Monday, October 22, 2007

'उम्मीद' की फसल

चूरू, २२ अक्टूबर। चूरू जिले के किसान फसलों का बीमा कराने से कतराते हैं। हालांकि पिछले तीन साल में जिले के करीब एक लाख किसानों को तीस करोड़ से अधिक का मुआवजा मिला है लेकिन मुआवजा निर्धारण के लिए तहसील को इकाई माने जाने से हजारों किसान फसल बर्बाद होने के बाद भी मुआवजे से वंचित रह गए। जिले की केन्द्रीय सहकारी बैंक के आंकड़ों के मुताबिक 2004 में खरीफ फसलों में हुए नुकसान का साढ़े चार करोड़ से अधिक मुआवजा किसानों को दिया गया। रबी सीजन में दो करोड़ से अधिक मुआवजा दिया गया। 2005 में छह करोड़ से अधिक तथा 2006 में छह करोड़ अ_ïावन लाख से रुपए से अधिक मुआवजा किसानों को मिला। इसके बावजूद तहसील को इकाई मानने के कारण कई हजार किसानों को मुआवजा नहीं मिला क्योंकि उनके गांव जिस तहसील में थे वह सूखाग्रस्त घोषित नहीं हुई थी। यहां उल्लेखनीय है कि चूरू जिले के विभिन्न इलाकों में कई ग्राम पंचायतें और राजस्व गांव सूखा पीडि़त होते हैं लेकिन औसत वर्षा के आधार पर उनकी तहसील सूखाग्रस्त नहीं मानी जाती। इस वजह से हकदार होने के बावजूद उन्हें मुआवजा नहीं मिल पाता है।
क्या है योजना
अकाल पीडि़त इलाकों में किसानों को राहत देने के लिए राष्टï्रीय कृषि बीमा योजना 2003 से लागू हुई है। योजना के तहत फसलों का न्यूनतम प्रीमियम किसानों से लिया जाता है।
आधारभूत नियम
योजना के नियमानुसार किसानों को बीमा का लाभ देने के लिए तहसील स्तर पर सूखा घोषित किया जाता है। जिस तहसील को सूखाग्रस्त घोषित किया जाता है उसी के किसानों को बीमा का लाभ मिलता है।
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योजना में तहसील को इकाई माना जाता है जबकि वास्तव में राजस्व गांव और पंचायत को इकाई माना जाना चाहिए। कई बार ऐसा हो चुका है कि आधी तहसील में अकाल पड़ा है और आधी में जमाना हुआ है।
इन्द्र सिंह शेखावत- वरिष्ठ प्रबंधक- केन्द्रीय सहकारी बैंक
इस नियम पर योजना के शुरुआत में ही अंगूली उठाई गई थी। सही मायने में इस नियम में बदलाव की आवश्यकता है। सहायक कृषि अधिकारी-शंकरलाल बेड़ायोजना तो सही है, लेकिन तहसील की अपेक्षा पंचायत को सूखाग्रस्त किया जाना चाहिए तभी किसानों को योजना का वास्तविक लाभ मिल पाएगा। रामनारायण जाट- गांव- लोहसना बड़ा, चूरू

हिसाब-किताब

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