Monday, November 29, 2010

पानी की चाबी अब 'टाइमर' के पास

चूरू। जिला मुख्यालय पर जन स्वास्थ्य एवं अभियांत्रिकी विभाग (पीएचईडी) के माध्यम से आपूर्ति किए जा रहे पानी की चाबी अब डिजिटल टाइमर के पास होगी। पेयजल का समुचित वितरण और पानी के व्यर्थ बहाव पर लगाम कसने के लिए विभाग ने यह आधुनिक कदम उठाया है। इसके तहत विभाग ने शहर में स्थित अपने कुओं और नलकूपों पर डिजिटल टाइमर स्विच लगाना शुरू कर दिया है।

अत्याधुनिक तकनीकी से निर्मित टाइमर लगने के बाद कुएं और नलकूप अपने आप संचालित होंगे। इन्हें चालू या बंद करने के लिए ना तो पीएचईडी के कर्मचारियों को रातभर जगना पडेगा और ना ही घरों में रात को बिना आवश्यकता के जलापूर्ति होगी।

उपभोक्ताओं से पूछेंगे टाइम
शहर में पीएचईडी के लगभग सौ जलस्त्रोत संचालित हैं। स्टाफ की कमी या कार्मिकों की लापरवाही की वजह से अघिकांश जलस्त्रोत ना तो समय पर चालू हो पाते हैं ना ही बंद। कई जलस्त्रोत चौबीस घंटे चालू रहते हैं, जिनका पानी नलों के जरिए नालियों में व्यर्थ बह जाता है। विभागीय अभियंताओं की मानें तो जलस्त्रोत पर लगाए जाने वाले टाइमर में जलापूर्ति शुरू या बंद करने का समय उससे जुडे उपभोक्ताओं से राय-मशविरा करके सेट किया जाएगा। ताकि विभाग और उपभोक्ता के बीच तालमेल बना रहे।

यूं करता है काम
टाइमर की साइज मोबाइल से थोडी बडी है। इसेकुएं या नलकूप के पम्प को संचालित करने वाले पैनल बोर्ड के साथ लगाया जाएगा। जिससे पम्प को चालू या बंद करने वाले स्टार्टर पर टाइमर का पूरा नियंत्रण हो सके। खास बात यह है कि टाइमर में पम्प को चालू या बंद करने का समय पूर्व में निर्घारित किया जा सकेगा। निर्घारित समय पर बिना किसी व्यक्ति की मदद से पम्प स्वत: चालू या बंद हो जाएगा। टाइमर में एक बार टाइम सेट करने पर लम्बे समय तक बदलने की जरूरत नहीं पडेगी। हालांकि आवश्यकता पडने पर टाइमर के समय में कभी भी फेरबदल किया जा सकेगा।

शुरूआत में दो, बाद में पचास
विभाग ने चूरू के चांदनी चौक व गढ के पास स्थित नलकूप पर टाइमर लगाकर योजना की शुरूआत कर दी है। शहर के नौ तथा ग्रामीण क्षेत्र के दो जलस्त्रोतों पर भी जल्द ही टाइमर लगेगा। फिलहाल जलस्त्रोत चिह्नित किए जा रहे हैं। उन जलस्त्रोतों को प्राथमिकता दी जा रही है, जहां पानी अघिक व्यर्थ बहता हो। आगामी दो माह के दौरान कुल पचास जलस्त्रोतों पर टाइमर लगाया जाएगा।

ये भी होंगे फायदे
टाइमर का सबसे बडा फायदा पानी को व्यर्थ बहने से रोकना होगा। जलस्त्रोत चालू या बंद करने में लगा स्टाफ विभाग के अन्य कार्यो में काम लिया जा सकेगा। इसके साथ चौबीसों घंटे जलस्त्रोत चलने की वजह से मोटर जलने तथा पेयजल टंकियां ओवर फ्लो होने की समस्या भी अब नहीं रहेगी।
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पानी व बिजली की बचत तथा स्टाफ की कमी को दूर करने के लिए शहर में विभाग के जलस्त्रोतों पर पहली बार टाइमर लगा रहे हैं। पहले दिन दो जगह टाइमर लगाए हैं। आगामी दो माह में पचास जलस्त्रोत पर टाइमर लगाएंगे। -अम्बिका प्रसाद तिवाडी, एक्सईएन, पीएचईडी

