Friday, April 30, 2010

आपणी की निशानी गंदला पानी

स्वच्छता की कसौटी पर खरा नहीं
नमूनों की जांच में हुआ खुलासा
चूरू, 29 अप्रेल। आपणी योजना का पानी शुद्धता और स्वच्छता की कसौटी पर पूर्णतया खरा नहीं उतर पाया है।नहर के गंदले पानी को साफ करने के मापदण्डों की जानबूझकर अनदेखी की जा रही है। योजना के कर्मसाना फिल्टर प्लांट पर तो पानी की स्वच्छता के लिए फिटकरी (एलएम डोज) अंदाजे से डाली जा रही है। वांछित मात्रा से कम फिटकरी डाले जाने का ही परिणाम है कि घरों में गंदले पानी की ही आपूर्ति होती रही है। शिकायत मिलने पर जलदाय विभाग के लोग उपभोक्ता की लाइन में कई रिसाव होने का बहाना बनाकर सच्चाई को झुठलाते रहे हैं।यह खुलासा जलदाय विभाग के रसायनज्ञों की एक टीम की ओर से की गई जांच में हुआ है। रसायनज्ञों ने जांच रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को सौंप दी है। जिसमें कर्मसाना फिल्टर प्लांट में नहर के पानी की टर्बिडिटी के अनुसार फिटकरी की मात्रा रोजाना तय करने तथा साहवा फिल्टर प्लांट पर बंद पड़ी प्रयोगशाला को अति शीघ्र शुरू करवाने की सिफारिश की गई है।

ऐसे हुआ खुलासा
सीकर, चूरू व झुंझुनूं के रसायनज्ञों की टीम ने बीस अप्रेल को कर्मसाना व साहवा फिल्टर प्लांट व फील्ड से पानी के 19 नमूने लिए थे। चूरू स्थित जलदाय विभाग की प्रयोगशाला में नमूनों की गहनता से जांच की गई। दोनों फिल्टर प्लांटों का पानी जीवाणु व रासायनिक परीक्षण में सफल रहा परन्तु कर्मसाना फिल्टर प्लांट के पानी में फिल्टरेशन की प्रक्रिया में कमी उजागर हुई है। यहां से फिल्टर होकर घरों तक पहुंच रहे पानी में गंदलापन यानि टर्बिडिटी 6 एनटीयू (नेथलोमेट्रिक टर्बिडिटी यूनिट) पाई गई। जबकि पानी में वांछित मात्रा में फिटकरी मिलाई जाती तो टर्बिडिटी की मात्रा शून्य तक आ सकती थी। हालांकि पानी में दस एनटीयू तक की टर्बिडिटी स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक नहीं है लेकिन निर्धारित मात्रा से अधिक तथा हानिकारक तत्वों के कारण टर्बिडिटी होने पर स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।
रोज तय हो मापदण्ड
फिल्टर प्लांट पर नहर का पानी पहुंचते ही लैब में पानी की टर्बिडिटी की लैब में जांच कर उसमें मिलाई जाने वाली फिटकरी की मात्रा तय की जाती है। पानी की टर्बिडिटी घटती-बढ़ती रहती है। इसलिए फिटकरी डालने से पूर्व टर्बिडिटी जांच की प्रक्रिया रोजाना अपनाई जानी आवश्यक है। जबकि वर्तमान में सारा काम अनुमान से हो रहा है। टर्बिडिटी जांच के लिए प्लांट पर पर्याप्त स्टाफ ही नहीं है।

टर्बिडिटी के कारण
-नहर में पानी के प्रवाह का तेज होना।
-पानी की पम्पिंग तेजी से होने।
-अत्यधिक गर्मी व अधिक वाष्पीकरण।
-नहर में कचरा डाल दिए जाने।
-नहरबंदी के चलते रुका पानी आने।
-पानी में शैवाळ जमे होने।
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नमूनों की जांच रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को भेज दी है। कर्मसाना फिल्टर प्लांट पर समुचित एलएम डोज के लिए संबंधित अधिकारियों को लिखा गया है। साथ ही साहवा फिल्टर प्लांट स्थित प्रयोगशाला को शीघ्र शुरू करवाने की आवश्यकता जताई है।
-सुशील कुमार शर्मा, कनिष्ठ रसायनज्ञ, पीएचईडी, चूरू

