Friday, February 26, 2010

तुमको ना भूल पाएंगे अलसीसर

शेखावाटी की हवेलियाँ और उन पर बनी चित्रकारी आपको राजस्थान के शाही अंदाज से रूबरू करवाती हैं।
मरूधरा के धोरों के बीच रचा बसा झुंझुनू जिले का अलसीसर अपनी ऐतिहासिक हवेलियों, कुए-बावडी, छतरिया, जोहड़, और मंदिरों की स्थापत्य कला के दम पर पर्यटन स्थल के रूप में उभर रहा है. सात संदर पार से पर्यटक यहाँ की कला और संस्कृति को निहारने के लिए आते हैं. जब पर्यटक यहाँ आकर ग्रामीण झोंपडियाँ, परम्परागत चारपाई, पत्थर की बैंचों पर बैठता है, तो उसको के रहन सहन का आनद मिलता है. भ्रमण कार्यक्रम में किसानों के पर्यटकों को दही बिलोना, दूध निकलना, रोटी बनाना, सूट काटना, दरी बुनाई, फसल कटाई, निराई व गुडाई दिखाई जाती है. विदेशी पर्यटक यहाँ के ग्रामीण में रच-बस जाते है. यही कारण हिया कि वे यहाँ के शादी- विवाह में बाकायदा शामिल होकर कन्यादान तक रस्म तक निभाते हैं. पर्यटक अलसीसर के रीति रिवाज, तीज त्योंहार, शादी, बाण-बिंदोरी व धार्मिक में दिल खोलकर शामिल होते हैं. इससे लोक संस्कृति को तो बढावा मिल ही रहा है साथ ही ग्रामीणों कि आजीविका का माध्यम भी बन रहे हैं. यहाँ पर ऐतिहासिक हवेलियों में बनी दो बड़ी होटलों समेत तीस से अधिक ऐसे हैं जो बरबस ही पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं. यह बात दीगर है कि जिले के पर्यटन स्थल के रूप में अलसीसर कभी भी प्रसिद्ध नहीं हुआ है लकिन पर्यटकों का जमावडा इसे पर्यटन स्थल के रूप में इंगित करता है.विवाह समारोह में नाचते-गाते जागरण में भजनों पर थिरकते व तीज-त्योहारों का ग्रामीणों के साथ मिलकर लुफ्त उठाते पर्यटक अलसीसर कि गलियों में आसानी से देखे जा सकते हैं. गागा नवमी को बीहड़ में लगने वाले मेले मेले में भी पर्यटक अच्छी तादाद में आते हैं. दस फीसदी से अधिक पर्यटक यहाँ कि हवेलियों कि कलात्मक शैली के साथ-साथ विवाह समारोह व जागरण में शामिल होने को तवज्जो देते हैं. जागरण चाहे सत्यनारायण मंदिर में हो या किसी मोह्हले में पर्यटक पूरी तरह से शरीक होते हैं।
इसलिए आते है पर्यटक
खेतानोकि हवेली में मुनीम रह चुके हरिराम चौमाल के मुताबिक अलसीसर में लक्खाराम, मालीराम, फूलचंद खेतान, झाबरमल सेठ, तेजपाल सेठ, गणेश नारायण, पूनियां, इंदरसिंह व रामदेव झुंझुनू वालों कि हवेली, छतु सिंह कि छतरियां, लक्ष्मीनाथ और सत्यनारायण मंदिर, झाबरमल, सीताराम व रामाजसराया के कुए तथा मरोदियों का तलब आदि दर्शनीय स्थल है. इनमें झाबरमल और लखाराम जी की हवेलियाँ के कमरों की दीवारों पर की गयी चित्रकारी पर्यटकों को काफी लुभाती है. मीठिया कुवे पर बनीं छतरियों के शिलालेख और कुए के अन्दर साठ फीट तक कि गयी चित्रकारी को देख पर्यटक दांतों टेल ऊँगली दबा लेते हैं
पर्यटकों कि शादी
होटल के सामने से बारात गुजर रही हो तो पर्यटक बारात में शामिल होने से नहीं चूकते. पर्यटन स्थलों के साथ साथ पर्यटकों को यहाँ कि आबो हवा भी काफी लुभाती है. गत दो वर्षों में दो विदेशी जोड़े अलसीसर कि ज़मी पर राजस्थानी परंपरा से सात फेरे लेकार जीवनसाथी बन चुके हैं. बताया जाता है कि दोनों जोडों ने वेबसाइट पर अलसीसर की कलात्मक शैली को देख ग्रामीण रीति रिवाज़ से शादी करने की सोची।
आय का जरिया
कस्बे में आने वाले पर्यटक न केवल होटलों के लिए फायदे का सौदा साबित हो रहे हैं बल्कि ग्रामीणों कि आय का जरिया भी बन चुके हैं. होटल इन्द्रविलास के मेनेजर के.सी. शर्मा बताते हैं कि पर्यटक यहाँ से मसाले, साहित्य, हेंडी क्राफ्ट उत्पाद, ग्रामीण कपडे, कैर, सांगरी व् मिटटी के बर्तन खरीदना अधिक पसंद करते हैं. पशुपालकों और वाहन मालिकों को भी अच्छी आय होती है।
जुडाव सहकारी बैंक का
अलसीसर में पर्यटन की अपार संभावनाओं को देखते हुए केंद्रीय सहकारी बैंक पर्यटकों से जुड़कर आय बढाने की कवायद शुरू कर चूका है. अलसीसर ग्राम सेवा सहकारी समिति कि और से यहाँ पर ग्रामीण और आधुनिक शैली को मिलाकर अष्टकोंनीय झोपडा बनाया गया है. झोपडे के अन्दर व सामने ग्रामीण परिवेश के सामान रखे गए हैं. पर्यटकों को इसमें आराम करने कि सुविधा दी जायेगी तथा कालबेलिया नृत्य व कठपुतलियों का खेल दिखाया जायेगा।
सर्वाधिक पर्यटक जर्मनी के
जिला मुख्यालय से पच्चीस किलोमीटर दूर स्थित यह क़स्बा सड़कों के माध्यम से प्रदेश के विभिन्न जिलों से जुड़ा हुआ है. यहाँ पर जयपुर, दिल्ली और बीकानेर होते हुए हर साल जर्मनी, फ्रांस, स्वीजरलैण्ड, इटली, स्पेन, इंग्लैंड और अमेरिका के हाजोरों पर्यटक आते हैं. हर दूसरे दिन 25 से 30 पर्यटकों का दल यहाँ पहुँच जाता है. अलसीसर आने वाले पर्यटक में अधिक संख्या जर्मनी के पर्यटकों कि होती है।
कैसे पंहुचे
जयपुर, चूरू और झुंझुनू से अलसीसर बस से आसानी से पहुंचा जा सकता है. चूरू से 40 किमी, झुंझुनू से 25 किमी, जयपुर से 210 किमी।
2008 में राजस्थान पत्रिका के परिवार परिशिष्ट में प्रकाशित लेख
प्रस्तुतकर्ता विश्वनाथ सैनी