Sunday, November 14, 2010

तालछापर में नजर आया दुर्लभ पक्षी

चूरू। विश्व स्तर पर दुर्लभ प्रजातियों में शामिल पक्षी सोशिएबल लैप विंग इन दिनों चूरू जिले के तालछापर कृष्णमृग अभयारण्य में देखी जा रहा है कजाकिस्तान से शीतकालीन प्रवास पर भारत के सूखी घास और सूखे मैदानी इलाकों में आने वाला यह पक्षी इस बार देशभर में सबसे पहले तालछापर में नजर आया है। फिलहाल अभयारण्य में ऎसे पांच पक्षी विचरण करते देखे जासकते हैं। रेड डेटा बुक में लुप्तप्राय प्रजातियों में शामिल सोशिएबल लैप विंग अभयारण्य में 12 साल बाद पहुंची है। अभयारण्य के रिकॉर्ड के मुताबिक इससे पूर्व 1998 में इसने अभयारण्य में पहुंचकर सर्दियां गुजारी थी। एक दशक से अधिक लम्बे अंतराल के बाद इसके यहां दुबारा आगमन को वन अधिकारी अभयारण्य के बदलते वातावरण के लिए शुभ संकेत मान रहे हैं।

दुनिया भर में सिमटी संख्या
इण्डियन बर्ड्स कन्जर्वेशन नेटवर्क के स्टेट कोऑर्डिनेटर सुरेश चन्द्र शर्मा के अनुसार रेड डाटा बुक में विश्व में सोशिएबल लैप विंग की संख्या काफी कम बताई गई है। भारत में गुजरात का कुछ हिस्सा और सम्पूर्ण राजस्थान में इनके आवास के अनुकूल वातावरण है। मगर दोनों प्रदेशों में लम्बे समय से इनके दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। राजस्थान में मुख्य रूप से तालछापर, केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान व अन्य छोटे दलदली क्षेत्रों में यह पक्षी कभी-कभार ही दिखाई देता है।

बड़ा शर्मिला पक्षी
लगभग तीस सेंटीमीटर लम्बा यह पक्षी बड़ा शर्मिला है। सफेद भौंहे, सिर पर चमक और पेट पर काला व मेहरून धब्बा इसकी खास पहचान है। इस मेहमान पक्षी का मुख्य भोजन कीड़े-मकोड़े हैं। कजाकिस्तान में बर्फ गिरने के कारण अक्टूबर में शीतकालीन प्रवास के लिए यह अफगानिस्तान होता हुआ तालछापर पहुंचा है। यहां पर यह पक्षी मार्च तक प्रवास करेगा।

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सोशिएबल लैप विंग दुर्लभ पक्षी है। दुनिया भर में इनकी संख्या तेजी से घटती जा रही है।
-हरकीरत सिंह सांगा, वन्यजीव विशेषज्ञ

तालछापर अभयारण्य में सात रोज पूर्व ही सोशिएबल लैप विंग नजर आई है।इससे पूर्व इसे अभयारण्य में 1998 में देखा गया था। रेड डाटा बुक में शामिल इस पक्षी का एक दशक बाद यहां पहुंचना अभयारण्य के वातावरण तथा पक्षी संवर्द्धन के लिहाज से अच्छा संकेत है।
-सूरत सिंह पूनिया, क्षेत्रीय वन अधिकारी, तालछापर

अभयारण्य में प्रवासी पक्षियों के प्राकृतिक आवास को बढ़ावा देने के लिए लम्बे समय से अनेक काम किए जा रहे हैं। यही वजह है विश्वभर में दुर्लभ पक्षी मानी जा रही सोशिएबल लैप विंग यहां नजर आई है।
-केसी शर्मा, डीएफओ, चूरू