Thursday, April 22, 2010

कम बोएंगे कम ही काटेंगे

खरीफ की बुवाई घटने का अनुमान, विभाग ने तय किए लक्ष्य
चूरू, 22 अप्रेल। कृषि विभाग ने खरीफ की बुवाई व उत्पादन के लक्ष्य तय कर लिए हैं। इस बार बुवाई क्षेत्रफल घटने के साथ ही प्रति हैक्टेयर हजारों किलोग्राम उत्पादन औंधे मुंह गिरने का अनुमान है। विभाग ने खरीफ फसलों के १२ हजार 400 क्विंटल बीज तथा 4 हजार 300 मेट्रिक टन उर्वरक भी मुख्यालय से मांग लिए हैं।
विभागीय जानकारी के अनुसार इस बार 11 लाख 32 हजार हैक्टेयर में खरीफ फसलों की बुवाई होने का अनुमान है, जो गत वर्ष की वास्तविक बुवाई से 51 हजार हैक्टेयर कम है।
मौसम मेहरबान रहा तो इस बार कम से कम जिले में खरीफ की 5 लाख 15 हजार मेट्रिक टन पैदावार होने की उम्मीद है। हालांकि गत वर्ष 5 लाख 31.5 हजार मेट्रिक टन पैदावार हुई थी।
इसी प्रकार खेतों में प्रति हैक्टेयर उत्पादन भी घटेगा। इस बार बाजरा, मूंग, मोठ, मूंगफली, तिल व ग्वार का प्रति हैक्टेयर 3 हजार 295 किलोग्राम उत्पादन होने का अनुमान है। जबकि गत वर्ष प्रति हैक्टेयर 4 हजार 8 25 किलोग्राम उत्पादन प्राप्त हुआ था।

इतने बीज मांगें
फसल मात्रा
बाजरा 4600
मूंग 2300
मोठ 4500
ग्वार 1000
(आंकड़े क्विंटल में)

इतनी चाहिए खाद
खाद मात्रा
यूरिया 3000
डीएपी 1000
एसएसपी 200
एनपीके 100
(आंकड़े मेट्रिक टन में)

बुवाई का अनुमान
फसल क्षेत्रफल
बाजरा 425000
मूंग 30000
मोठ 360000
मूंगफली 16000
तिल 1500
ग्वार 299500
(आंकड़े हैक्टेयर में)
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खरीफ फसलों की बुवाई, उत्पादन के लक्ष्य तथा बीज व खाद की मांग तय कर ली है। बारिश की अनियमितता के कारण इस बार बुवाई कम होने के आसार हैं। इससे कुल उत्पादन भी घटेगा।
-हरपाल सिंह, कृषि अधिकारी, चूरू

