरबान होने के आसार बन रहे हैं।
चूरू में इस सत्र का सर्वाधिक तापमान 48 .4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया जा चुका है। इसके अलावा सर्दियों में इस बार गत वर्ष की तुलना में अधिक बर्फबारी हुई थी। फिलहाल अधिकतम तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है।
साथ ही आंधियों के चलने का क्रम भी जारी है। ऐसे में प्रदेश के पश्चिमी इलाके में निम्न दबाव का क्षेत्र बनता जा रहा है। जो पूर्व की ओर से आने वाले मानसून को तेजी से अपनी ओर खींचेगा। पूर्व से मानसून के दिल्ली व हरियाणा होते हुए 25 जून तक प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में दस्तक देने की उम्मीद है। शेखावाटी में मानसून के 1 जुलाई को पहुंचने का अनुमान है।
तो झूमके बरसेंगे बदरा
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार वर्तमान में जिले की परिस्थितियां अच्छी बारिश के अनुकूूल हैं। जब-जब भी ऐसे ही हालात बने हैं। तब-तब प्रदेशभर के खेतों में बदरा झूमकर बरसे हैं। इसके अलावा अगर जून में ज्यादा बारिश ना हो तो अच्छा है। क्योंकि इससे पश्चिमी इलाकों में निम्न दबाव का क्षेत्र बना रहे ताकि जून के अंतिम सप्ताह में पूरे वेग के साथ मानसून प्रदेश में पहुंच सके।
मिट्टी की करामात
थळी के धोरों की मिट्टी की करामात के कारण जिले को सर्दियों में कड़ाके की ठण्ड और गर्मियों में भीषण गर्मी की सौगात मिली है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार जिले की मिट्टी की स्पेसिफिक हीट कैपेसिटी काफी कम है। इस वजह से गर्मियों में मिट्टी जल्दी गर्म और सर्दियों में जल्दी ठण्डी हो जाती है।
बारिश का रास्ता
प्रदेश में बंगाल की खाड़ी से उठने वाला मानसून मेहरबान होता है। खाड़ी से चलकर मानसून हिमालय की वादियों में पहुंचता है। यहां से बर्मा की पहाडिय़ों से टकराने के बाद पूर्व से पश्चिम की ओर रुख करता है। पश्चिम की ओर पहुंचते-पहुंचते मानसून कमजोर पड़ता जाता है। पश्चिमी इलाकों में जितना अधिक निम्न दबाव का क्षेत्र बनेगा। मानसून भी उतनी तेजी के साथ दस्तक देगा।
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इस बार मानसून पूरी तरह मेहरबान होने की संभावना है क्योंकि लगातार आंधियां चल रही है और सर्दियों में बर्फबारी भी ज्यादा हुई है। साथ ही तापमान भी बढ़ रहा है। कुल मिलाकर परिस्थितियां मानसून को बुलाने के अनुकूल है।
- जिलेसिंह राव, प्रभारी अधिकारी, मौसम केन्द्र, चूरू

Wednesday, May 12, 2010

दवा खरीद में नियम हवा

चूरू सहकारी उपभोक्ता होलसेल भण्डार की दवा की दुकानों पर दवाइयो की आड में भ्रष्टाचार की बेल पनप रही है। जिला प्रशासन की ओर से गठित एक विशेष कमेटी की जांच में यह खुलासा हुआ है। जिले में होलसेल भण्डार की 11 दुकानों के लिए प्रतिवर्ष करोडों रूपए की दवाइयां बिना किसी निविदा प्रक्रिया अपनाएं खरीदी जा रही हैं।
वित्तीय वर्ष 2009-10 में दो करोड 13 लाख 73 हजार रूपए की दवाइयां बिना निविदा के खरीदी गई हैं। इनमें साठ से सत्तर फीसदी दवाइयां ब्रांडेड हैं, जो जेनरिक दवा के मुकाबले दो-तीन गुना अघिक महंगी होती हैं। जबकि होलसेल भण्डार की दुकानों पर अघिक से अघिक जेनरिक दवाइयां ही होनी चाहिए, ताकि रोगियों को सस्ती दर पर दवाइयां उपलब्ध हो सके।
यूं हुआ खुलासा
दस दिन पूर्व जिला कलक्टर डा. केके पाठक ने राजकीय भरतीया अस्पताल स्थित उपभोक्ता होलसेल भण्डार के तीन नम्बर मेडिकल स्टोर का औचक निरीक्षण किया तो वहां जेनरिक के स्थान पर ब्रांडेड दवाइयां बिकती मिली। इस पर पाठक ने उपखण्ड अघिकारी उम्मेद सिंह, माध्यमिक शिक्षा उपनिदेशक कार्यालय के एएओ देवीदत्त पारीक, राजकीय भरतीया अस्पताल के कनिष्ठ लेखाकार रतनलाल सैनी, डा. बीएल नायक तथा कोषाघिकारी अंजू गोयल की एक कमेटी गठित कर मामले की जांच करवाई। फिलहाल कमेटी वर्ष 2009-10 में खरीदी गई दवाओं के नाम, दर, मात्रा समेत अन्य बिन्दुओं की जांच कर रही है।
प्रदेश भर में गडबडझाला
निरीक्षण के बाद होलसेल भण्डार ने कारण बताओ नोटिस के जवाब में माना कि दवा की खरीद में गडबडझाला चूरू ही नहीं बल्कि प्रदेश भर में हो रहा है। दवा खरीदने में कहीं पर भी निविदाएं आमंत्रित नहीं की जाती। प्रदेश में होलसेल भण्डार की दवा की करीब 520 दुकानें हैं। गत वित्तीय वर्ष के दौरान पडोसी जिले सीकर में एक करोड 75 लाख तथा झुंझुनूं में 2 करोड 4 लाख 82 हजार रूपए की दवाइयां इसी तरह से खरीदी गई हैं।
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चिकित्सक ब्रांड बदल-बदल कर दवाइयां लिखते हैं। इसलिए निविदा प्रक्रिया संभव नहीं है। जेनरिक दवाइयों की मांग काफी कम है। प्रशासन के निर्देश पर अब निविदा प्रक्रिया शुरू करने तथा जेनरिक दवाओं की मात्रा बढाने की तैयारी कर रहे हैं।
-रामावतार स्वामी,
अघिशासी अघिकारी (कार्यवाहक),
सहकारी उपभोक्त होलसेल भण्डार, चूरू
भण्डार की दुकानों पर बडे पैमाने पर अनियमितताएं हैं। यह सब मिलीभगत से हो रहा है। प्रारम्भिक जांच में गत वित्तीय वर्ष के दौरान दो करोड से अघिक की दवा बिना निविदा के खरीदने की जानकारी मिली है। कमेटी से मामले की विस्तृत जांच करवा रहे हैं। दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेंगे। -डा. केके पाठक, जिला कलक्टर, चूरू