फाइलों में अटके सामुदायिक कुण्ड

कुण्ड निर्माण में लाखों का मिलता है अनुदान,
12 का लक्ष्य, 7 की चयन प्रक्रिया जारी
चूरू। सामूहिक प्रयासों से बड़े कुण्ड बनाकर धोरों को हरा-भरा करने की सामुदायिक कुण्ड निर्माण योजना दो साल से फाइलों में अटकी हुई है। योजना में लाखों रुपए के अनुदान का प्रावधान होने के बावजूद जिले में एक भी कुण्ड नहीं बन पाया है।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार चालू वित्तीय वर्ष में 12 कुण्ड बनाए जाने का लक्ष्य है, परन्तु अभी तक सात ही समूहों ने आवेदन किया है। फिलहाल इन्हीं समूहों के आवेदनों को भी अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। ऐसे में इस बार तय लक्ष्य निर्धारित समय में हासिल होने की सोचना बेमानी होगी।
योजना के तहत कम से कम पांच किसानों को मिलकर सामुदायिक कुण्ड निर्माण के लिए आवेदन करना होता है। 50 मीटर लम्बा व इतना ही चौड़ा और तीन मीटर गहरा कुण्ड बनाने पर राज्य सरकार की ओर से साढ़े सात लाख रुपए का अनुदान उपलब्ध करवाया जाता है। शेष राशि किसान समूह को मजदूरी जैसे मिट्टी खुदाई करके वहन करनी होती है।

इस साल बदले प्रावधान
विभागीय जानकारी के अनुसार पहले वर्ष योजना के तहत अनुदान की राशि तथा कुण्ड की लम्बाई-चौड़ाई दोगुनी थी। जिले की भौगोलिक स्थिति व बारिश की कमी की वजह से इतना बड़ा कुण्ड बन पाना संभव नहीं हुआ। ऐसे में इस वर्ष 12 अक्टूबर को योजना की अनुदान राशि व कुण्ड की साइज में घटाई गई है।

इन्होंने किया आवेदन
कुण्ड निर्माण के लिए गांव परसनेऊ के रामरख मेघवाल, दांदू के जगदीश मेघवाल, पृथ्वीराज मेघवाल व औंकार मेघवाल, बास जैसे का के चूनाराम जाट, ढाणी रणवा के भंवर लाल तथा खण्डवा के अम्मीलाल बुरड़क ने आवेदन किया है।
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चालू वित्तीय वर्ष के दौरान जिले में 12 कुण्ड बनाए जाने हैं। फिलहाल सात आवेदन प्राप्त हुए हैं। आवेदन के आधार पर किसानों का चयन किया जा रहा है। निर्धारित समय में कुण्ड निर्माण का लक्ष्य प्राप्त करने के पूरे प्रयास कर रहे हैं।
-डॉ. होशियार सिंह, उप निदेशक, कृषि विभाग, चूरू

Saturday, November 13, 2010

बिजली होगी अधिक 'दबंग'

