Tuesday, December 14, 2010

प्रशासन तक होगी सीधी पहुंच

'सुगम' करेगा राह आसान : जिला और तहसील मुख्यालयों पर बनेंगे सुगम सेंटर
चूरू। प्रदेश में जाति प्रमाण पत्र बनवाने से लेकर हथियार लाइसेंस के लिए आवेदन करने वाले लोगों तक को अब अधिकारी और कर्मचारियों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। जन-जन की यह परेशानी सुगम प्रोजेक्ट दूर करेगा। प्रोजेक्ट के तहत प्रदेश के जिला और तहसील स्तर पर एक-एक सुगम सेंटर खोला जाएगा। सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार विभाग ने सेंटर शुरू करने की अंतिम तिथि 31 मार्च 2011 निर्धारित की है। सेंटर पर कम्प्यूटर, प्रिंटर, स्केनर व विभिन्न प्रमाण पत्र के आवेदन फार्म उपलब्ध कराए जाएंगे। सब कुछ योजनानुसार हुआ तो आमजन की न केवल प्रशासन तक पहुंच आसान होगी बल्कि प्रमाण पत्र बनवाने में लगने वाला समय और अनावश्यक खर्च भी बचाया जा सकेगा।

प्रारूप पर नहीं उठेगी अंगुली
सुगम सेंटर शुरू होने के बाद प्रदेशभर में जाति, मूल निवास व आय समेत अनेक प्रमाण पत्र का स्टैण्डर्ड प्रारूप तय हो जाएगा। जिससे नौकरी के दौरान या अन्य कभी आवश्यकता पडऩे पर प्रमाण पत्र के प्रारूप पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकेगा। साथ ही फर्जी प्रमाण पत्र बनवाने पर भी काफी हद तक अंकुश लगेगा। फिलहाल प्रदेशभर में प्रमाण पत्रों के अलग-
अलग प्रारूप प्रचलित हैं।

जाति नहीं करा सकेगी गड़बड़ी
सुगम सेंटर पर उपलब्ध 'सुगम सॉफ्टवेयरÓ में एससी, एसटी व ओबीसी वर्ग में भारत सरकार की ओर से निर्धारित जाति एवं उनकी उप जाति की सूची फीड रहेगी। प्रमाण पत्र बनवाते समय किसी जाति विशेष के वर्ग को लेकर विवाद होने पर सूची में मिलान किया जा सकेगा। इससे गलत जाति का प्रमाण पत्र बनवाने की संभावना पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। वर्तमान में किसी वर्ग विशेष में शामिल जाति का मिलान करने के लिए कार्मिकों को काफी समय खपाना पड़ता है।

ऐसे होगा आवेदन, यूं मिलेगा प्रमाण पत्र
आवेदक को सेंटर से फार्म लेना होगा। जिस पर फार्म के साथ संलग्र किए जाने वाले अन्य दस्तावेजों की सूची भी रहेगी। फार्म जमा कराने पर आवेदक को जमा की रसीद या नम्बर देने के साथ ही भविष्य में सेंटर पर आकर प्रमाण पत्र प्राप्त का दिन और समय भी बताया जाएगा। प्रमाण पत्र पर संबंधित अधिकारियों के हस्ताक्षर एवं मोहर लगवाने का काम सेंटर अपने स्तर पर पूरा करेगा।
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प्रदेश के एकाध जिले में सुगम प्रोजेक्ट चल रहा है, मगर तहसील स्तर पर सेंटर पहली बार बना रहे हैं। जिला कलक्टरों को इस संबंध में दिशा-निर्देश दिए जा रहे हैं। जाति, मूल निवास, राशन कार्ड व लाइसेंस बनवाने समेत अनेक सुविधाएं सेंटर पर उपलब्ध करवाई जाएगी। जिला कलक्टर स्व विवेक से सेंटर पर अन्य सुविधाएं बढ़ा भी सकेंगे।
-संजय मलहोत्रा, सचिव व आयुक्त
सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार विभाग