लीबिया में कामगारों पर संकट

मजदूरों को ना तो पगार मिली है और ना ही राशन
चूरू, 11 मई।
खाड़ी देश लीबिया में कमाने गए भारतीय मजदूर संकट में हैं। एक निजी कम्पनी ने मजदूरों को बंधक बना रखा है। पांच माह से मजदूरों को ना तो पगार मिली है और ना ही राशन। मजदूर समुद्र का खारा पीने तथा राहगीरों से भीख मांगने को मजबूर हैं।
देशभर के करीब सौ मजदूरों को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा रहा है। इनमें चूरू जिले के सोलह मजदूर शामिल हैं। मजदूरों ने सोमवार को अपने परिजनों को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत करवाया है। परिजनों ने मंगलवार को जिला कलक्टर डा. केके पाठक से मुलाकात कर मजदूरों की रिहाई की गुहार लगाई है।
परिजनों की ओर से कलक्टर को सौंपे गए ज्ञापन में लिखा है कि लीबिया में अल एकलेल कॉन्ट्रेक्ट कम्पनी ने मजदूरों का भुगतान रोककर उन्हें चार दीवारी में बंद कर रखा है। मजदूर सीकर जिले की फतेहपुर तहसील के गांव अठवास निवासी एजेंट सांवरमल झाझडिय़ा के माध्यम से नौ माह पहले लीबिया गए थे।
प्रोजेक्ट पूरा हो गया
जानकारी के अनुसार कम्पनी विला निर्माण के एक प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी। करीब दो माह पहले प्रोजेक्ट पूरा हो गया। नया प्रोजेक्ट शुरू नहीं हो पाने के कारण मजदूरों को ना तो रोजगार मिल पा रहा है और ना ही बकाया पगार।
आधे से ज्यादा शेखावाटी के
मजदूरों को लीबिया भेजने वाले एजेंट झाझडिय़ा की मानें तो अल एकलेल कॉन्ट्रेक्ट कम्पनी में ऐसी स्थिति का सामना चूरू जिले के सोलह मजदूर ही नहीं बल्कि देशभर के करीब सौ मजदूरों को करना पड़ रहा है। इनमें से पचास-साठ मजदूर अकेले शेखावाटी के हैं। विला निर्माण का प्रोजेक्ट पूरा होने तथा नया प्रोजेक्ट शुरू होने में हो रही देरी के कारण मजदूर परेशान हैं। मजदूर बकाया मजदूरी की मांग को लेकर कम्पनी का राशन लेने से भी इनकार कर रहे हैं।
ये हैं वो मजदूर
सोलह मजदूरों में चूरू तहसील के गांव जुहारपुरा का भींवाराम, भागीरथ मल, धीरासर का राजूराम, रायपुरिया का प्रभूदयाल, तारानगर तहसील के गांव सोमसीसर का मेधाराम, रतनगढ़ तहसील के गांव गोगासर का पूर्णमल, सेहला का बजरंग, चैनपुरा का भजनलाल, नरेश कुमार, रघुनाथपुरा का बृजलाल, खिलेरिया का आसूदास, लोहा का तोलाराम, लधासर का मेंधाराम, नागरमल, सुजानगढ़ तहसील का गणेशाराम यादव, गांव भींवसर का बेगाराम शामिल है।
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लीबिया गए सोलह मजदूरों के परिजनों ने उन्हें रिहा कराने की मांग की है। इस संबंध में प्रमुख सचिव को लिखा गया है। साथ ही पुलिस को मामले की जांच के निर्देश दिए हैं। -डा. केके पाठक, जिला कलक्टर, चूरू

Friday, May 7, 2010

मां तुझमें रब दिखता है...

मां...बस तुम्हारा नाम लेने भर से रूह को सुकून मिल जाता है...तुम्हें दूर से भी देख लूं तो फिर दुनिया में कुछ देखने की हसरत नहीं रहती...तेरी परछाई में भी मैं अपना वजूद ढूंढ लेता हूं...तेरी धुंधली तस्वीर में भी मुझे अपना अक्श साफ नजर आता है...तेरे आंचल की ओट मिल जाए तो जेठ की तपती दुपहरी हो या पौष की सर्द रात बिना उफ किए गुजार दूं...तू रख दे अगर हाथ सिर पर तो फिर जमाने से मुझे कुछ नहीं चाहिए...मैं तो तेरा स्पर्श पाकर ही निहाल हो उठता हूं।

सच में मां तुम ऐसी थीं...ऐसी हों और खुदा के वास्ते ऐसी ही रहना...। बचपन से मुझे लगता आया है कि भले ही तुम्हारे चेहरे पर झुर्रियां 
पड़ जाए...बाल झक सफेद हों जाए...पर तुम्हारा प्यार कभी कम नहीं होगा। मां में कई बार सोचता हूं कि जब मैंने बचपन में तुतलाती जुबान से पहली बार तुम्हें 'मां' कहकर पुकारा तो तू शायद हँसी होगी या फिर मेरी नकल की होगी...यह तो तू ही जानें...पर मैं दावे से कह सकता हूं कि तेरी हँसी में भी सुखद अहसास था...तेरी नकल ने मुझे कुछ और शब्द सीखने को प्रेरित किया होगा।