ग्राम पंचायत विद्युत वितरण योजना : सर्किल में बनेंगे 43 जीएसएस, हर पंचायत का अलग फीडर
चूरू। जोधपुर विद्युत वितरण निगम ने चूरू सर्किल के ग्रामीण इलाकों की बिजली में नई जान फूंकने वाले तंत्र पर काम करना शुरू कर दिया है। इसके लिए ग्रिड सब स्टेशनों (जीएसएस) की संख्या बढ़ाने के साथ ही 11केवी के लम्बे फीडरों के बीच की दूरी घटाई जाएगी। यही नहीं बल्कि अब प्रत्येक ग्राम पंचायत का अपना अलग फीडर भी होगा। यह सब ग्राम पंचायत विद्युत वितरण योजना के तहत होगा। सब कुछ योजनानुसार हुआ तो जल्द ही बिजली वर्तमान की तुलना में अधिक 'दबंग' हो जाएगी। गांवों को चौबीस घंटे थ्री फेज बिजली मिल सकेगी। फिलहाल गांवों को कृषि कनेक्शनों की तर्ज पर छह से आठ घंटे तक ही थ्री फेज बिजली मिल रही है।
प्रत्येक तीन ग्राम पंचायतों पर होगा जीएसएस
चालू वित्तीय वर्ष से शुरू हुई इस योजना के तहत सर्किल की प्रत्येक तीन ग्राम पंचायतों पर एक-एक 33 केवी जीएसएस स्थापित होगा। चूरू जिले की कुल 249 व लाडऩू उपखण्ड की 32 ग्राम पंचायतों को ध्यान में रखते हुए 43 जीएसएस स्वीकृत किए गए हैं। इनमें से चालू वित्तीय वर्ष के अंत तक 26 जीएसएस स्थापित किए जाने की उम्मीद है। शेष जीएसएस का काम इनके बाद पूरा किया जाएगा।
ढीले नहीं रहेंगे तार
योजना के तहत 11केवी के लम्बी दूरी वाले फीडरों की दूरी घटाई जाएगी। दो फीडरों के बीच नए खम्भे लगाएंगे। इससे गांवों में ढीले तारों की समस्या नहीं रहेगी। छीजत घटने के साथ ही विद्युत व्यवधान भी कम हो जाएगा।
पहले चरण में यहां स्थापित होंगे जीएसएस
ब्लॉक --------गांव
चूरू के चलकोई बीकान
तारानगर के राजपुरा, धीरवास बड़ा, आनंदसिंहपुरा, मिखाला, झाड़सर कांधलान, लूणास व रैयाटुण्डा
राजगढ़ के चैनपुरा छोटा, राघा बड़ी व ढढ़ाल लेखू
सरदारशहर के रामसीसर, खींवणसर, बुकनसर, बिल्यूबास व मालसर
रतनगढ़ के नौसरिया, गौरीसर व बछरारा
सुजानगढ़ के शोभासर, रणधीसर व लोडसर
लाडनूं के मिठड़ी, बलदू, जसवंतगढ़ व रोडू
(शेष 17 जीएसएस अगले वित्तीय वर्ष में स्थापित होंगे।)

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नई योजना के तहत सर्किल में 43 जीएसएस की स्वीकृति मिली है। जल्द ही काम शुरू होगा। इसके बाद तीन पंचायतों पर एक जीएसएस हो जाएगा। साथ ही प्रत्येक ग्राम पंचायत को अपना अलग फीडर भी स्थापित करेंगे।
-केएल गुगरवाल, एसई, जेवीवीएनएल, चूरू

Wednesday, November 10, 2010

कमाल की कृष्णा

राष्ट्रमंडल खेलों की ट्रैक एंड फील्ड स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला डिस्कस थ्रोअर कृष्णा पूनिया से अंतरंग बातचीत।


किस तरह पहुंचीं इस मंजिल तक?
एक शादी समारोह में मेरे पिता की वीरेंद्रजी से मुलाकात हुई। उस दौरान वीरेंद्र देश के टॉप एथलीट्स में से एक थे। पहली बार में ही पिता ने उनको मेरे लिए पसंद कर लिया। मैं फाइनल ईयर में आई तो हमारी शादी हो गई। मेरी हाइट और पर्सनेलिटी को देखकर वीरेंद्र ने शादी के बाद खेल जारी रखने की इच्छा जाननी चाही। मैंने बिना कुछ सोचे-समझे हां कर दी। इसके बाद मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

पति ही आपके कोच हैं। कैसे तालमेल बिठाते हैं? घर पर किसकी चलती है?
दूसरी महिला खिलाडियों की तुलना में खुद को अधिक खुशनसीब मानती हूं। खेल के मैदान में पहुंचते ही हमारा रिश्ता बदल जाता है। हम पति-पत्नी की बजाय कोच और खिलाड़ी की तरह एक-दूसरे के साथ व्यवहार करते हैं। लेकिन मैदान के बाहर हमारे बीच एक अलग तरह का प्यारभरा रिश्ता है। मैदान में वीरेंद्र कोच के रूप में डांटते-फटकारते हैं तो घर पर पति का फर्ज भी बखूबी निभाते हैं। प्रशिक्षण के दौरान मेरी तकनीकी खामियों को लेकर अक्सर गुस्सा करते हैं, पर मैंने कभी बुरा नहीं माना। क्योंकि उस वक्त वे पति नहीं, बल्कि कोच की भूमिका निभा रहे होते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि हमने मैदान की बातों को कभी घरेलू जिंदगी में नहीं आने दिया।