Tuesday, April 20, 2010

अजब 13 की गजब कहानी

ग्राम से गदर तक रहा साथ

राशिफल और अंकों के फेर में पडऩा मुझे कतई पसंद नहीं। मेरे शब्दकोष में दोनों के कोई मायने नहीं हैं। खासकर पत्रकारिता जैसे चुनौतिपूर्ण क्षेत्र में कॅरियर बनाने की जद्दोजहद शुरू करने के बाद से मैंने अपने आप में यह बदलाव महसूस किया है। मेरा मानना है कि राशिफल और शुभ अंक हमें दिमागी तौर पर संतुष्ट या विचलित कर सकते हैं। इससे ज्यादा दोनों में कुछ नहीं रखा।
दोस्तों हाल ही मैंने ग्राम से 'ग्राम गदर' (पुरस्कार) तक कľ सफर तय किया तो महीने के तेरहवें दिन ने मुझे शुभ अंक के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया।
मुझे अब लगने लगा है कि मेरे कॅरियर और 13 तारीख का चोली-दामन का सा साथ हो गया है। यह सब एकाएक नहीं हुआ, बल्कि पिछले चार साल से ऐसा हो रहा है। यह जरूर है कि इसका अहसास मुझे हाल ही हुआ है। कॅरियर के हर छोटे-बड़े फैसलों में महीने का तेरहवां दिन अहम भूमिका निभा रहा है।
वर्ष 2006 में स्नातक पूरी करने के बाद पत्रकारिता को बतौर कॅरियर चुना तो जयपुर स्थित द माइंडपूल स्कूल ऑफ जर्नलिज्म में 13 जुलाई को दाखिल हुआ। उस वक्त जिंदगी में 13 के अंक ने पहली बार प्रवेश लिया और अब तक बखूबी साथ दे रहा है।
पत्रकारिता का छह माह तक किताबी ज्ञान लेने के बाद संस्थान ने मुझे राजस्थान पत्रिका के सीकर संस्करण में खबरनवीब बनने भेजा। यहां पर 13 फरवरी 2007 से प्रशिक्षण का आगाज हुआ। सीकर में एक माह भी नहीं बीता कि संस्थान ने राजस्थान पत्रिका के बंगलौर संस्करण में प्रशिक्षण लेने का फरमान सुना दिया।
सात मार्च 2007 को झुंझुनूं जिले की नवलगढ़ तहसील के गांव झाझड़ से बंगलौर के लिए रवाना हुआ। कुछ दिन पूना में चचेरे भाई के पास रुककर 12 मार्च को बंगलौर पहुंचा। बंगलौर के बारे में जैसा लोगों से सुना वो उससे भी अधिक सुन्दर था। पहले दिन किराए का मकान देखने तथा सफर की थकान मिटाने के कारण विधिवत रूप से 13 मार्च को बंगलौर संस्करण ज्वाइन कर सका।
बंगलौर में पत्रकारिता के काफी गुर सीखे। खुद को दक्षिण भारतीय संस्कृति में ढालने का प्रयास kइया. साथ ही कन्नड़ और अंग्रेजी भाषा पर भी पकड़ बनानी चाही। इन सब के बीच कब छह माह बीत गए पता ही नहीं चला। आखिर मैंने प्रशिक्षण पूरा होते ही बंगलौर छोड़ दिया। यह भी इत्तेफाक ही था कि जिस दिन बंगलौर से जयपुर के लिए रवाना हुआ, वह दिन अगस्त माह का तेहरवां दिन था।
इसके बाद अक्टूबर 07 में अगला पड़ाव फिर से सीकर संस्करण होते हुए राजस्थान पत्रिका के चूरू ब्यूरो कार्यालय में डाला। यहां जो कुछ सीखने को मिला, दूसरी जगह वह शायद ही मिलता। चूरू में रहकर न केवल मैंने ग्रामीण पत्रकारिता को करीब से जाना बल्कि विधानसभा, लोकसभा, निकाय और पंचायत चुनाव भी देखे। चुनावों में हर दृष्टिकोण से खबरें बनाईं। साथ ही ग्रामीण पत्रकारिता से भी जुड़ाव रहा।
समय का पहिया घूमा और 2010 में त्रकारिता के तीन साल पूरे कर लिए। इस साल अप्रेल में कट्स इंटरनेशनल की ओर से गांवों में जल संरक्षण एवं प्रबंधन विषय पर उत्कृष्ठ लेखन के कारण मुझे प्रतिष्ठित पुरस्कार ग्राम गदर के लिए चुन लिया गया। दोस्तों मेरे कॅरियर का सबसे खुशनसीब यह दिन 13 अप्रेल था। अब तो शायद आपको भी यकीन हो गया होगा मेरी अजब कहानी में 13 का अंक कुछ गजब ढा रहा है।