जब मैंने चलने के लिए पहली बार जमीन पर कदम बढ़ाया तो मेरे नन्हें हाथों ने तेरी अंगुली जरूर थामी होगी...मुझे पल भर के लिए भी गिरने नहीं दिया होगा...या कभी लडख़ड़ाकर गिर भी गया तो तुमने आंसू नहीं आने दिए होंगे...। तुम्हारे हाथों का स्पर्श ही मेरी चोट पर मरहम का काम कर गया होगा...।

मां मैं तुम्हारे लिए तो वहीं नन्हा बच्चा हूं...और रहूंगा, पर दुनिया की नजर में मैं 23 होली, दिवाली और बसंत देख चुका हूं...मुझसे लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं...पढऩे वाला हर बंदा सोच रहा होगा कि आज एकाएक मुझे तुम्हारी याद कैसे आ गई...तेरे नाम पर मेरी कलम क्यों चल पड़ी...।

बता दूं कि मां मैं तुझे शब्दों में ढालना चाहता हूं...तेरी यादों को फिर से दिल के करीब लाने की चाहत है मेरी...मुझे तेरा प्यार भरा स्पर्श आज भी याद है...तेरे हाथ की रोटी का कसेला स्वाद तो मैं कैसे भूल जाऊं...तेरी डांट-फटकार में भी प्यार छिपा होता था...जिसे भूल जाना मेरे बस की बात नहीं...।

मेरे बचपन में ही पिताजी के गुजरने का गम तो मुझे ताउम्र सालता रहेगा पर तुमने कभी उनकी कमी महसूस नहीं होने दी...मां होते हुए तुमने मुझे पिता का भी प्यार दिया...। आज मैं जहां भी हूं...जिस हाल में भी हूं...सब का श्रेय लेने का हक है...तुम्हें। सच कहूं तो मां तुझमें रब दिखता है...।

Saturday, May 1, 2010

18 सौ अंकतालिका रद्दी की टोकरी में

डाइट स्टाफ की भूल, संस्था प्रधानों की लापरवाही
सैकड़ों परीक्षार्थियों का परिणाम प्रभावित
चूरू, 30 अप्रेल। आठवीं बोर्ड परीक्षा को गंभीरता से नहीं लेने की वजह से इस बार अठारह सौ परीक्षार्थियों की अंकतालिकाएं रद्दी की टोकरी में डाल दी गई हैं। यह सब डाइट कर्मचारियों की मानवीय भूल व संस्था प्रधानों की लापरवाही के चलते हुआ है।
हैरत की बात है कि जहां डाइट परीक्षार्थियों की मूल अंकतालिका में बोनस अंक दर्ज करना ही भूल गया तो संस्था प्रधान सत्रांक तक सही नहीं भेज पाए। हालांकि डाइट ने अब त्रुटियां सुधारकर प्रभावित परीक्षार्थियों को नई अंकतालिकाएं जारी कर दी हैं।
इससे कई परीक्षार्थी फेल से पास तो कई फेल पूरक की श्रेणी में आ गए हैं। जिलेभर के कुल 1 हजार 798 परीक्षार्थियों का परिणाम प्रभावित हुआ है। अंकतालिकाओं की त्रुटियां सुधरवाने से परीक्षार्थियों को नुकसान की बजाय फायदा ही हुआ है, लेकिन परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद परीक्षार्थियों और उनके अभिभावकों को मानसिक रूप से तो परेशान होना ही पड़ा है। इसकी कोईजवाबदेही तय नहीं की गई है।
गौरतलब है कि बोर्ड परीक्षा परिणामों के तनाव के कारण विद्यार्थियों में बढ़ती आत्महत्या करने की प्रवृति पर प्रभावी अंकुश के मद्देनजर केन्द्र और राज्य सरकार बोर्ड परीक्षा प्रक्रिया ही बदलने जा रही है।
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परीक्षार्थी ऐसे हुए प्रभावित
डाइट ने किसी विषय में सत्रांक समेत कुल 35 अंक हासिल करने वाले परीक्षार्थियों को बोनस के रूप में एक अंक दिया था, जो तकनीकी खामी की वजह से अंकतालिका में दर्ज नहीं किया जा सका। इससे 778 परीक्षार्थियों का मूल परीक्षा परिणाम तो 718 का पूरक परीक्षा परिणाम प्रभावित हुआ है। शेष की अंकतालिका में मामूली अंतर आया है।
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मांगे साठ भेज दिए बीस
आठवीं कक्षा के अधिकांश विषयों के सत्रांक बीस में से भेजे जाते हैं जबकि कार्यानुभव, कला शिक्षा व स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा विषय के सत्रांक 6 0 में से भेजने होते हैं। सुजानगढ़ तहसील के गांव धात्री के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय ने अपने समस्त 25 परीक्षार्थियों के तीनों विषयों के सत्रांक 6 0 की बजाय 20 में से भेज दिए। डाइट ने विद्यालय प्रबंधन को गलती की जानकारी दी तो अब फिर से सत्रांक भेजे गए हैं। ऐसे में सभी विद्यार्थियों को नई अंकतालिका जारी करनी पड़ी है।
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1998 में भी हुआ ऐसा
डाइट सूत्रों के अनुसार 1998 में जन्मतिथि गलत दर्ज हो जाने के कारण एक हजार से अधिक अंकतालिकाएं बेकार हो गई थीं। इसके बाद इतनी बड़ी संख्या में अंकतालिकाएं कभी खराब नहीं हुई। विद्यालयों की गलती की वजह से दर्जनों अंकतालिकाएं प्रतिवर्ष रद्दी की टोकरी में फेंकनी पड़ती हैं। इस बार डाइट से भी भूल होने के कारण खराब अंकतालिकाओं का आंकड़ा हजार को पार कर गया।
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इनका कहना है....
करीब 18 सौ अंकतालिकाओं में त्रुटियां रह गई हैं। इससे परीक्षार्थियों को किसी प्रकार का नुकसान नहीं होने दिया गया है। त्रुटियां ठीक करवाकर नई अंकतालिकाएं जारी कर दी हैं।
-महावीर सिंह सिंघल, प्राचार्य, डाइट, चूरू