Thursday, February 11, 2010

ढाई आखर प्रेम का...

चूरू 11 फरवरी। दोस्तों, इंसान की जिंदगी में कभी ना कभी कोई ना कोई जरूर दस्तक देता है। खासकर जवानी में। क्योंकि यह उम्र ही ऐसी होती है, इसमें दिल किसी के लिए धड़कता है तो दुनिया की भीड़ में अलग दिखने के लिए मचलता भी है। इस उम्र में किसी का दिल लेना...किसी को अपना बनाना और किसी के ख्यालों में गुम हो जाना कोई नई बात नहीं है। जवां दिलों की ख्वाहिशों को तो मानों पंख लग जाते हैं। दुनिया हसीन और आसमां रंगीन नजर आने लग जाता है।
जाने कब और कहां...किस पर नजर ठहर जाए...कोई नहीं जानता है। ''आंख लड़ी, बात बड़ी और प्यार हो गया।'' इसके बाद तो प्रेमी जोड़े हर पल-हर लम्हे को अपने अंदाज से जीने लगते हैं। चाहे दिन हो या रात...दोनों को एकांत की तलाश रहती है। तकदीर से कभी एकांत के दो पल मिल जाए तो वे खुद को खुशनसीब समझने लगते हैं।
दोनों की बातों का सिलसिला कभी खत्म होने का नाम ही नहीं लेता। प्रेमी अपनी प्रेमिका के लिए चांद तारे तोड़ लाने का वादा तक करता है तो प्रेमिका उसके लिए सारे जमाने को छोडऩे को तैयार हो जाती है। दोनों सात जन्मों तक साथ निभाने की कसमें तक खा लेते हैं।
प्यार हमसफर बन जाए तो कहना ही क्या? जिंदगी प्यार के सहारे कैसे कट जाए...कुछ पता नहीं चलता। मगर दोस्तों सभी जोड़ों को यह मौका नहीं मिलता।
हर प्यार परवान तो चढ़ता है मगर जरूरी नहीं उसे मंजिल मिले ही। अधिकतर मामलों में दोनों के बीच परिवार खुद दीवार बन जाते हैं। जिसे तोड़ पाना दोनों को अपने बुते से बाहर लगने लगता है। समाज भी दोनों के रिश्ते को मंजूरी नहीं देता।
इन सब के बावजूद कभी कभी प्यार कामयाब भी हो जाता है। तो यूं मानों प्यार की असली अग्नि परीक्षा शुरू हुई है। दोनों को एक ही छत के नीचे रहते अपने प्यार की ज्योति को जगाए रखना होगा। प्रेम जैसा रिश्ता जितना मजबूत है उससे लाख गुना अधिक नाजूक है। तभी तो रहिम जी कह गए ''रहिमन धागा प्रेम का तोड़ा मत चटकाय, टूटे से फिर ना जुड़े ...जुड़े तो गांठ पड़ जाए''। दोस्तों अपने प्यार में कभी गांठ मत पडऩे देना, क्योंकि जिंदगी में यह मौका नसीब वालों को मिलता है। प्यार एक ऐसी कश्ती है जिसमें सवार होने वाले जोड़े एक-दूसरे के प्रति अटूट विश्वास और समर्पण भाव रखकर ही अपनी नैया पार लगा सकते हैं। वरना पता नहीं नैया कब डूब जाए। कब प्यार ऐसा गम दे जाए जिसके घाव जीते जी नहीं

Wednesday, February 10, 2010

फेल हुए तो नहीं मिलेगा लाइसेंस

चूरू, 26 फरवरी। ड्राईविंग लाइसेंस बनवाने के लिए अब चालक को सड़क सुरक्षा नियमों की पूरी जानकारी रखनी होगी। लर्निंग लाइसेंस बनाने की नई व्यवस्था के तहत जिला परिवहन कार्यालय में टच स्क्रीन मशीन आवेदक का सड़क सुरक्षा जानकारी का टेस्ट लेगी। टेस्ट में खरा उतरने वाले चालक को ही ट्रायल के बाद लाइसेंस जारी किया जा सकेगा। राज्य सरकार ने डीटीओ कार्यालय में टच स्क्रीन मशीन उपलब्ध करवा दी है। मार्च से यह व्यवस्था लागू हो जाएगी।