जिला व तहसील स्तर पर सुगम सेंटर स्थापित करने के लिए कार्य शुरू कर दिया है। एक अप्रेल से हर हाल में लोगों को इनका लाभ मिलने लगेगा। सेंटर से संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। फिलहाल भवन की तलाश व अन्य संसाधन जुटाए जा रहे हैं।
-विकास एस भाले, जिला कलक्टर, चूरू

Tuesday, December 7, 2010

कल्याण की राह में अधिकारी रोड़ा

झण्डा दिवस के ध्वज व स्टीकरों के लाखों बकाया
चूरू। शहीदों की शहादत पर गर्व महसूस करने वाले अधिकारी ही उनके परिवार और आश्रितों के कल्याण की राह में बाधा बने हुए हैं। बात भले ही गले नहीं उतर रही हो, परन्तु सरकारी कार्यालयों में धूल फांकते सशस्त्र सेना झण्डा दिवस के स्टीकर और ध्वज देख इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। आलम यह है कि अधिकांश अधिकारी शहीदों के आश्रितों को संभल प्रदान करने मेंं कतई गंभीर नहीं है। झण्डा दिवस के मौके पर पत्रिका टीम ने जिला सैनिक कल्याण अधिकारी कार्यालय के रिकॉर्ड खंगाले तब अधिकारियों का यह दूसरा चेहरा सामने आया।
जिलेभर में 63 अधिकारी शहीदों के आश्रितों के कल्याण के 11 लाख 62 हजार 750 रुपयों पर कुंडली मारे बैठे हैं। अधिकारियों को इस राशि के स्टीकर और ध्वज 1996 से 2009 के दौरान वितरित किए गए थे। ऐसे में अधिकारियों के भरोसे शहीदों के परिवारों का मनोबल बढ़ाने की सोचना बेमानी होगा। हालांकि प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी जिलेभर के 96 अधिकारियों को 100 से 6000 स्टीकर व ध्वज वितरित किए जाएंगे। लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ अगर कोई कदम नहीं उठाया गया तो इस साल के स्टीकरों और ध्वज को भी सरकारी कार्यालयों में धूल फांकने में देर नहीं लगेगी।

बढ़ता बकाया का आंकड़ा
वर्ष ------बकाया
1996------ 2000
1997------ 2000
1998------ 500
1999------ 2300
2000------ 1200
2001------ 400
2003------ 13000
2004------ 3000
2005------ 5700
2006------ 26920
2007------ 43600
2008------ 476800
2009------ 585330
कुल------ 11,62,750

सर्वाधिक लापरवाह डीटीओ
कल्याण की राह में रोड़ा बनने वाले अधिकारियों में बकाया के लिहाज से जिला परिवहन अधिकारी पहले पायदान पर हैं। डीटीओ पर वर्ष 2008 के एक लाख 97 हजार रुपए तथा वर्ष 2009 के दो लाख 25 हजार रुपए बकाया हैं। पीएचईडी के एसई व एसपी पर बकाया का आंकड़ा एक लाख को पार कर चुका है। बकाया के मामले में अन्य अधिकारियों की स्थिति भी ज्यादा अच्छी नहीं है।

क्या झण्डा दिवस
देश की आन, बान और शान के लिए जान की बाजी लगाने वाले शहीद की याद और सेवारत सैनिकों के साथ राष्ट्र की एकजुटता दर्शाने के उदे्श्य से प्रतिवर्ष सात दिसम्बर को देशभर में झण्डा दिवस मनाया जाता है। इस दिन विभिन्न विभागों को विशेष प्रकार के ध्वज व स्टीकर वितरित किए जाते हैं। जिन्हें वाहनों पर लगाकर या जन समूह को वितरित कर राशि जुटाई जाती है। यह राशि जिला सैनिक कल्याण कार्यालय के माध्यम से अमल गमैटेड फण्ड में भेजी जाती है। जिसका उपयोग युद्ध विकलांग एवं शहीदों के परिवारों का पुर्नवास, सेवानिवृत व सेवारत सैनिकों एवं उनके परिवारों के लिए संचालित कल्याणकारी योजनाओं में किया जाता है।