Friday, April 30, 2010

आपणी की निशानी गंदला पानी

स्वच्छता की कसौटी पर खरा नहीं
नमूनों की जांच में हुआ खुलासा
चूरू, 29 अप्रेल। आपणी योजना का पानी शुद्धता और स्वच्छता की कसौटी पर पूर्णतया खरा नहीं उतर पाया है।नहर के गंदले पानी को साफ करने के मापदण्डों की जानबूझकर अनदेखी की जा रही है। योजना के कर्मसाना फिल्टर प्लांट पर तो पानी की स्वच्छता के लिए फिटकरी (एलएम डोज) अंदाजे से डाली जा रही है। वांछित मात्रा से कम फिटकरी डाले जाने का ही परिणाम है कि घरों में गंदले पानी की ही आपूर्ति होती रही है। शिकायत मिलने पर जलदाय विभाग के लोग उपभोक्ता की लाइन में कई रिसाव होने का बहाना बनाकर सच्चाई को झुठलाते रहे हैं।यह खुलासा जलदाय विभाग के रसायनज्ञों की एक टीम की ओर से की गई जांच में हुआ है। रसायनज्ञों ने जांच रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को सौंप दी है। जिसमें कर्मसाना फिल्टर प्लांट में नहर के पानी की टर्बिडिटी के अनुसार फिटकरी की मात्रा रोजाना तय करने तथा साहवा फिल्टर प्लांट पर बंद पड़ी प्रयोगशाला को अति शीघ्र शुरू करवाने की सिफारिश की गई है।

ऐसे हुआ खुलासा
सीकर, चूरू व झुंझुनूं के रसायनज्ञों की टीम ने बीस अप्रेल को कर्मसाना व साहवा फिल्टर प्लांट व फील्ड से पानी के 19 नमूने लिए थे। चूरू स्थित जलदाय विभाग की प्रयोगशाला में नमूनों की गहनता से जांच की गई। दोनों फिल्टर प्लांटों का पानी जीवाणु व रासायनिक परीक्षण में सफल रहा परन्तु कर्मसाना फिल्टर प्लांट के पानी में फिल्टरेशन की प्रक्रिया में कमी उजागर हुई है। यहां से फिल्टर होकर घरों तक पहुंच रहे पानी में गंदलापन यानि टर्बिडिटी 6 एनटीयू (नेथलोमेट्रिक टर्बिडिटी यूनिट) पाई गई। जबकि पानी में वांछित मात्रा में फिटकरी मिलाई जाती तो टर्बिडिटी की मात्रा शून्य तक आ सकती थी। हालांकि पानी में दस एनटीयू तक की टर्बिडिटी स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक नहीं है लेकिन निर्धारित मात्रा से अधिक तथा हानिकारक तत्वों के कारण टर्बिडिटी होने पर स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।
रोज तय हो मापदण्ड
फिल्टर प्लांट पर नहर का पानी पहुंचते ही लैब में पानी की टर्बिडिटी की लैब में जांच कर उसमें मिलाई जाने वाली फिटकरी की मात्रा तय की जाती है। पानी की टर्बिडिटी घटती-बढ़ती रहती है। इसलिए फिटकरी डालने से पूर्व टर्बिडिटी जांच की प्रक्रिया रोजाना अपनाई जानी आवश्यक है। जबकि वर्तमान में सारा काम अनुमान से हो रहा है। टर्बिडिटी जांच के लिए प्लांट पर पर्याप्त स्टाफ ही नहीं है।

टर्बिडिटी के कारण
-नहर में पानी के प्रवाह का तेज होना।
-पानी की पम्पिंग तेजी से होने।
-अत्यधिक गर्मी व अधिक वाष्पीकरण।
-नहर में कचरा डाल दिए जाने।
-नहरबंदी के चलते रुका पानी आने।
-पानी में शैवाळ जमे होने।
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नमूनों की जांच रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को भेज दी है। कर्मसाना फिल्टर प्लांट पर समुचित एलएम डोज के लिए संबंधित अधिकारियों को लिखा गया है। साथ ही साहवा फिल्टर प्लांट स्थित प्रयोगशाला को शीघ्र शुरू करवाने की आवश्यकता जताई है।
-सुशील कुमार शर्मा, कनिष्ठ रसायनज्ञ, पीएचईडी, चूरू

Thursday, April 22, 2010

कम बोएंगे कम ही काटेंगे

खरीफ की बुवाई घटने का अनुमान, विभाग ने तय किए लक्ष्य
चूरू, 22 अप्रेल। कृषि विभाग ने खरीफ की बुवाई व उत्पादन के लक्ष्य तय कर लिए हैं। इस बार बुवाई क्षेत्रफल घटने के साथ ही प्रति हैक्टेयर हजारों किलोग्राम उत्पादन औंधे मुंह गिरने का अनुमान है। विभाग ने खरीफ फसलों के १२ हजार 400 क्विंटल बीज तथा 4 हजार 300 मेट्रिक टन उर्वरक भी मुख्यालय से मांग लिए हैं।
विभागीय जानकारी के अनुसार इस बार 11 लाख 32 हजार हैक्टेयर में खरीफ फसलों की बुवाई होने का अनुमान है, जो गत वर्ष की वास्तविक बुवाई से 51 हजार हैक्टेयर कम है।
मौसम मेहरबान रहा तो इस बार कम से कम जिले में खरीफ की 5 लाख 15 हजार मेट्रिक टन पैदावार होने की उम्मीद है। हालांकि गत वर्ष 5 लाख 31.5 हजार मेट्रिक टन पैदावार हुई थी।
इसी प्रकार खेतों में प्रति हैक्टेयर उत्पादन भी घटेगा। इस बार बाजरा, मूंग, मोठ, मूंगफली, तिल व ग्वार का प्रति हैक्टेयर 3 हजार 295 किलोग्राम उत्पादन होने का अनुमान है। जबकि गत वर्ष प्रति हैक्टेयर 4 हजार 8 25 किलोग्राम उत्पादन प्राप्त हुआ था।

इतने बीज मांगें
फसल मात्रा
बाजरा 4600
मूंग 2300
मोठ 4500
ग्वार 1000
(आंकड़े क्विंटल में)