देना होगा सही जबाव
टच स्क्रीन मशीन में सड़क सुरक्षा से संबंधित 100 सवाल फीड हैं। टेस्ट में टच स्क्रीन मशीन की स्क्रीन पर आवदेक के सामने एक-एक करके 15 सवाल उभरेंगे। 15 सवालों में से नौ का सही जवाब देने वाला आवेदक लाइसेंस लेने लायक समझा जाएगा। फेल घोषित किए गए आवेदक को लाइसेंस के लिए एक सप्ताह बाद दुबारा फीस जमा करवाकर टेस्ट उत्तीर्ण करना पड़ेगा।चार में से एक सहीटेस्ट में टच स्क्रीन मशीन की स्क्रीन पर प्रत्येक सवाल के साथ ही चार वैकल्पिक उत्तर भी प्रदर्शित होंगे। आवेदक को चार में से एक सही सवाल को टच करना होगा। करीब दस मिनट के टेस्ट के तुरंत बाद मशीन परिणाम घोषित कर देगी। टेस्ट के लिए मशीन में हिन्दी और अंग्रेजी भाषा की सुविधा उपलब्ध है। चालक अपनी सुविधानुसार भाषा का चयन कर सकेगा।

निरीक्षक नहीं लेंगे साक्षात्कार
टच स्क्रीन मशीन का टेस्ट उत्तीर्ण करने के बाद परिवहन विभाग के निरीक्षक आवेदक का साक्षात्कार नहीं लेंगे। फिलहाल आवेदक की सड़क सुरक्षा की जानकारी का स्तर परिवहन विभाग के निरीक्षक परखते हैं। जान-पहचान के चलते कई आवेदक एकाध सवालों का जवाब देकर लर्निंग लाइसेंस हथिया लेते हैं। टच स्क्रीन टेस्ट व्यवस्था शुरू होने के बाद आवेदक अब ऐसा नहीं कर सकेंगे। ये होंगे सवालटच स्क्रीन मशीन में साइन बोर्ड, इंडीकेटर, ट्रैफिक सिग्नल, जेब्रा व डिवाइडर लाइन, यातायात पुलिस, लाल, पीली और हरी लाइट समेत सड़क सुरक्षा से सम्बन्धित सौ सवालों की प्रश्नावली फीड की गई है।

इनका कहना...
लाइसेंस लेने वालों में यातायात नियमों की जानकारी का स्तर बढ़ाने के लिए टच स्क्रीन मशीन से टेस्ट लिया जाएगा। मशीन उपलब्ध हो गई है। मार्च से टेस्ट शुरू हो जाएगा।
-जीआर मेहरड़ा, जिला परिवहन अधिकारी, चूरू--विश्वनाथ सैनीआगे पढ़ें...
प्रस्तुतकर्ता विश्वनाथ सैनी
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Sunday, February 22, 2009



सरकार बदली, योजनाएं अटकीं

वित्तीय स्वीकृति पर रोकराज बदलने के साथ ही जिले में भाजपा सरकार की ओर से शुरू की गई योजनाओं के क्रियान्वयन पर नई सरकार ने ब्रेक लगा दिए हैं। ऐसे में गांवों में विकास कार्य प्रभावित होने को हैं।चूरू, 22 फरवरी। सरकार बदलने से जिले में गुरु गोलवलकर जन भागीदारी विकास योजना एवं दीनदयाल उपाध्याय आदर्श ग्राम योजना के करीब पचास से अधिक गांवों में लाखों के विकास कार्य अटक गए हैं। प्रदेश की नई सरकार के भाजपा कार्यकाल में शुरू हुई इन योजनाओं को हाल ही बंद करने का निर्णय किए जाने से ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है। गुरु गोलवलकर योजना में वर्ष 2008-09 के दौरान 69 कार्यो की प्रशासनिक स्वीकृतियां जारी की गई। इनमें से 37 कार्यों को ही वित्तीय स्वीकृति मिली है। शेष 32 कार्यों की वित्तीय स्वीकृति पर रोक लगा दी गई है। उधर, वर्ष 2007-08 में दीनदयाल उपाध्याय आदर्श ग्राम योजना के लिए चयनित गांव चूरू तहसील के दूधवाखारा और सरदारशहर तहसील के पूलासर में करीब 15-15 लाख रुपए के विकास कार्यों की स्वीकृति अब जारी नहीं की जाएगी।लौटाने लगे पंजीयन शुल्कगुरु गोलवलकर योजना के प्रस्ताव के साथ पंजीयन शुल्क के रूप में जमा किए पांच-पांच हजार रुपए प्रशासन लौटाने लगा है। योजना बंद होने की भनक लगते ही ग्रामीण पंजीयन शुल्क लेने के जिला परिषद पहुंचने लगे हैं। योजना के तहत जिले को आवंटित किए गए 83.50 लाख के बजट में से 41.75 लाख रुपए अटक गए हैं।अटक गए ये कामअधिकारिक जानकारी के अनुसार सरदारशहर के सवाई बड़ी में गोशाला के चारदीवारी, थिरपाली बड़ी के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में बरामदा व एक भवन, चूरू के ढाढर में श्मशाम भूमि में विश्राम घर, राजगढ़ के रतनपुरा में सामुदायिक भवन व खेल मैदान के चारदीवारी, घणाऊ के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय के खेल मैदान के चारदीवारी, सिद्धमुख में प्रवेश निर्माण, रतनगढ़ के गोगासर में सभा भवन का निर्माण, लाछड़सर के गोशाला में टिन शेड निर्माण, नोसरिया में सहकारी समिति के चारदीवारी, सुजानगढ़ के जोगलिया में सामुदायिक भवन निर्माण, सालासर के चांदपोल मंदिर के पास सीमेंट सड़क, ठठावता में धर्मशाला में दो कमरों का निर्माण, तारानगर के कालवास के राजकीय माध्यमिक विद्यालय में दो भवन निर्माण समेत जिलेभर कुल 32 स्थानों के कार्य अटक गए हैं।
योजना के माध्यम से गांव में दो विश्राम घर व दो स्कूलों में हॉल का निर्माण करवाया जा चुका है। अब शमशान भूमि में विश्राम घर बनवाने चाहते थे। योजना बंद होने पर पंजीयन शुल्क लेने आए हैं।-चिमनाराम, ग्रामीण, ढाढर
जिन कार्यों की वित्तीय स्वीकृत जारी की जा चुकी है। उन्हें पूरा करवाया जाएगा। अन्य कार्यों की वित्तीय स्वीकृति जारी नहीं की जा रही है। गुरु गोलवलकर योजना के पंजीयन शुल्क राशि लौटा रहे हैं।-बीआर डेलू, सीईओ, जिला परिषद, चूरू-----विश्वनाथ सैनी आगे पढ़ें...
प्रस्तुतकर्ता विश्वनाथ सैनी
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Saturday, February 21, 2009