Sunday, April 18, 2010

अपनों ने ही बना दी पराई

किस्से और कहानियां बनी पेयजल उपलब्धता,
आगामी सरकारी योजनाएं खटाई में पडऩे के आसार
सन्तोष गुप्ता/विश्वनाथ सैनी
चूरू, 18 अप्रेल। लोगों ने घरों में घड़े भरकर रखना बंद कर दिया था। गृहिणियां रात सुकून से सोने लगी थी। अल सुबह उठने और मीलों पैदल चलने व सिर पर घड़े रख पानी लाने की चिंता उन्हें सताती नहीं थी। मेहमान के आने पर बच्चे दौड़कर सीधे टूटी से गिलास में ही ताजा पानी भर ले आते थे। रात को दो बजे भी पानी की जरूरत होती तो टूटी खोलते ही पानी उपलब्ध हो जाता था। मवेशियों की खेळियां और परिंदों के परिण्डे तक दिन भर भरे रहते थे। गांव के लोग पानी का मूल्य समझने लगे थे। नल से
पानी व्यर्थ बहते कोई देख लेता था तो तुरन्त टोक देता था या खुद टूटी बंद कर देता था। चौबीस घंटे पीने के लिए शीतल, शुद्ध और स्वच्छ पानी की उपलब्धता बनी रहती थी। ये बाते भले ही अब किस्से और कहानी सी लगती हों लेकिन यह सच्चाई है जो अब चूरू, झुंझुनूं और हनुमानगढ़ वासियों की जुबान से किस्से और कहानी बनकर निकल रही है। समय का चक्का तो अपनी गति से चलता रहा। गांव के लोग उसकी चाल के साथ कदमताल नहीं कर सके। वह तो न चाल समझ सके न चरित्र जान सके। पीने के पानी के अभाव में जीते हुए उसे एकाएक जो सुकून मिला वह उसे भी संजोए नहीं रख सके। खुशी मिले उन्हें बमुश्किल एक दशक भी नहीं बीता अपनों के बीच ही अपनों के ही हाथों आपणी योजना पराई होती दिखी।
राजस्थान पत्रिका की टीम ने दम तोडऩे के कगार पर पहुंची आपणी योजना का हाल जाना तो हैरानी हुई। सिर्फ सात साल पुरानी योजना को समय के साथ सम्बल और समृद्धता मिलने के बजाय जिसने जब चाहा जहां मौका मिला पराई नार की तरह बुरीनजर डालने से बाज नहीं आया। अब ढाणी और गुवाड़ में लगी टूटी दिनभर खुली रहती है पर उसमें पानी की बूंद नहीं टपकती। पाइप से गांव तक पीने का पानी महीनेभर में आए कि पन्द्रह दिन में कुछ निश्चित नहीं रहा। महिलाओं की दिनचर्या प्रभावित हो गई। चौका-चूल्हे से पहले पीने के पानी की जुगाड़ में उनकी रातों की नींद उड़ गई और दिन का चेन जाता रहा। पानी का इन्तजार करना तो अब ग्रामीणों के बस में रहा ही नहीं सो हर कोई पानी के जुगाड़ में फिर सेे जुटा दिखा। पत्रिका टीम ने पाया कि इन्दिरा गांधी नहर से पानी छोड़े जानेसे लेकर गांवों में पानी पहुंचने के बीच की तमाम व्यवस्थाएं पानी संग्रहण, भण्डारण, शुद्धिकरण और वितरण नियत मानदण्डों पर कहीं खरी नहीं उतर रही। न तो पानी का संग्रहण अपेक्षित है न भण्डारण सुरक्षित और संरक्षित है। शुद्धिकरण और स्वच्छता तो भगवान भरोसे है। वितरण व्यवस्था उन्हीं लोगों ने चौपट कर रखी है जिन्हें उसकी चौकीदारी का जिम्मा सौंपा था। चूरू, झुंझुनूं और हनुमानगढ़ के सैकड़ों ग्रामीण और कुछ शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लाखों लोगों के लिए बनी जनसहभागिता के मूल आधार वाली पीने के पानी की इस योजना का इस तरह गला ही सूख जाएगा ऐसा तो योजना बनाने वाले ने भी कल्पना नहीं की होगी। हालात यह हैं कि आपणी योजना का वर्तमान ही नहीं उससे जुड़ी भविष्य की उज्जवल संभावनाएं भी पूरी क्षीण होती दिखाई देने लगी हैं।