इतनी चाहिए खाद
खाद मात्रा
यूरिया 3000
डीएपी 1000
एसएसपी 200
एनपीके 100
(आंकड़े मेट्रिक टन में)

बुवाई का अनुमान
फसल क्षेत्रफल
बाजरा 425000
मूंग 30000
मोठ 360000
मूंगफली 16000
तिल 1500
ग्वार 299500
(आंकड़े हैक्टेयर में)
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खरीफ फसलों की बुवाई, उत्पादन के लक्ष्य तथा बीज व खाद की मांग तय कर ली है। बारिश की अनियमितता के कारण इस बार बुवाई कम होने के आसार हैं। इससे कुल उत्पादन भी घटेगा।
-हरपाल सिंह, कृषि अधिकारी, चूरू

Tuesday, April 20, 2010

अजब 13 की गजब कहानी

ग्राम से गदर तक रहा साथ

राशिफल और अंकों के फेर में पडऩा मुझे कतई पसंद नहीं। मेरे शब्दकोष में दोनों के कोई मायने नहीं हैं। खासकर पत्रकारिता जैसे चुनौतिपूर्ण क्षेत्र में कॅरियर बनाने की जद्दोजहद शुरू करने के बाद से मैंने अपने आप में यह बदलाव महसूस किया है। मेरा मानना है कि राशिफल और शुभ अंक हमें दिमागी तौर पर संतुष्ट या विचलित कर सकते हैं। इससे ज्यादा दोनों में कुछ नहीं रखा।
दोस्तों हाल ही मैंने ग्राम से 'ग्राम गदर' (पुरस्कार) तक कľ सफर तय किया तो महीने के तेरहवें दिन ने मुझे शुभ अंक के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया।
मुझे अब लगने लगा है कि मेरे कॅरियर और 13 तारीख का चोली-दामन का सा साथ हो गया है। यह सब एकाएक नहीं हुआ, बल्कि पिछले चार साल से ऐसा हो रहा है। यह जरूर है कि इसका अहसास मुझे हाल ही हुआ है। कॅरियर के हर छोटे-बड़े फैसलों में महीने का तेरहवां दिन अहम भूमिका निभा रहा है।
वर्ष 2006 में स्नातक पूरी करने के बाद पत्रकारिता को बतौर कॅरियर चुना तो जयपुर स्थित द माइंडपूल स्कूल ऑफ जर्नलिज्म में 13 जुलाई को दाखिल हुआ। उस वक्त जिंदगी में 13 के अंक ने पहली बार प्रवेश लिया और अब तक बखूबी साथ दे रहा है।
पत्रकारिता का छह माह तक किताबी ज्ञान लेने के बाद संस्थान ने मुझे राजस्थान पत्रिका के सीकर संस्करण में खबरनवीब बनने भेजा। यहां पर 13 फरवरी 2007 से प्रशिक्षण का आगाज हुआ। सीकर में एक माह भी नहीं बीता कि संस्थान ने राजस्थान पत्रिका के बंगलौर संस्करण में प्रशिक्षण लेने का फरमान सुना दिया।
सात मार्च 2007 को झुंझुनूं जिले की नवलगढ़ तहसील के गांव झाझड़ से बंगलौर के लिए रवाना हुआ। कुछ दिन पूना में चचेरे भाई के पास रुककर 12 मार्च को बंगलौर पहुंचा। बंगलौर के बारे में जैसा लोगों से सुना वो उससे भी अधिक सुन्दर था। पहले दिन किराए का मकान देखने तथा सफर की थकान मिटाने के कारण विधिवत रूप से 13 मार्च को बंगलौर संस्करण ज्वाइन कर सका।
बंगलौर में पत्रकारिता के काफी गुर सीखे। खुद को दक्षिण भारतीय संस्कृति में ढालने का प्रयास kइया. साथ ही कन्नड़ और अंग्रेजी भाषा पर भी पकड़ बनानी चाही। इन सब के बीच कब छह माह बीत गए पता ही नहीं चला। आखिर मैंने प्रशिक्षण पूरा होते ही बंगलौर छोड़ दिया। यह भी इत्तेफाक ही था कि जिस दिन बंगलौर से जयपुर के लिए रवाना हुआ, वह दिन अगस्त माह का तेहरवां दिन था।
इसके बाद अक्टूबर 07 में अगला पड़ाव फिर से सीकर संस्करण होते हुए राजस्थान पत्रिका के चूरू ब्यूरो कार्यालय में डाला। यहां जो कुछ सीखने को मिला, दूसरी जगह वह शायद ही मिलता। चूरू में रहकर न केवल मैंने ग्रामीण पत्रकारिता को करीब से जाना बल्कि विधानसभा, लोकसभा, निकाय और पंचायत चुनाव भी देखे। चुनावों में हर दृष्टिकोण से खबरें बनाईं। साथ ही ग्रामीण पत्रकारिता से भी जुड़ाव रहा।
समय का पहिया घूमा और 2010 में त्रकारिता के तीन साल पूरे कर लिए। इस साल अप्रेल में कट्स इंटरनेशनल की ओर से गांवों में जल संरक्षण एवं प्रबंधन विषय पर उत्कृष्ठ लेखन के कारण मुझे प्रतिष्ठित पुरस्कार ग्राम गदर के लिए चुन लिया गया। दोस्तों मेरे कॅरियर का सबसे खुशनसीब यह दिन 13 अप्रेल था। अब तो शायद आपको भी यकीन हो गया होगा मेरी अजब कहानी में 13 का अंक कुछ गजब ढा रहा है।