प्रशिक्षण के वक्त पति के साथ का रोमांचक वाकया?
प्रशिक्षण के समय हम दोनों में छोटा-मोटा मजाक तो चलता रहता है। वैसे हम अलग तरह के रिजर्व नेचर के कपल हैं। पति में हमेशा से ही मैच्योरिटी रही है। वे ना तो अधिक गंभीर रहते हैं और ना ही लापरवाह। हमने अपना दायरा तय कर रखा है और उसी में रहकर खुद को पूरी तरह एंजॉय करते हैं। दोनों को ही बड़ी पार्टियां अच्छी नहीं लगतीं, पर घर पर अपनों के बीच समय बिताने का कभी कोई मौका नहीं छोड़ते।

बचपन की कोई याद?
मैं शुरू से संयुक्त परिवार में रही। बचपन में खूब मस्ती करते थे। घर में 200 भैंसें हुआ करती थीं। घर पर उनका दूध निकालती थी, बड़ा मजा आता था।

बेटे लक्ष्यराज को अकेला छोड़कर प्रेक्टिस करना... कितना मुश्किल रहा?
बेटे से दूर जाने का मन नहीं करता, पर खेल के लिए सब कुछ करना पड़ता है। पर खुशी इस बात की है कि लक्ष्यराज संयुक्त परिवार में रहकर संस्कार सीख रहा है। वह अपनी दादी और चाची के पास भी बड़ा खुश रहता है।

खाली समय में क्या करती हैं?
मुझे पढ़ना पसंद है। प्रेक्टिस और घरेलू कामों के बाद समय मिलता है तो गीता, रामायण जैसी धार्मिक पुस्तकें पढ़ती हूं।

मैं हूं ऑलराउंडर
अपने आप को सेलिब्रिटी या आम गृहिणी की बजाय ऑलराउंडर कहना चाहूंगी। एक ऎसी ऑलराउंडर जो खेल, घर-परिवार और रेलवे की डयूटी को बखूबी पूरा करती हूं। जब घर पर होती हूं तो खाना बनाने और कपड़े धुलाने से लेकर बर्तन तक साफ करवा देती हूं। यह सब देख सास और देवरानियां मुझे घरेलू काम करने की बजाय आराम करके प्रशिक्षण की थकान मिटाने की सलाह देती नहीं थकतीं।

घर वालों का प्यार
देवर सतीश, विनोद और देवरानी ओम और राजबाला ने मेरे बेटे लक्ष्यराज को मम्मी-पापा का प्यार दिया। यही वजह है कि बेटे को एक वर्ष का छोड़कर मैं तैयारियो में जुट गई थी। 2004 के बाद तो साल-साल भर तक बेटे से दूर रही। बेटे के स्कूल में पैरेंट्स मीटिंग में कभी नहीं जा पाई, मगर देवर-देवरानियों ने कभी मेरी कमी महसूस नहीं होने दी। इसी वजह से मैंने बेटे की चिंता किए बगैर दिन-रात खेल पर ध्यान दिया। रही बात सास के रवैये कि तो यही कहूंगी कि उनके कोई बेटी नहीं है और मैंने बचपन में अपनी मां को खो दिया था। अब सास के रूप में मुझे मां और उन्हें मेरी जैसी बेटी मिल गई है। हमारा परिवार संयुक्त होने के बावजूद मुझे कभी किसी से गिला-शिकवा नहीं रहा। घर के प्रत्येक सदस्य का रवैया कुछ ऎसा है कि लगता है मैं ससुराल नहीं,बल्कि अभी भी मायके में ही रह रही हूं।

हिसाब-किताब

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