यूं जमा होगी राशि
इस वर्ष प्रति स्टीकर दस रुपए तथा प्रति वाहन पताका (ध्वज) पचास रुपए निर्धारित किए गए हैं। स्टीकर व ध्वज से एकत्रित की गई राशि अधिकारियों को नकद, ड्राफ्ट या चेक के माध्यम से जिला सैनिक कल्याण अधिकारी कार्यालय में जनवरी तक जमा करानी होगी।

अधिकारियों के वेतन में से काटेंगेइस वर्ष स्टीकर एवं ध्वज का वितरण करने के एक माह ही इसकी समीक्षा की जाएगी। वर्षों पुराने बकाया की भरपाई संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों के वेतन में से काटकर करेंगे। इस बार बचे हुए स्टीकर व ध्वज को कार्यालय में रखने की बजाय सैनिक कल्याण अधिकारी कार्यालय वापस लौटा देंगे।
-विकास एस भाले, जिला कलक्टर एवं जिला सैनिक बोर्ड के अध्यक्ष, चूरू

Monday, December 6, 2010

घर छोटा परिवार बढ़ा

क्षमता से दोगुने अधिक हिरण करते विचरण
चूरू। काले हिरणों के विश्व प्रसिद्ध तालछापर अभयारण्य वर्षों से अपने विस्तार को तरस रहा है। अभयारण्य में हिरणों का कुनबा लगातार बढ़ता जा रहा है, मगर क्षेत्रफल जस का तस है। स्थिति यह है कि यहां पर हिरणों की संख्या क्षमता से दोगुनी अधिक है। यही वजह है कि भोजन तलाश एवं स्वच्छंद विचरण के लिए अभयारण्य सीमा से बाहर निकलकर कई हिरण अकाल मौत का शिकार हो रहे हैं। वन विभाग पिछले तीन वर्ष से अभयारण्य के विस्तार का प्रयास कर रहा है, परन्तु प्रशासनिक शिथिलता और राज्य सरकार की अनदेखी के चलते योजना को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है। जिम्मेदार जनप्रतिनिधि भी इस कार्य में रुचि लेते नहीं दिख रहे हैं।
वन विभाग अभयारण्य की दक्षिणी-पश्चिमी से सटी से सरकारी भूमि को अभयारण्य में मिलाकर इसके विस्तार का प्रयास कर रहा है। लगभग चार सौ हैक्टेयर में फैली इस भूमि पर नमक की 34 इकाइयां स्थापित हैं। इनमें से 10 इकाइयों के पट्टे निरस्त कर दिए गए हैं जबकि दो इकाइयां बंद हैं। अभयारण्य के विकास को लेकर होने वाली बैठकों में यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया जाता रहा है। इस साल 24 जून को जिला कलक्टर की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में जिला उद्योग केन्द्र के महाप्रबंधक नमक की आठ इकाइयों की भूमि, जिस पर कोई नहीं की वजह से वन विभाग को सौंपे जाने की सहमति जता चुके हैं। इसी बैठक में सुजानगढ़ के तहसीलदार ने अभयारण्य के विस्तार के लिए नमक की शेष इकाइयों के पट्टों का नवीनीकरण रोकने तथा पट्टाधारियों को नावा या अन्यत्र क्षेत्र में स्थानांनतरित करने का सुझाव दिया था। आधिकारिक सूत्रों की मानें तो अभयारण्य के विस्तार का प्रस्ताव और नमक इकाइयों के सर्वे की रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी हुई है। लेकिन सरकार अभी तक इस मुदद्े को गंभीरता से नहीं लिया है।

यूं बढ़ेगा क्षेत्रफल
तालछापर अभयारण्य 719 हैक्टेयर में फैला हुआ है। नमक इकाइयों की लगभग 16 सौ बीघा भूमि मिलने पर अभयारण्य का क्षेत्रफल तकरीबन चार सौ हैक्टेयर बढ़कर एक हजार 119 हैक्टेयर हो सकता है। वन विशेषज्ञों के मुताबिक एक हिरण को स्वच्छंद विचरण करने के लिए करीब एक हैक्टेयर क्षेत्रफल की आश्यकता होती है। हालांकि इस लिहाज यह क्षेत्रफल भी पर्याप्त नहीं कहा जा सकता।