Sunday, April 18, 2010

अपनों ने ही बना दी पराई

किस्से और कहानियां बनी पेयजल उपलब्धता,
आगामी सरकारी योजनाएं खटाई में पडऩे के आसार
सन्तोष गुप्ता/विश्वनाथ सैनी
चूरू, 18 अप्रेल। लोगों ने घरों में घड़े भरकर रखना बंद कर दिया था। गृहिणियां रात सुकून से सोने लगी थी। अल सुबह उठने और मीलों पैदल चलने व सिर पर घड़े रख पानी लाने की चिंता उन्हें सताती नहीं थी। मेहमान के आने पर बच्चे दौड़कर सीधे टूटी से गिलास में ही ताजा पानी भर ले आते थे। रात को दो बजे भी पानी की जरूरत होती तो टूटी खोलते ही पानी उपलब्ध हो जाता था। मवेशियों की खेळियां और परिंदों के परिण्डे तक दिन भर भरे रहते थे। गांव के लोग पानी का मूल्य समझने लगे थे। नल से
पानी व्यर्थ बहते कोई देख लेता था तो तुरन्त टोक देता था या खुद टूटी बंद कर देता था। चौबीस घंटे पीने के लिए शीतल, शुद्ध और स्वच्छ पानी की उपलब्धता बनी रहती थी। ये बाते भले ही अब किस्से और कहानी सी लगती हों लेकिन यह सच्चाई है जो अब चूरू, झुंझुनूं और हनुमानगढ़ वासियों की जुबान से किस्से और कहानी बनकर निकल रही है। समय का चक्का तो अपनी गति से चलता रहा। गांव के लोग उसकी चाल के साथ कदमताल नहीं कर सके। वह तो न चाल समझ सके न चरित्र जान सके। पीने के पानी के अभाव में जीते हुए उसे एकाएक जो सुकून मिला वह उसे भी संजोए नहीं रख सके। खुशी मिले उन्हें बमुश्किल एक दशक भी नहीं बीता अपनों के बीच ही अपनों के ही हाथों आपणी योजना पराई होती दिखी।
राजस्थान पत्रिका की टीम ने दम तोडऩे के कगार पर पहुंची आपणी योजना का हाल जाना तो हैरानी हुई। सिर्फ सात साल पुरानी योजना को समय के साथ सम्बल और समृद्धता मिलने के बजाय जिसने जब चाहा जहां मौका मिला पराई नार की तरह बुरीनजर डालने से बाज नहीं आया। अब ढाणी और गुवाड़ में लगी टूटी दिनभर खुली रहती है पर उसमें पानी की बूंद नहीं टपकती। पाइप से गांव तक पीने का पानी महीनेभर में आए कि पन्द्रह दिन में कुछ निश्चित नहीं रहा। महिलाओं की दिनचर्या प्रभावित हो गई। चौका-चूल्हे से पहले पीने के पानी की जुगाड़ में उनकी रातों की नींद उड़ गई और दिन का चेन जाता रहा। पानी का इन्तजार करना तो अब ग्रामीणों के बस में रहा ही नहीं सो हर कोई पानी के जुगाड़ में फिर सेे जुटा दिखा। पत्रिका टीम ने पाया कि इन्दिरा गांधी नहर से पानी छोड़े जानेसे लेकर गांवों में पानी पहुंचने के बीच की तमाम व्यवस्थाएं पानी संग्रहण, भण्डारण, शुद्धिकरण और वितरण नियत मानदण्डों पर कहीं खरी नहीं उतर रही। न तो पानी का संग्रहण अपेक्षित है न भण्डारण सुरक्षित और संरक्षित है। शुद्धिकरण और स्वच्छता तो भगवान भरोसे है। वितरण व्यवस्था उन्हीं लोगों ने चौपट कर रखी है जिन्हें उसकी चौकीदारी का जिम्मा सौंपा था। चूरू, झुंझुनूं और हनुमानगढ़ के सैकड़ों ग्रामीण और कुछ शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए बनी जनसहभागिता के मूल आधार वाली पीने के पानी की इस योजना का इस तरह गला ही सूख जाएगा ऐसा तो योजना बनाने वाले ने भी कल्पना नहीं की होगी। हालात यह हैं कि आपणी योजना का वर्तमान ही नहीं उससे जुड़ी भविष्य की उज्जवल संभावनाएं भी पूरी क्षीण होती दिखाई देने लगी हैं।
राज्य सरकार तो चूरू की आपणी योजना को दिखा विश्व बैंक से इसे राज्य के अन्य जिलों में लागू करने का सुखद सपना देख रही है। जबकि स्थिति यह है कि योजना निकट भविष्य में चूरू में ही ठीक से संचालित हो सके इसमें संशय है। खुद जलदाय विभाग के अधिकारियों का दावा है कि कि जिन क्षेत्रों में योजना के जरिए पाइप लाइन से जलापूर्ति की जा रही है वहां इतने अवैध कनेक्शन है कि योजना का उस उपभोक्ता को लाभ दे पाना ही मुश्किल हो गया है जो कि सद्इच्छा से लाभ चाहता है।
मोटे अनुमान के अनुसार योजना से जुड़े गांवों में करीब तीस से चालीस हजार अवैध कनेक्शन हैं। यह सब कैसे हुए? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? यदि इन सबकी जांच और झंझटों में उलझा न भी जाए तो कम से कम अब इस पर तो ठोस कदम उठाने की जरूरत है ही कि अवैध कनेक्शनों को काटा कैसे जाए? फिर यह कि योजना से जुड़े अंतिम छोर के व्यक्ति और गांव तक पानी पाइप के जरिए कैसे पहुंचाया जाए? यह सच्चाई है कि योजना की पाइप लाइन में नियमित पानी प्रवाह नहीं बने रहने से उसके जोड़ों में लगी रिंगों को दीमक चट कर जाती है। इससे स्थिति यह हो गई है एक किलो मीटर के रास्ते में बीसियों जगह रिसाव हो गए।
अब भला पानी भेजने वाले और पानी पाने वाले सबकी नीयत साफ भी हो तो आखिर तक पानी पहुंचने की स्थिति ही नहीं बनती। पम्प हाउस से निकलने वाला पानी गांव की टंकी तक पूरा पहुंचता ही नहीं तो गुवाड़ी में लगी टूटी से पानी टपकेगा कैसे? योजना को संचालित करने वाले जलदाय महकमें के कारिंदें ग्रामीणों को कहते हैं कि वे पूरा पानी भेज रहे हैं गांव में जिन लोगों ने अवैध कनेक्शन किए हैं उन्हें काट दे तो पाइप में पानी आ जाएगा। ग्रामीण कहते है कि अवैध कनेक्शन काट दिए फिर भी पानी नहीं पहुंचा क्यों कि लाइन में पूरा पानी छोड़ा ही नहीं जाता। उनका आरोप है कि विभाग के लोग पानी माफिया से मिलकर पानी बेच रहे हैं। पानी पंचायतों और विभागीय अधिकारियों के बीच चलती इस नूरा कुश्ती ने स्थिति यह कर दी कि पम्प हाउस के नजदीक के गांवों में भी पाइप लाइन के जरिए एक माह में भी जलापूर्ति नहीं की जा रही। टैंकरों से जलापूर्ति में सबकी चांदी बन रही है और पाइप लाइन दीमक चट कर रही है। पत्रिका टीम ने देखा कि मौजूदा हालात में पानी नहीं पीकर भी ग्रामीण सुरक्षित रह सकता है पानी पीकर तो उसे जलजनित बीमारी घेर ले तो कोई बड़ी बात नहीं। आपणी योजना का पानी जिस स्त्रोत से और जिस वितरिका के माध्यम से जिन जगहों पर होता हुआ जिस हालत में पहुंच रहा है, वह शब्दों में बयां करना मुश्किल है। फिर उसे जिस तरह से स्वच्छ और शुद्ध किया जा रहा है यह इस बात से समझा जा सकता है कि पानी के ऑटोमेटिक ट्रीटमेंट प्लांट वर्षों से बंद पड़े हैं।
अनुभवी तकनीकी रसायन विशेषज्ञ प्लांट पर नियुक्त ही नहीं है। अनुमान के आधार पर हैल्परों से पानी की शुद्धता व स्वच्छता व्यवस्था बनाई रखी जा रही है। इन सब हालातों में जलदाय विभाग के आला से अदने अभियंता चाहे जो दावे व वादे करते हो इसमें कोई दोराय नहीं कि मौजूदा हाल और हालात अपेक्षानुकूल नहीं रहे। फिर भी अभी बहुत समय है। पानी की कीमत को जाना जाए और उसके उपयोग के प्रति जागा जाए। रिस-रिसकर व्यर्थ बहते पानी और ईंट-ईंटकर ढहते साधन-संसाधन को बचाया जाए। इस बार सिर्फ एक तरफा नहीं बल्कि चौतरफा समझ, संकल्प और समर्पण की जरूरत होगी।