थळी में चंग के रंग

कारीगरों ने शुरू की तैयारी
चूरू, 20 फरवरी। फिजा में बासंती बयार है...थळी में फाग की मस्ती छाने को है...चौक, गुवाड़ और गली-मोहल्लों में शाम को युवाओं की भीड़ जुटने लगी है...ऐसे में फाग प्रेमियों को मस्ती से सराबोर कर देने के लिए चंग बनाने वालों ने अपने काम की गति दे दी है।जिला मुख्यालय पर नरसिंह भवन के पीछे 12 महादेव के पास दो हजार से अधिक चंग तैयार करने का काम प्रगति पर है। 29साल से चंग बनाने में जुटे भागीरथ चंदेल ने बताया कि फाल्गुन से दो माह पहले चंग बनाने की तैयारी शुरू हो गई थी।शिवपंचमी के बाद से चंग की बिक्री शुरू होगी और महाशिवरात्रि के बाद इनकी बिक्री परवान चढ़ेगी। चंदेल ने बताया कि चूरू में ढाई सौ से लेकर साढ़े चार सौ रुपए तक के चंग उपलब्ध हैं। बीकानेर का प्लास्टिक से बना चंग करीब ढाई सौ रुपय में बेचा जा रहा है। चंग बनाने के लिए हरियाणा के रेवाड़ी जिले के कोसली गांव से बड़ी संख्या में घेरे मंगवाए गए हैं।पड़ौसी शहरों में भी मांगजिला मुख्यालय पर ऑर्डर पर चंग बनाए जा रहे हैं। चूरू समेत पड़ौसी जिलों के फतेहपुर, मंडावा, रामगढ़, लक्ष्मणगढ़, कोलिंडा, भादरा, बिसाऊ कस्बे से भी चंग की मांग है। चूरू में बनी चंग की सबसे अधिक खरीदारी तारानगर, सीकर के लक्ष्मणगढ़ व फतेहपुर तथा झुंझुनूं के मंडावा व बिसाऊ के फाग प्रेमी करते हैं।कम हो गया रुझानचंग बनाने से जुड़े लोगों की मानें तो शेखावाटी और थळी में चंग के शौकीन कम होते जा रहे हैं। शहरी क्षेत्र में चंग की मांग काफी कम हो गई है। अब अंचल में वह जमाना नहीं रहा जब फाग के रसिए होली से महीने भर पहले चंग थाम लेते थे। ग्रामीण क्षेत्र में होली से दस दिन पहले चंग की थाप सुनाई देती है। ऐसे बनता है चंगथळी में बकरा व भेड़ की खाल के चंग तैयार किए जाते हैं। खाल को नमक के पानी साफ कर आक के दूध में भिगो देते हैं। इससे खाल कड़क होकर आवाज करने लगती है। तैयार खाल को घेरे पर चढ़ा कर मैदा और गौंद की सहायता से चस्पा कर दी जाती है। करीब दो घंटे धूप में सूखाने के बाद चंग तैयार हो जाता है।विरासत में मिला हुनरबकौल भागीरथ चंदेल चंग बनाने का काम उन्हें विरासत में मिला है। चंदेल परिवार वर्षों से चंग बनाने में जुटा है। वर्षों गिरधारी लाल चंदेल और बिरजाराम चंदेल के बनाए चंग भी फाग प्रेमियों को खासे रास आते थे। वर्तमान में चंदेल परिवार के करीब 30 से अधिक महिला-पुरुष परंपरागत काम को जारी रखे हुए हैं।प्रस्तुति-विश्वनाथ सैनी आगे पढ़ें...
प्रस्तुतकर्ता विश्वनाथ सैनी
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नरेगा की हालत भी खस्ता