इसलिए विस्तार जरूरी
-हिरणों को स्वच्छंद विचरण के लिए मिलेगा अधिक क्षेत्र।
-चारागाह विकसित कर प्राकृतिक चारे की कमी दूरी होगी।
-मीठे पानी के जलस्रोतों की संख्या में होगा इजाफा।
-हिरणों का नमक इकाइयों के गड्ढ़ों में गिरना बंद होगा।
-आवारा कुत्तों व शिकारियों से अधिक सुरक्षित होंगे हिरण।

साल दर साल बढ़ते हिरण
चूरू जिले की सुजानगढ़ तहसील के छापर कस्बे में स्थित अभयारण्य में हिरणों का कुनबा तेजी से बढ़ रहा है। अपे्रल 2010 में की गई वन्यजीव गणना के मुताबिक अभयारण्य में हिरणों की संख्या एक हजार 910 से बढ़कर दो हजार 25 हो गई है। हिरणों की संख्या अधिक बढ़ सकती थी, मगर बीते दो वर्ष के दौरान तेज अंधड़ व बारिश की वजह से तकरीबन सौ हिरण अकाल मौत का शिकार हो गए थे। अभयारण्य के विस्तार की आवश्यकता सात-आठ वर्ष पूर्व ही महसूस की जाने लगी थी, परन्तु इस दिशा में तीन वर्ष पूर्व कदम बढ़ाए गए हैं।

जसवंतगढ़ में भी तलाशी जगह
हिरणों की संख्या बढऩे के साथ-साथ अभयारण्य के विस्तार का दबाव भी बढ़ता जा रहा है। ्रऐसे में वन विभाग ने नागौर जिले की लाडऩूं तहसील के जसवंतगढ़ कस्बे में हिरणों के लिए अनुकूल जगह तलाशी है। यहां पर तकरीबन पांच सौ हिरण स्थानांनतरित करने की योजना पर विचार किया जा रहा है, लेकिन वहां भारी मात्रा में जूली फ्लोरा होना योजना की राह में
सबसे बड़ी बाधा है।

कुरजां भी हैं पहचान
तालछापर में काले हिरणों के अलावा कुरजां, जंगली बिल्ली, मरु लोमड़ी, साण्डा, गिद्धसमेत अन्य कई वन्यजीव पाए जाते हैं। सात समंदर पार से हर साल सैकड़ों की संख्या में आने वाली कुरजां भी अभयारण्य की पहचान हैं। कुरजां यहां पर अक्टूबर-मार्च तक शीतकालीन प्रवास करती हैं। इस वर्ष अभयारण्य में विश्व स्तर पर संकटग्रस्त पक्षी सोशिएबल लैप विंग भी नजर आया था।

इनका कहना है...
तालछापर में हिरणों की संख्या क्षमता से अधिक हो जाने के कारण गत तीन वर्ष से इसके विस्तार का प्रयास कर रहे हैं, मगर अभी तक सफलता नहीं मिली है। अभयारण्य के पास स्थित सरकारी भूमि को अधिगृहित करने के मामले के निर्णय राज्य सरकार के स्तर पर होना है। जिला प्रशासन, जिला उद्योग केन्द्र व राज्य सरकार को समय-समय पर पत्र लिखते रहते हैं, मगर अभयारण्य का विस्तार कब होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। इसके अलावा लाडनूं के जसवंतगढ़ के पास हिरणों के लिए अनुकूल जगह तलाशी है।
-केसी शर्मा, उप वन संरक्षक, चूरू

नमक इकाइयों का सर्वे करके रिपोर्ट विभाग के उच्चाधिकारियों को सौंप दी है। कुल 34 इकाइयों में से 22 कार्यरत हैं। कइयों के मामले न्यायालय में विचारधीन हैं। उक्त भूमि को अभयारण्य में मिलाए जाने का निर्णय उच्च स्तर पर होना है।
-जितेन्द्र सिंह शेखावत, जिला उद्योग अधिकारी, सुजानगढ़