राज्य सरकार तो चूरू की आपणी योजना को दिखा विश्व बैंक से इसे राज्य के अन्य जिलों में लागू करने का सुखद सपना देख रही है। जबकि स्थिति यह है कि योजना निकट भविष्य में चूरू में ही ठीक से संचालित हो सके इसमें संशय है। खुद जलदाय विभाग के अधिकारियों का दावा है कि कि जिन क्षेत्रों में योजना के जरिए पाइप लाइन से जलापूर्ति की जा रही है वहां इतने अवैध कनेक्शन है कि योजना का उस उपभोक्ता को लाभ दे पाना ही मुश्किल हो गया है जो कि सद्इच्छा से लाभ चाहता है।
मोटे अनुमान के अनुसार योजना से जुड़े गांवों में करीब तीस से चालीस हजार अवैध कनेक्शन हैं। यह सब कैसे हुए? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? यदि इन सबकी जांच और झंझटों में उलझा न भी जाए तो कम से कम अब इस पर तो ठोस कदम उठाने की जरूरत है ही कि अवैध कनेक्शनों को काटा कैसे जाए? फिर यह कि योजना से जुड़े अंतिम छोर के व्यक्ति और गांव तक पानी पाइप के जरिए कैसे पहुंचाया जाए? यह सच्चाई है कि योजना की पाइप लाइन में नियमित पानी प्रवाह नहीं बने रहने से उसके जोड़ों में लगी रिंगों को दीमक चट कर जाती है। इससे स्थिति यह हो गई है एक किलो मीटर के रास्ते में बीसियों जगह रिसाव हो गए।
अब भला पानी भेजने वाले और पानी पाने वाले सबकी नीयत साफ भी हो तो आखिर तक पानी पहुंचने की स्थिति ही नहीं बनती। पम्प हाउस से निकलने वाला पानी गांव की टंकी तक पूरा पहुंचता ही नहीं तो गुवाड़ी में लगी टूटी से पानी टपकेगा कैसे? योजना को संचालित करने वाले जलदाय महकमें के कारिंदें ग्रामीणों को कहते हैं कि वे पूरा पानी भेज रहे हैं गांव में जिन लोगों ने अवैध कनेक्शन किए हैं उन्हें काट दे तो पाइप में पानी आ जाएगा। ग्रामीण कहते है कि अवैध कनेक्शन काट दिए फिर भी पानी नहीं पहुंचा क्यों कि लाइन में पूरा पानी छोड़ा ही नहीं जाता। उनका आरोप है कि विभाग के लोग पानी माफिया से मिलकर पानी बेच रहे हैं। पानी पंचायतों और विभागीय अधिकारियों के बीच चलती इस नूरा कुश्ती ने स्थिति यह कर दी कि पम्प हाउस के नजदीक के गांवों में भी पाइप लाइन के जरिए एक माह में भी जलापूर्ति नहीं की जा रही। टैंकरों से जलापूर्ति में सबकी चांदी बन रही है और पाइप लाइन दीमक चट कर रही है। पत्रिका टीम ने देखा कि मौजूदा हालात में पानी नहीं पीकर भी ग्रामीण सुरक्षित रह सकता है पानी पीकर तो उसे जलजनित बीमारी घेर ले तो कोई बड़ी बात नहीं। आपणी योजना का पानी जिस स्त्रोत से और जिस वितरिका के माध्यम से जिन जगहों पर होता हुआ जिस हालत में पहुंच रहा है, वह शब्दों में बयां करना मुश्किल है। फिर उसे जिस तरह से स्वच्छ और शुद्ध किया जा रहा है यह इस बात से समझा जा सकता है कि पानी के ऑटोमेटिक ट्रीटमेंट प्लांट वर्षों से बंद पड़े हैं।
अनुभवी तकनीकी रसायन विशेषज्ञ प्लांट पर नियुक्त ही नहीं है। अनुमान के आधार पर हैल्परों से पानी की शुद्धता व स्वच्छता व्यवस्था बनाई रखी जा रही है। इन सब हालातों में जलदाय विभाग के आला से अदने अभियंता चाहे जो दावे व वादे करते हो इसमें कोई दोराय नहीं कि मौजूदा हाल और हालात अपेक्षानुकूल नहीं रहे। फिर भी अभी बहुत समय है। पानी की कीमत को जाना जाए और उसके उपयोग के प्रति जागा जाए। रिस-रिसकर व्यर्थ बहते पानी और ईंट-ईंटकर ढहते साधन-संसाधन को बचाया जाए। इस बार सिर्फ एक तरफा नहीं बल्कि चौतरफा समझ, संकल्प और समर्पण की जरूरत होगी।