फैक्ट फाइल
1994- शुरुआत
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2003- गांव-गांव पहुंचा पानी
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2 हजार किमी में- उच्चगुणवत्ता की पाइप लाइन
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20 हजार वर्ग किमी- क्षेत्रफल में फैली
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24 घंटे- जलापूर्ति का दावा
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485 गांव व 05 कस्बे- वर्तमान में जुड़े हैं
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20 गांव-सरदारशहर के जुड़े ही नहीं
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70 गांव- योजना से कटने को हैं तैयार
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09 लाख- लोग लाभान्वित
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04 स्थानों पर-जल शुद्धिकरण सयंत्र
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02 स्थानों पर- बड़े जल भंडारण गृह
योजना की मूल भावना
भ-जल की गुणवत्ता संबंधी समस्याओं से जूझ रहे चूरू, झुंझुनंू व हनुमानगढ़ जिले के लगभग बीस हजार वर्ग किलोमीटर में पीने के लिए नहर का शुद्ध व स्वच्छ पानी मुहैया करवाने की दृष्टि से वर्ष 1994 में आपणी योजना बनाई गई। मरु क्षेत्र में भागीरथी साबित हुई आपणी योजना में करोड़ों रुपए का वित्तभार संयुक्त रूप से जर्मन सरकार व राजस्थान सरकार ने वहन किया। योजना के प्रथम चरण में 370 गांव व दो शहरों के लगभग नौ लाख लोग लाभान्वित होने थे।
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निशचित रूप से आपणी योजना में ढेरों विकृतियां पैदा हो गई हैं। वर्षों पुरानी इस व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। योजना की स्थिति दयनीय होने लिए ग्रामीण भी बराबर के जिम्मेदार हैं। प्रत्येक गांव में औसत ढाई सौ अवैध कनेक्शन हैं। सबसे अधिक समस्या राजगढ़ के गांवों में है। योजना के मूल स्वरूप को वापस लाने के लिए फिल्टर प्लांट, पाइप लाइन, साफ-सफाई, तीन सौ गांवों में मीटर बदलने तथा स्टाफ की कमी दूर करने के पांच सौ करोड़ रुपए के प्रस्ताव तैयार किए जा रहे हैं।
-श्रवण कुमार शर्मा, अधीक्षण अभियंता, आपणी योजना, चूरू
ना पूरा पानी, ना सफाई
घासला अगुना पम्प हाउस से जुड़े गांव भुम्भाड़ा में जलापूर्ति अनियमित है। पानी पंचायत भंग होने के कगार पर है। मेहलाणा, बास धेतरवाल व मेहलाणा दिखणादा व उत्तरादा में जलापूर्ति प्रभावित है। हौज के तल में खड्डा है, आधा पानी तो जमीन में ही समा जाता है। हौज की अर्से से सफाई ही नहीं हुई। पम्प का स्टाटर खराब पड़ा है। ब्लीचिंग पाउण्डर ही नहीं है। महलाणा के लोग पांच टंकियों पर कनेक्शन तथा घासला से रोजाणी बाइपास लाइन चाहते हैं।इसके लिए वे खाई खोदने को भी तैयार हैं।वर्तमान में योजना से झुंझुनूं व चूरू
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जिले के राजगढ़, तारानगर, चूरू, रतननगर व बिसाऊ कस्बा तथा करीब 485 गांव जुड़े हैं। योजना की अस्सी फीसदी दुर्गति अवैध कनेक्शनों के कारण हुई है। दस फीसदी व्यवस्थागत खामियां तथा दस फीसदी विभागीय लापरवाही भी जिम्मेदार है। योजना की सबसे बड़ी त्रास्दी यह है इसके शुरू होने के बाद से ही रख-रखाव पर कभी कोई बड़ी राशि खर्च नहीं की गई। इसे
बस चलाते गए। इसलिए वर्तमान में इस स्थिति का सामना करना पड़ा है।
-पीसी शर्मा, एक्सईएन, आपणी योजना, तारानगर
जारी...