Sunday, December 5, 2010

'खाकी' के सामने बेबस है 'करंट'

[ चौकी-थानों पर बढ़ता बकाया ] : बिल के नाम पर ठेंगा
चूरू.जिले में 'खाकी' का रौब विद्युत निगम पर भारी पड़ रहा है। किसी दिन बिजली की कटौती हो जाए तो 'खाकियों' का तत्काल टेलीफोन पहुंच जाता है, लेकिन बिल जमा करवाने की बारी हो तो खाकी 'ठेंगा' दिखाने से भी नहीं चूकते। विद्युत निगम के खिलाफ होने वाले आन्दोलन एवं धरने प्रदर्शन के दौरान पुलिस महकमे की जरूरत पडऩे के कारण विद्युत निगम के अभियंता भी इनके सामने बेबस नजर आते हैं। हालत यह है कि चूरू जिले व लाडनूं के 28थानों एवं चौकियों में फूंकी जाने वाली बिजली के बिलों के पेटे हर साल औसतन एक लाख रुपए बकाया हो जाता है। बिलों की बकाया राशि सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही हैं, वहीं विद्युत निगम इनके कनेक्शन काटने की हिम्मत भी नहीं जुटा पा रहा है।
एक लाख हो गए दस लाख
सूचना का अधिकार कानून के तहत खुलासा हुआ है कि पुलिस महकमा बिजली के बिल चुकाने के प्रति गम्भीर नहीं है। महकमे पर जिले में बिजली बिलों के पेटे 2001 में करीब एक लाख 21 हजार रुपए बकाया थे। लेकिन बिल जमा नहीं करवाने से यह राशि अगस्त 2010 में बढ़कर 10 लाख 19 हजार के पार पहुंच गई।
आधा दर्जन के हालात खराब
जिले के आधा दर्जन थानों एवं चौकियों के बिलों के आंकड़े खुलासा करते हैं कि दस साल में अधिकांशतया इनका बिल नहीं चुकाया गया। राजगढ़ एवं छापर पुलिस थाने एवं साण्डवा पुलिस चौकी पर बकाया का आंकड़ा करीब डेढ़-डेढ़ लाख रुपए को पार कर गया है। राजगढ़ चौकी पर एक लाख 27 हजार 178 रुपए बकाया होने पर विद्युत कनेक्शन काट दिया गया। हालांकि बिल जमा करवाने के मामले में सभी जगह हालात एक जैसे नहीं है। सादुलपुर ग्रामीण, चूरू ग्रामीण और चूरू शहर पुलिस थाना ऐसे भी हैं, जिन पर बिजली बिल पेटे एक रुपया भी बकाया नहीं है।
जानते ही नहीं बिल चुकाना
थाना/चौकी-2001-----२०१०
साण्डवा---6703.76--1,63,481.45
राजगढ़----1541----1,61,259.64
छापर-----13609---1,49,781.20
विभाग का दावा, पुराना है बकाया
वर्तमान में बिजली के बिलों का नियमित रूप से भुगतान किया जा रहा है। पांच-सात साल पूर्व के कुछ बिल बकाया हैं। जिनका भुगतान करवाने का प्रयास कर रहे हंै। बजट के लिए मुख्यालय को लिखा गया है।
- अनिल कयाल, एएसपी, चूरू
क्या करें, पुलिसवाले जो हैं
थानों व चौकियों पर बिजली के बिलों की राशि लगातार बढ़ती जा रही है। बकाया वसूली के लिए बार-बार नोटिस जारी करते हैं। पुलिस विभाग के अधिकारी सुनवाई नहीं करते। आम उपभोक्ता का तो शीघ्र ही कनेक्शन काट देते हैं, लेकिन पुलिस के रौब के चलते कोई सख्त कदम नहीं उठा पाते हैं। गत एक दशक के दस लाख रुपए से अधिक बकाया हैं।
-के.एल. घुघरवाल, अधीक्षण अभियंता, जोधपुर विद्युत वितरण निगम, चूरू

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