काम पूरा, मजदूरी कम
चूरू 20 फरवरी। मेहनतकश लोगों की नैया पार लगाने वाली राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना (नरेगा) की जिले में हालत खस्ता है। योजना को लागू हुए एक वर्ष होने को है मगर अनियमितताएं इसका पीछा नहीं छोड़ रही हैं। आठ घंटे तक खून-पसीना एक करने के बावजूद कम मजदूरी मिलना श्रमिकों के लिए पीड़ादायी बना हुआ है। प्रशासन के पास उचित मजदूरी दिलाने की गुहार लगाते ज्ञापनों का अम्बार लग चुका है मगर प्रशासन ने अभी तक किसी भी कार्य पर मजदूरी का सत्यापन कराने की जहमत नहीं उठाई है। कागजों में सिमटी सुविधाएंयोजना के तहत श्रमिकों को मिलने वालीं सुविधाएं कागजों में सिमट गई हैं। नियमानुसार कार्यस्थल पर श्रमिकों के पांच वर्ष से छोटे बच्चों के लिए पालने की सुविधा होनी चाहिए मगर जिले में पालनों की खरीद निविदाओं में उलझ कर रह गई है। मौके पर टैंट और पेजयल सुविधाओं की स्थिति भी किसी छिपी नहीं। नियम ताक मेंजिला प्रशासन ने योजना के नियमों को ठेंगा दिखाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। आंकड़ों पर गौर करें तो गत दस माह में योजना के नियमों को ताक में रख 33 हजार 366 श्रमिकों को मजदूरी का नकद भुगतान किया गया। नकद भुगतान में श्रमिकों के साथ अन्याय की गुंजाइश रहती है। जिले में योजना के तहत एक लाख 63 हजार 624 लोगों को रोजगार मिला है। इनमें से एक लाख 30 हजार 258 श्रमिकों के ही बैंक व डाकघर में खाते खोले गए हैं। योजना के नियमों में स्पष्ट उल्लेख है कि श्रमिकों को मजदूरी का भुगतान बैंक व डाकघर खाते के माध्यम से ही किया जाना है।मजदूरी 17 रुपएतारानगर के राजपुरा के हिमताणा जोहड़ पर खुदाई में लगे श्रमिकों को फरवरी में 17 रुपए प्रतिदिन मजदूरी मिली है। श्रमिकों ने मजदूरी लेने से इनकार कर विरोध में पंचायत समिति कार्यालय पहुंचकर जेईएन का घेराव किया। इससे पहले सुजानगढ़ के गांवों में श्रमिकों को दस रुपए से भी कम मजदूरी का भुगतान किए जाने की शिकायतें मिली थी।श्रमिक बेराजगारवर्ष 2008-09 की स्वीकृत कार्य पूरे होने से सरदारशहर तहसील के पिचकराई ताल में 15 फरवरी से नरेगा कार्य बंद। ऐसे में सैकड़ों लोग बेरोजगार हो गए। नरेगा कार्य शुरू करवाने के लिए ग्रामीण पंचायत समिति मुख्यालय पर धरना देने की चेतावनी दी है।फैक्ट फाइल-8 हजार 392 कार्यों के प्रस्ताव मिले-1 हजार 313 कार्य पूरे-2 हजार 45 कार्य जारी-5 हजार 34 काम नहीं हुए शुरू-2 लाख 20 हजार 200 बने जॉबकार्ड-10 माह में 382 से अधिक शिकायत-33 हजार 366 श्रमिकों का नहीं खुला खाता-32 हजार 833 श्रमिक हुए बेरोजगारआगे पढ़ें...
प्रस्तुतकर्ता विश्वनाथ सैनी
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Thursday, February 19, 2009