फैक्ट फाइल
1994- शुरुआत
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2003- गांव-गांव पहुंचा पानी
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2 हजार किमी में- उच्चगुणवत्ता की पाइप लाइन
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20 हजार वर्ग किमी- क्षेत्रफल में फैली
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24 घंटे- जलापूर्ति का दावा
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485 गांव व 05 कस्बे- वर्तमान में जुड़े हैं
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20 गांव-सरदारशहर के जुड़े ही नहीं
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70 गांव- योजना से कटने को हैं तैयार
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09 लाख- लोग लाभान्वित
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04 स्थानों पर-जल शुद्धिकरण सयंत्र
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02 स्थानों पर- बड़े जल भंडारण गृह
योजना की मूल भावना
भ-जल की गुणवत्ता संबंधी समस्याओं से जूझ रहे चूरू, झुंझुनंू व हनुमानगढ़ जिले के लगभग बीस हजार वर्ग किलोमीटर में पीने के लिए नहर का शुद्ध व स्वच्छ पानी मुहैया करवाने की दृष्टि से वर्ष 1994 में आपणी योजना बनाई गई। मरु क्षेत्र में भागीरथी साबित हुई आपणी योजना में करोड़ों रुपए का वित्तभार संयुक्त रूप से जर्मन सरकार व राजस्थान सरकार ने वहन किया। योजना के प्रथम चरण में 370 गांव व दो शहरों के लगभग नौ लाख लोग लाभान्वित होने थे।
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निशचित रूप से आपणी योजना में ढेरों विकृतियां पैदा हो गई हैं। वर्षों पुरानी इस व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। योजना की स्थिति दयनीय होने लिए ग्रामीण भी बराबर के जिम्मेदार हैं। प्रत्येक गांव में औसत ढाई सौ अवैध कनेक्शन हैं। सबसे अधिक समस्या राजगढ़ के गांवों में है। योजना के मूल स्वरूप को वापस लाने के लिए फिल्टर प्लांट, पाइप लाइन, साफ-सफाई, तीन सौ गांवों में मीटर बदलने तथा स्टाफ की कमी दूर करने के पांच सौ करोड़ रुपए के प्रस्ताव तैयार किए जा रहे हैं।
-श्रवण कुमार शर्मा, अधीक्षण अभियंता, आपणी योजना, चूरू
ना पूरा पानी, ना सफाई
घासला अगुना पम्प हाउस से जुड़े गांव भुम्भाड़ा में जलापूर्ति अनियमित है। पानी पंचायत भंग होने के कगार पर है। मेहलाणा, बास धेतरवाल व मेहलाणा दिखणादा व उत्तरादा में जलापूर्ति प्रभावित है। हौज के तल में खड्डा है, आधा पानी तो जमीन में ही समा जाता है। हौज की अर्से से सफाई ही नहीं हुई। पम्प का स्टाटर खराब पड़ा है। ब्लीचिंग पाउण्डर ही नहीं है। महलाणा के लोग पांच टंकियों पर कनेक्शन तथा घासला से रोजाणी बाइपास लाइन चाहते हैं।इसके लिए वे खाई खोदने को भी तैयार हैं।वर्तमान में योजना से झुंझुनूं व चूरू
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जिले के राजगढ़, तारानगर, चूरू, रतननगर व बिसाऊ कस्बा तथा करीब 485 गांव जुड़े हैं। योजना की अस्सी फीसदी दुर्गति अवैध कनेक्शनों के कारण हुई है। दस फीसदी व्यवस्थागत खामियां तथा दस फीसदी विभागीय लापरवाही भी जिम्मेदार है। योजना की सबसे बड़ी त्रास्दी यह है इसके शुरू होने के बाद से ही रख-रखाव पर कभी कोई बड़ी राशि खर्च नहीं की गई। इसे
बस चलाते गए। इसलिए वर्तमान में इस स्थिति का सामना करना पड़ा है।
-पीसी शर्मा, एक्सईएन, आपणी योजना, तारानगर
जारी...

