Wednesday, February 10, 2010

मैं और मेरी तनहाई

जब दिल की बात जुबां पर नहीं आए...बार-बार समझाने के बावजूद गले तक आकर अटक जाए...दिल में हल्की सी आहट हो...दिलों-दिमाग काम करना बंद कर दें...मन हल्का और सिर भारी हो जाए...हालात ऐसे कि ना दुआ लगे और ना ही दवा...रगों में दौड़ रहे खून की दौड़ मानो थम सी जाए...दिल को कहीं भी सुकून नहीं मिले...मन उदास हो जाए...हाल-ए-दिल किसी भी तरह बयां न हो तो मैं मेरा वर्षों पुराना फार्मूला अपनाता हूं...मैं गुमसुम बैठकर उसका इंतजार करता हूं...उसकी आहट ही मुझे सुकून देना शुरू कर देती है...उसके आगमन पर कदमों की आहट मुझे स्पष्ट सुनाई देती है...ऐसे हालात में वह बिना किसी देरी के मेरे पास आ जाती है...कुछ ही देर में वह मेरे साथ होती है...हमारे पास कोई दूजा नहीं होता....जब हम दोनों अकेले होते हैं तो घंटों बतियाते हैं...वह ज्यादा कुछ नहीं बोलती बस हरामखोर मेरी सुनती ही जाती है...लोग इसे तन्हाई के नाम से जानते हैं...मगर मैं इससे दोस्त के रूप में परिचित हूं...मेरी इस दोस्त को कभी कम मत आंकना क्योंकि यह बड़े काम की चीज है...इसने अच्छे-अच्छे लोगों का दुख की घड़ी में साथ निभाया है...जितना मैं इसे जानता हूं... उसके आधार कहना गलत नहीं होगा कि तन्हाई यूं ही किसी का साथ नहीं देती...साथ दे भी तो यह बात नहीं करती और बात कर भी ले तो यह अपने बारें में कभी कुछ नहीं बताती....मगर मेरे साथ यह ऐसा नहीं करती...इसका कारण तो मुझे पता नहीं...मगर मैं उसे अच्छी तरह जानता हूं...कई बार इसने मेरा साथ दिया है...मेरी सुनी ही नहीं बल्कि अपनी भी काफी बातें मुझे बताई है...एक दिन यह बता रही थी कि इसका कोई स्थायी ठिकाना नहीं है...इसे यह भी पता नहीं होता है कि इसे कहां जाना है...कब वापस आना है...कहीं जाकर करना क्या है...कितनी देर रहना है...ये तमाम परेशानियों के बावजूद यह वर्षों से लोगों का साथ दे रही है...मैंने एक दिन इससे पूछा कि तुम्हे कैसे पता लगता है कि मैं तुम्हे याद कर रहा हूं...तुम्हारी जरूरत महसूस कर रहा हूं... और कभी भी ऐसा नहीं होता कि तुम कहीं दूसरी जगह व्यस्त हो...जवाब सुन तो मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई....एक हल्की सी सांस लेते कहा कि जब कोई दिल टूट जाए...कोई मुझे दिल से याद करे...कोई मेरे बिना रह नहीं सके.. तो मुझे आना ही पड़ता है...मैं अपने साथी को कभी एकेलापन महसूस नहीं होने देती हूं...पागल, मैं तो हवा हूं कहीं व्यस्त कैसे हो सकती हूं. हां इतना जरूर है कि मेरा साथ लोगों को जरूर महसूस होता है...मेरे आने का पता तो लग जाता है मगर कब गई इसकी किसी को भनक तक नहीं लगती...क्या करूं दोस्तों, मैं अक्सर मेरी तन्हाई के साथ घंटों बैठकर बतियाता हूं...इसे मेरी कमजोरी कहे या मेरी होशियारी मगर मुझे तन्हाई के साथ कुछ पल बिताने की आदत सी हो गई है...आप भी ऐसा करके देखना बड़ा सुकून मिलेगा....
प्रस्तुतकर्ता विश्वनाथ सैनी
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1 टिप्पणियाँ:

manoj said...
meri tanhaaii ka lekh pada aur mujhe bahut achchh laga.
February 19, 2009 11:18 AM

3 comments:

  1. Bahut Bhadiya...!!
    http://kavyamanjusha.blogspot.com/

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  2. अपने मनोभावो को अच्छे शब्द दिए हैं....बहुत बढिया!!

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