खेती नहीं फायदे का सौदा
थळी अंचल में मेहनतकश लोगों की कमी नहीं है मगर रोजगार के साधन अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं। उपलब्ध रोजगार के साधनों में से अधिकांश की स्थिति दयनीय है। ऐसे में जिले की आबादी के एक बड़े हिस्से के सामने पेट भरने का संकट उत्पन्न हो गया है। समस्या के प्रति न सरकार गंभीर है ना ही जनप्रतिनिधि। रोजगार के लिहाज से महत्वपूर्ण कृषि, उद्योग, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना व पलायन की राह में आ रही समस्याओं को उजागर करती समाचार श्रंखला की पहली रिपोर्ट।न अधिकारी चिन्तित ना राजनेताओं को परवाहविश्वनाथ सैनीचूरू, 19 फरवरी। जिले का कृषि क्षेत्र लोगों को रोजगार मुहैया करवाने में नाकारा साबित हो रहा है। करीब 13 लाख से अधिक हैक्टेयर में फैले कृषि क्षेत्र में जहां भौगोलिक परिस्थितियां लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर रही हैं वहीं सरकार की अनदेखी भी इस क्षेत्र को रोजगार विहीन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। स्टाफ के नाम पर गिनती के कर्मचारियों की बदौलत कृषि विभाग चाहकर भी किसानों का मददगार नहीं बन पा रहा है। स्टाफ की कमी के चलते अधिकांश योजनाएं विभाग की फाइलों से ही बाहर नहीं निकल पाती हैं। ऐसे में ना तो किसानों को खेतों में योजना का लाभ मिल पाता और ना ही लोगों को रोजगार उपलब्ध हो पा रहा। जिले के करीब ढाई लाख से अधिक किसानों के सामने कृषि क्षेत्र की मौजूदा स्थिति अखरने वाली है। विभाग को दरकारकृषि अधिकारियों के अनुसार जिले में करीब 27 सहायक कृषि अधिकारी, 180 कृषि पर्यवेक्षक व कम से कम प्रत्येक पंचायत समिति सहायक निदेशक (कृषि विस्तार) की दरकार है। जिले में सहायक कृषि अधिकारी के पांच पद स्वीकृत हैं। फिलहाल सभी पद खाली हैं। कृषि पर्यवेक्षक के स्वीकृति नौ पदों में तीन खाली चल रहे हैं। पडौसी जिले श्रीगंगानगर, नागौर, झुंझुनूं, सीकर, हनुमानगढ़ के कृषि स्टाफ की तुलना में चूरू जिले में स्टाफ की स्थिति ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।उम्मीदों पर पानीजिले की भौगोलिक परिस्थितियां भी कृषि क्षेत्र में रोजगार की दृष्टि से अनुकूल नहीं है। कृषि से रोजगार मिलने की संभावना पर पिछले दिनों हुई ओलावृष्टि के बाद एक बड़े क्षेत्र में पूरी तरह पानी फिर चुका है। प्रतिकूल मौसम के चलते कड़ाके की सर्दी और झुलसा देने वाली गर्मी भी प्राय: प्रतिवर्ष किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर देती है। अंचल में गर्मियों में अधिकतम तापमान 50 तथा सर्दियों में न्यूनतम तापमान शून्य से 4.6 डिग्री सैल्शियस नीचे तक रिकॉर्ड किया गया है। हाल ही में ओलावृष्टि से रबी की अधिकांश फसलें तबाह हो गई हैं। जिले के अकेले राजगढ़ इलाके के 21 गांवों में 75 फीसदी तक नुकसान आंका गया है।-- फैक्ट फाइल--> कृषि भूमि-13 लाख 85 हजार हैक्टेयर> सिंचित-85 हजार हैक्टेयर> असिंचित-13 लाख हैक्टेयर> कुल किसान-ढाई लाख से अधिक>कृषि तकनीकी स्टाफ-12 व्यक्ति____स्टाफ बढऩे से सरकारी योजनाओं की जानकारी किसानों तक तत्काल पहुंचाने में मदद मिलेगी साथ ही योजनाओं का लाभ उठाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित भी किया जा सकेगा। ऐसे में निश्चित रूप से जिले के कृषि क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।-भंवरसिंह राठौड़, उपनिदेशक, कृषि विभाग, चूरू आगे पढ़ें...
प्रस्तुतकर्ता विश्वनाथ सैनी
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पानी न बन जाए कहानी
विश्व भू-जल दिवस आजभू-जल का अत्यधिक दोहन व पानी बचाने के प्रति जागरूकता के अभाव के कारण जिले का भू-जल स्तर रसातल में जा चुका है। स्थिति ये है कि भू-जल स्तर के लगातार गिरने से पीने योग्य पानी रासायनिक गुणवत्ता की कसौटी पर खरा नहीं उतर रहा है। बरसात के पानी की बूंद-बूंद नहीं बचाई गई तो वो दिन दूर नहीं जब जिलेवासी पीने के पानी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हो जाएंगे। चूरू, 9 जूनपानी के अंधाधुंध दोहन के चलते जिले में भू-जल स्तर में निरंतर गिरावट दर्ज की जा रही है जिससे कुओं की जल देय क्षमता पर विपरीत असर पड़ा है। भू-जल विभाग के सर्वे के मुताबिक जिले में भू-जल दोहन में राजगढ़ तहसील की स्थिति सबसे खतरनाक है। भू-जल दोहन में चूरू, सरदारशहर व रतनगढ़ तहसील की स्थिति वर्ष 2006 में वर्षा पूर्व हुए सर्वे के मुताबिक तो संतोषजनक है। पानी के संरक्षण व अनावश्यक दोहन के प्रति जागरूकता नहीं आई तो जिले में पानी एक दिन कहानी बनकर रह जाएगा।कारण- बढ़ती जनसंख्या- अनियंत्रित दोहन- बारिश कम होना- जल की अधिक खपत वाली फसलों का उत्पादन- परम्परात जल स्रोत पर ध्यान नहींसमस्याएं- भू-जल स्तर रसातल में जाएगा- भू-जल संसाधनों में कमी- सूख जाएंगे कुएं-बावड़ी- भू-जल की गुणवत्ता में गिरावट- भू-जल दोहन के लिए ऊर्जा की अधिक खपतउपाय- जल संरक्षण के परम्परागत स्रोतों की सुध लें- बारिश के पानी की बूंद-बूंद बचाएं- पानी का व्यर्थ उपयोग न हो- सिंचाई में आधुनिक तकनीक का उपयोग- कम पानी में होने वाली फसलों को बढ़ावाऐसे घटा भू-जल स्तरतहसील पुनर्भरण---उपलब्धता--- दोहनराजगढ़ 6.4------5.7------ 25.2सुजानगढ़ 37.16---33.44---- 32.56 रतनगढ़ 26.93----24.90---- 14.57सरदारशहर62.26---56.04---- 16.18 चूरू----9.79-----8.81-----7.82(आंकड़े भू-जल सम्भावित क्षेत्रों में वार्षिक पुनर्भरण और दोहन से संबंधित हैं। सभी आंकड़े एमसीएम इकाई में हैं)गांवों में स्थिति खतरनाकजिले की प्रत्येक तहसील में कुछ गांवों में भू-जल स्तर गिरने की स्थिति खतरनाक है। भू-जल स्तर में अधिक गिरावट वाले गांवों में कुओं की जलदेय क्षमता भी कम होती जा रही है।तहसील---गांव----स्तर गिराचूरू-----41-----0.33 मीटरराजगढ़---38----1.06 मीटरसुजानगढ़--21----2.36 मीटररतनगढ़--35-----0.42 मीटरसरदारशहर--06---1.42 मीटर(आंकड़े 2005 से 2006 की अवधि में ऐसे गांवों के हैं जिनमें सबसे अधिक मीटर भू-जल स्तर गिरा है। )कहां-कितनी गिरावटवर्ष 1984 से 2006 की अवधि में चूरू तहसील के भू-जल स्तर में 0.13 मीटर, सुजानगढ़ तहसील में 4.08, राजगढ़ तहसील में 4.18 व रतनगढ़ में 2.10 मीटर औसत गिरावट दर्ज की गई है। इस अवधि में तारानगर तहसील में भू-जल स्तर बढ़ा है। तारानगर तहसील का अधिकांश भू-जल लवणीय होने के कारण दोहन की दर लगभग शून्य है।इनका कहना...निश्चित रूप से जिले में भू-जल स्तर की स्थिति चिंताजनक है। हर साल जिले में भू-जल स्तर गिरता जा रहा है। पानी के संरक्षण को बढ़ावा नहीं दिया गया तो कुछ सालों में स्थिति ज्यादा खतरनाक हो सकती है।- लक्ष्मण सिंह राठौड़, भू-जल वैज्ञानिक, चूरू---विश्वनाथ सैनीआगे पढ़ें...
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Saturday, February 14, 2009