Saturday, April 17, 2010

बेटियों ने बजाया डंका

चूरू। आठवीं बोर्ड परीक्षा में जिले की बेटियों ने खूब नाम कमाया है। बेटियों ने कुल परीक्षा परिणाम में बाजी मारने के साथ ही बोर्ड की अस्थायी वरीयता सूची में भी छात्रों की कडी टक्कर दी है। जिले में 79 छात्राओं ने अस्थायी वरीयता सूची में जगह बनाने में कामयाबी हासिल की है। इनमें से 18 छात्राओं ने जिला स्तर पर जबकि शेष ने तहसील स्तर पर परचम लहराया है।

डाइट सूत्रों के अनुसार इस बार आठवीं बोर्ड परीक्षा में जिलेभर की कुल 16 हजार 313 छात्राएं शामिल हुईं। इनमें से 11 हजार 6 20 छात्राओं ने अगली कक्षा में जगह बनाई है। छात्राओं का कुल परीक्षा परिणाम 71.23 प्रतिशत रहा है, जो छात्रों से 1.11 प्रतिशत अघिक है।

जिला स्तर पर पूजा
बोर्ड की जिला स्तरीय अस्थायी वरीयता सूची में छात्रा वर्ग में सुजानगढ के बाल भारती विद्यापीठ बालिका विद्यालय की छात्रा पूजा चौहान ने 94.67 फीसदी अंक हासिल कर प्रथम स्थान प्राप्त किया है। जिला स्तर के 25 स्थानों पर कुल 42 विद्यार्थी काबिज हुए हैं। इनमें 18 छात्राएं हैं।

तहसील स्तर पर सिरमौर
बोर्ड की तहसील स्तरीय अस्थायी वरीयता सूची में कुल 6 1छात्राएं शामिल हैं। इनमें से श्री भारती आदर्श विद्यापीठ सीनियर सैकण्डरी विद्यालय की कनुप्रिया वर्मा सरदारशहर तहसील में तथा श्री गांधी बाल निकेतन की मेघना शर्मा रतनगढ तहसील में सिरमौर रही हंै। मेघना ने 93 प्रतिशत तथा कनुप्रिया ने 90.22 अंक हासिल किए हैं।

इतनी छात्राएं मेरिट में
तहसील - छात्रा
चूरू - 13
रतनगढ - 14
राजगढ - 7
तारानगर - 8
सुजानगढ - 9
सरदारशहर - 10
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इसमें कोई शक नहीं कि लडकों की तुलना में लडकियां पढाई पर अघिक ध्यान देती हैं। लडकियां घरेलू कामकाज में हाथ बंटाने के बावजूद अच्छे अंको से पास हुई हैं। इस बार भी छात्राओं का परीक्षा परिणाम शानदार रहा है। जो बालिका शिक्षा को बढावा देने के लिहाज से अच्छा है।
-महावीर सिंघल, प्राचार्य, डाइट, चूरू

Saturday, April 10, 2010

पंचायत भवनों का निखरेगा रूप

पांच-पांच हजार रूपए उपलब्ध करवाए जाएंगे
चूरू। इसे महात्मा गांधी रोजगार गारण्टी योजना के सुचारू संचालन का प्रयास कहे या ग्राम पंचायत को आदर्श बनाने की कवायद। कारण जो भी हो मगर पंचायत भवन का रूप निखरना तय है। अब पंचायत भवन न केवल बाहर बल्कि भीतर से भी चमक उठेगा। इसके लिए जिला प्रशासन ने तैयारी शुरू कर दी है।
जिले की समस्त 249 ग्राम पंचायतों को महानरेगा की प्रशासनिक मद से पांच-पांच हजार रूपए उपलब्ध करवाए जाएंगे। जिसका उपयोग पंचायत भवन की दीवारों पर सफेदी, दरवाजों व खिडकियों पर रंग-रोगन, आवश्यक सामग्री जैसे फर्नीचर, पंखा व दरी खरीदने तथा पानी की सुविधा उपलब्ध कराने में करना होगा।
इससे न केवल पंचायत भवन सुव्यवस्थित एवं सुदृढ होगा बल्कि ग्राम सेवकों व ग्राम रोजगार सहायकों को महानरेगा का कार्य सम्पादित करने में भी आसानी रहेगी। अघिकारिक जानकारी के अनुसार जिले के समस्त कार्यक्रम अघिकारियों को दस अप्रेल तक अपने क्षेत्र की समस्त ग्राम पंचायतों के खातों में पांच हजार रूपए हस्तांतरित करने तथा अपनी निगरानी में ग्राम सेवकों के माध्यम से 25 अप्रेल तक राशि का उपयोग करवाने के आदेश दिए जा चुके हैं।
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नरेगा का नाम भी होगा
गांवों में महानरेगा की कागजी कार्यवाही पंचायत भवन में बैठकर पूरी की जाती है। योजना का समस्त रिकॉर्ड भी पंचायत भवन में रखा जाता है। ऎसे में अब पंचायत भवन पर पंचायत के नाम के साथ-साथ 'महानरेगा संदर्भ केन्द्र' मोटे अक्षरों में लिखवाया जाएगा।
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हर भवन की होगी श्रेणी
पंचायत भवनों को निखारने के लिए 25 अप्रेल तक का समय तय किया गया है। इसके बाद विभिन्न अघिकारियों से पंचायत भवन का निरीक्षण करवाया जाएगा। निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर पंचायत की अ, ब,स एवं द श्रेणी निर्घारित की जाएगी।
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पंचायत भवनों की दशा सुधारने की दिशा में कदम बढा दिए हैं। कार्यक्रम अघिकारियों को इस संबंध में आदेश जारी कर दिए हैं। इसमें निरीक्षण का भी प्रावधान रखा है। लापरवाही बरतने वालों के खिलाफ तत्काल प्रभाव से कार्रवाई करेंगे।
-अबरार अहमद, अतिरिक्त जिला कार्यक्रम समन्वयक एवं सीईओ जिला परिषद, चूरू