Saturday, April 17, 2010

बेटियों ने बजाया डंका

चूरू। आठवीं बोर्ड परीक्षा में जिले की बेटियों ने खूब नाम कमाया है। बेटियों ने कुल परीक्षा परिणाम में बाजी मारने के साथ ही बोर्ड की अस्थायी वरीयता सूची में भी छात्रों की कडी टक्कर दी है। जिले में 79 छात्राओं ने अस्थायी वरीयता सूची में जगह बनाने में कामयाबी हासिल की है। इनमें से 18 छात्राओं ने जिला स्तर पर जबकि शेष ने तहसील स्तर पर परचम लहराया है।

डाइट सूत्रों के अनुसार इस बार आठवीं बोर्ड परीक्षा में जिलेभर की कुल 16 हजार 313 छात्राएं शामिल हुईं। इनमें से 11 हजार 6 20 छात्राओं ने अगली कक्षा में जगह बनाई है। छात्राओं का कुल परीक्षा परिणाम 71.23 प्रतिशत रहा है, जो छात्रों से 1.11 प्रतिशत अघिक है।

जिला स्तर पर पूजा
बोर्ड की जिला स्तरीय अस्थायी वरीयता सूची में छात्रा वर्ग में सुजानगढ के बाल भारती विद्यापीठ बालिका विद्यालय की छात्रा पूजा चौहान ने 94.67 फीसदी अंक हासिल कर प्रथम स्थान प्राप्त किया है। जिला स्तर के 25 स्थानों पर कुल 42 विद्यार्थी काबिज हुए हैं। इनमें 18 छात्राएं हैं।

तहसील स्तर पर सिरमौर
बोर्ड की तहसील स्तरीय अस्थायी वरीयता सूची में कुल 6 1छात्राएं शामिल हैं। इनमें से श्री भारती आदर्श विद्यापीठ सीनियर सैकण्डरी विद्यालय की कनुप्रिया वर्मा सरदारशहर तहसील में तथा श्री गांधी बाल निकेतन की मेघना शर्मा रतनगढ तहसील में सिरमौर रही हंै। मेघना ने 93 प्रतिशत तथा कनुप्रिया ने 90.22 अंक हासिल किए हैं।

इतनी छात्राएं मेरिट में
तहसील - छात्रा
चूरू - 13
रतनगढ - 14
राजगढ - 7
तारानगर - 8
सुजानगढ - 9
सरदारशहर - 10
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इसमें कोई शक नहीं कि लडकों की तुलना में लडकियां पढाई पर अघिक ध्यान देती हैं। लडकियां घरेलू कामकाज में हाथ बंटाने के बावजूद अच्छे अंको से पास हुई हैं। इस बार भी छात्राओं का परीक्षा परिणाम शानदार रहा है। जो बालिका शिक्षा को बढावा देने के लिहाज से अच्छा है।
-महावीर सिंघल, प्राचार्य, डाइट, चूरू

Saturday, April 10, 2010

पंचायत भवनों का निखरेगा रूप

पांच-पांच हजार रूपए उपलब्ध करवाए जाएंगे
चूरू। इसे महात्मा गांधी रोजगार गारण्टी योजना के सुचारू संचालन का प्रयास कहे या ग्राम पंचायत को आदर्श बनाने की कवायद। कारण जो भी हो मगर पंचायत भवन का रूप निखरना तय है। अब पंचायत भवन न केवल बाहर बल्कि भीतर से भी चमक उठेगा। इसके लिए जिला प्रशासन ने तैयारी शुरू कर दी है।
जिले की समस्त 249 ग्राम पंचायतों को महानरेगा की प्रशासनिक मद से पांच-पांच हजार रूपए उपलब्ध करवाए जाएंगे। जिसका उपयोग पंचायत भवन की दीवारों पर सफेदी, दरवाजों व खिडकियों पर रंग-रोगन, आवश्यक सामग्री जैसे फर्नीचर, पंखा व दरी खरीदने तथा पानी की सुविधा उपलब्ध कराने में करना होगा।
इससे न केवल पंचायत भवन सुव्यवस्थित एवं सुदृढ होगा बल्कि ग्राम सेवकों व ग्राम रोजगार सहायकों को महानरेगा का कार्य सम्पादित करने में भी आसानी रहेगी। अघिकारिक जानकारी के अनुसार जिले के समस्त कार्यक्रम अघिकारियों को दस अप्रेल तक अपने क्षेत्र की समस्त ग्राम पंचायतों के खातों में पांच हजार रूपए हस्तांतरित करने तथा अपनी निगरानी में ग्राम सेवकों के माध्यम से 25 अप्रेल तक राशि का उपयोग करवाने के आदेश दिए जा चुके हैं।
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नरेगा का नाम भी होगा
गांवों में महानरेगा की कागजी कार्यवाही पंचायत भवन में बैठकर पूरी की जाती है। योजना का समस्त रिकॉर्ड भी पंचायत भवन में रखा जाता है। ऎसे में अब पंचायत भवन पर पंचायत के नाम के साथ-साथ 'महानरेगा संदर्भ केन्द्र' मोटे अक्षरों में लिखवाया जाएगा।
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हर भवन की होगी श्रेणी
पंचायत भवनों को निखारने के लिए 25 अप्रेल तक का समय तय किया गया है। इसके बाद विभिन्न अघिकारियों से पंचायत भवन का निरीक्षण करवाया जाएगा। निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर पंचायत की अ, ब,स एवं द श्रेणी निर्घारित की जाएगी।
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पंचायत भवनों की दशा सुधारने की दिशा में कदम बढा दिए हैं। कार्यक्रम अघिकारियों को इस संबंध में आदेश जारी कर दिए हैं। इसमें निरीक्षण का भी प्रावधान रखा है। लापरवाही बरतने वालों के खिलाफ तत्काल प्रभाव से कार्रवाई करेंगे।
-अबरार अहमद, अतिरिक्त जिला कार्यक्रम समन्वयक एवं सीईओ जिला परिषद, चूरू