धरती पुत्रों को मिलेगी कृषक रत्न उपाघि
चूरू। सोना उगाने वाले प्रदेश के किसानों को राज्य सरकार ने तीन प्रकार की उपाघि से अलंकृत करने की तैयारी शुरू कर दी है। एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट एजेंसी (आत्मा) के माध्यम से किसानों को नकद पुरस्कार के साथ-साथ कृषक रत्न, कृषक श्री और कृषक मित्र की उपाघि से नवाजा जाएगा।कृषि निदेशालय ने जिले से सम्मानित होने योग्य किसानों की सूची मांगी है। सूची के आधार पर प्रदेश के तीन किसानों को कृषक रत्न, प्रत्येक जिले के तीन किसानों को कृषक श्री और प्रदेश की प्रत्येक पंचायत समिति के तीन किसानों को कृषक मित्र की उपाघि से सम्मानित किया जाएगा।समिति करेगी चयनजिला आत्मा प्रबंधन समिति प्रत्येक पंचायत समिति में चार-चार किसानों का पुरस्कार के लिए चयन करेगी। चयन में जिला, राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर पूर्व में सम्मानित हो चुके किसानों को प्राथमिकता दी जाएगी। चयनित सूची का जिला कलक्टर एवं जिला प्रमुख से अनुमोदन करवाकर एक किसान का नाम कृषि निदेशालय को राज्य स्तरीय पुरस्कार के लिए भेजा जाएगा। कृषक रत्न पुरस्कार प्राप्त करने वाले किसान के अलावा पुरस्कार के लिए जिले के शेष किसानों के नामों की घोषणा जिला स्तर पर की जाएगी।विशेष दक्षता जरूरीपुरस्कार की दौड में शामिल होने के लिए किसानों का कृषि, उद्यान, डेयरी व पशुपालन में से किसी एक में दक्ष होना जरूरी है। कृषि क्षेत्र से खेती के 21 मूलमंत्रों की पालना करते हुए गुणवत्तायुक्त उत्पादन लेने वाले, उद्यान क्षेत्र से हाइटेक उद्यानिकी व माइक्रो इरिगेशन से सिंचाई तथा पशुपालन क्षेत्र से उन्नत नस्ल के पशु रखने, पशुओं के नियमित टीकाकरण, संतुलित आहार, कृत्रिम गर्भाधान पर विशेष्ा ध्यान देने वाले किसानों को चयन प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा।अघिक अंक वाला होगा हकदारपुरस्कार का हकदार वही किसान होगा जो चयन प्रक्रिया में शामिल किसानों में सबसे अघिक अंक हासिल करेगा। प्रत्येक किसान को कुल उत्पादन के 20 अंक, उत्पादन की गुणवत्ता के 20 अंक, आधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल करने के 40 अंक तथा नवाचार के 20 अंक दिए जाएंगे।पुरस्कार की राशिकृषक रत्न, कृषक श्री और कृषक मित्र प्राप्त करने वाले प्रत्येक किसान को प्रशस्ति पत्र के साथ क्रमश: 21, 11 व पांच हजार का नकद पुरस्कार प्रदान किया जाएगा।किसानों को उपाधि से अलंकृत करने की इस अनूठी योजना के तहत आत्मा के परियोजना निदेशकों को मार्च तक किसानों की सूची भेजने के निर्देश दिए हैं। सूची प्राप्त होने के बाद सम्मान समारोह की तिथि तय की जाएगी।-हरवंश यादव, अतिरिक्त निदेशक (कृषि विस्तार), कृषि निदेशालय, जयपुरयोजना से किसान प्रोत्साहित होंगे। कृषि निदेशालय के निर्देश पर पंचायत समितिवार किसानों की सूची तैयार की जा रही है।-हरजीराम बारूपाल, परियोजना निदेशक, आत्मा, चूरूआगे पढ़ें...
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Friday, February 6, 2009