Wednesday, April 7, 2010

एक किलोमीटर में एक ही स्कूल

चूरू। गांवों के दर्जनों विद्यालयों में जल्द ही भारी उलट-फेर होगा। अब छात्रों के साथ-साथ अध्यापकों को भी नए विद्यालय में जाना पडेगा। यह सब विद्यालयों के एकीकरण के तहत होगा। शिक्षा महकमे ने एकीकरण की कवायद शुरू कर दी है। विभाग के कर्मचारी एकीकरण के प्रस्ताव तैयार करने में जुट गए हैं। ग्रामीण विद्यालयों की तमाम जानकारियां जुटाई जा रही हैं।
एकीकरण की प्रक्रिया से गांव में एक किलोमीटर के दायरे में स्थित विद्यालय ही प्रभावित होंगे। शहरी क्षेत्र के विद्यालय पर इसका कोई असर नहीं पडेगा।
एक किलोमीटर के दायरे में एक ही स्तर के एक से अघिक विद्यालय होने पर सबको एक विद्यालय में समाहित किया जाएगा। उप्रावि व माध्यमिक स्तर के विद्यालयों के एकीकरण कक्षा 6 , 7 व 8 की छात्र संख्या के आधार पर होगा। जिन विद्यालयों में तीनों कक्षाओं की छात्र संख्या अघिक होगी, वह विद्यालय ही संचालित किया जा सकेगा।
प्रस्ताव को अंतिम रूप देने के लिए ब्लॉक, जिला व निदेशालय स्तर पर तीन समितियां गठित की गई हंै। ब्लॉक स्तरीय समिति 15 अप्रेल को जिला स्तर पर तथा जिला स्तरीय समिति को 17 अप्रेल को निदेशालय स्तर पर एकीकरण के प्रस्ताव भेजने हैं।
* ग्रामीण क्षेत्र में विद्यालय
* प्राथमिक-638
*उच्च प्राथमिक-644
* माध्यमिक-199
* उच्च माध्यमिक-83
(शिक्षा विभाग के अनुसार)
* शिक्षकों को आवास सुविधा
एकीकरण से छात्रों के साथ-साथ शिक्षकों को भी फायदा होगा। छात्रों को जहां शिक्षकों की कमी से नहीं जूझना पडेगा वहीं शिक्षकों को आवास की सुविधा उपलब्ध हो सकेगी। एकीकरण के बाद खाली हुए विद्यालयों का छात्रावास व स्टाफ के निवास के रूप में उपयोग किया जा सकेगा। खाली भवन के उपयोग का निर्णय वरिष्ठतम प्रधानाध्यापक एवं शाला प्रबंध समिति करेगी।
* शहरी क्षेत्र की स्थिति खराब
एकीकरण में ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों को शामिल किया गया है, लेकिन शहरी क्षेत्र की स्थिति अघिक खराब है। एक किलोमीटर के दायरे में एक ही स्तर के कई विद्यालय संचालित हो रहे हैं। विभागीय जानकारी के मुताबिक शहरी क्षेत्र के विद्यालयों के भी एकीकरण की आवश्यकता है। जिले के शहरी क्षेत्र में 24 उच्च माध्यमिक, 36 माध्यमिक, 91 प्राथमिक तथा 8 7 उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं।
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एकीकरण की तैयारियां शुरू कर दी है। विद्यालयों में प्रस्ताव के प्रारूप भिजवाए हैं। 17 अप्रेल को समस्त प्रस्ताव निदेशालय को भेजे जाएंगे।
-सांवर मल गहनोलिया, सहायक निदेशक, माध्यमिक शिक्षा, चूरू

हिसाब-किताब

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