विद्यार्थी होंगे फेल, कौन कसेगा नकेल !
चूरू। जिले के ढाई सौ से अघिक सरकारी विद्यालयों में व्यवस्थाएं नियंत्रण से बाहर है। संस्था प्रधान की कुर्सी खाली होने के कारण इनमें विद्यार्थियों की पढाई और शिक्षकों के आने-जाने पर नियंत्रण नहीं है। माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक विद्यालयों की तुलना में उच्च प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति ज्यादा खराब है। संस्था प्रधान के खाली पदों की लम्बी फेहरिस्त आठवीं तक के विद्यालयों में है। शिक्षा विभाग के आंकडों की मानें तो जिले के 767 उच्च प्राथमिक विद्यालयों में से 217 व तीन सौ नौ माध्यमिक विद्यालयों में से दस तथा एक सौ सात उच्च माध्यमिक विद्यालयों में से 26 में संस्था प्रधान नहीं है।आसान नहीं नियंत्रण रखनाआठवीं तक के विद्यालयों में संस्था प्रधान की जिम्मेदारी तृतीय श्रेणी के सीनियर शिक्षक को सौंपी जाती है। अस्थायी तौर पर हैडमास्टर बने तृतीय श्रेणी शिक्षक के लिए समान गे्रड के अन्य शिक्षकों पर नियंत्रण रखा पाना आसान नहीं है।वित्तीय मामलों में भी देरीमाध्यमिक विद्यालयों में संस्था प्रधान का पद रिक्त होने के कारण प्रशासनिक जिम्मेदारी द्वितीय श्रेणी शिक्षक एवं वित्तीय अघिकार जिला शिक्षा अघिकारी को सौंपे जाते हैं। उच्च माध्यमिक विद्यालयों में वित्तीय अघिकार सीनियर व्याख्याता को सौंपने की प्रक्रिया में दो माह से अघिक समय लग जाता है। ऎसे में बिना संस्था प्रधान वाले विद्यालयों के वित्तीय मामलों में अक्सर देरी हो जाती है।माध्यमिक विद्यालयजिले में माध्यमिक स्तर तक के 309 विद्यालय हैं। इनमें से मंदीताल, साण्डवा, ईयारा, सारसर, पांचेरा, बरजांगसर, पिचकराईताल, लुहारा, न्यांगल छोटी और बूंटिया के विद्यालय में संस्था प्रधान का पद खाली है।उ.मा. विद्यालयजिले में उच्च माध्यमिक स्तर के 107 विद्यालय हैं। इनमें सिधमुख, सरदारशहर, मालकसर, सुजानगढ, बालरासर आथूना, भामासी, जोडी, रतनगढ, पडिहारा, बीरमसर, जयसंगसर, राघाबडी, हरासर, सिरसला, धीरवासबडा, भगेला, लाखाऊ, मेणासर, पाबूसर, सोनपालसर, भींवसर, चक राजियासर मीठा, खण्डवा, बंधानाऊ, नुहंद व रेडी भूरावास विद्यालय में संस्था प्रधान नहीं है।घर का मालिक नहीं होगा तो व्यवस्था तो गडबडाएगी ही। सेवानिवृति व तबादले के कारण कई स्कूलों में संस्था प्रधान का पद रिक्त है।
-गजेन्द्र सिंह शेखावत, जिला शिक्षा अघिकारी (माध्यमिक), चूरू
अनेक स्कूलों की यह मुख्य समस्या है। हम वर्षों से इसका सामना कर रहे हैं। निदेशालय ने संस्था प्रधान की समस्त जिम्मेदारी बीईईओ को सौंप रखी है।
-हरनारायण, जिला शिक्षा अघिकारी (प्रारम्भिक), चूरूआगे पढ़ें...
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March 2009 January 2009 Home
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दफन न हो जाए विरासत

बजट 'ऊंट के मुंह में जीरा' होने के कारण यहां के ऐतिहासिक स्थल बदहाल हैं।
चूरू, 13 अप्रेल। संरक्षण के अभाव में थळी की विरासत धोरों में दफन होने के कगार पर है। जिला मुख्यालय से करीब दस किलोमीटर दूर स्थित रतननगर कस्बे के ऐतिहासिक स्थल वैभव खो चुके हैं।विरासत संरक्षण योजना का बजट 'ऊंट के मुंह में जीरा' होने के कारण यहां के ऐतिहासिक स्थल बदहाल हैं। संरक्षण योजना के लिए रतननगर नगरपालिका ने 2006-07 में 95.84 लाख, 2007-08 में 92.47 लाख तथा 2008-09 में 79.80 लाख रुपए का प्रस्ताव स्थानीय निकाय निदेशालय जयपुर को लगातार भेजा लेकिन अभी तक फूटी कौड़ी भी मिली। पालिका को योजना शुरू होने के बाद 2005-06 में जरूर 27 लाख रुपए मिले। इस राशि का अधिकांश हिस्सा नगरपालिका ने अन्य मदों पर खर्च कर दिया।इन कामों का इंतजारयोजना के तहत बकाया कामों की फेहरिस्त लम्बी है। बजट के अभाव में गौरव पथ व थैलासर-रतननगर सीमा पर हैरिटेज दरवाजे, शहर पन्ना परकोटे की मरम्मत, स्ट्रीट लाइट, औंकारगिरि आश्रम के पास व देपालसर तिराहे पर सर्किल, अम्बेडकर सर्किल से औंकारगिरि आश्रम तक सौन्दर्यीकरण, लक्ष्मीनारायण मंदिर की मरम्मत होनी है।

इसलिए है खास
विरासत संरक्षण योजना में चूरू के साथ शामिल रतननगर कस्बा कलात्मक हवेलियों और उनके भित्ति चित्रों के कारण खास है। यहां पर पर्यटक प्रयागनाथ व औंकारनाथ गिरि आश्रम, ऐतिहासिक गाड़ोदिया छतरी, द्वारकाधीश व रघुनाथ मंदिर, शहर पन्ना परकोटा व हवेलियों को निहारते हैं।

----बजट आवंटित नहीं होने के कारण विरासत संरक्षण योजना से कस्बा लाभान्वित नहीं हो पा रहा है। बजट मिलते ही बकाया कामों को प्राथमिकता से करवाया जाएगा।
- सत्यनारायण सैनी, अध्यक्ष, नगरपालिका, रतननगर
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रेडियो बनेगा किसानों का साथी

जिलों में स्थापित होगें कम्युनिटी रेडियो स्टेशन

भीलवाड़ा का प्रस्ताव मंजूर

चूरू, 1 जनवरी। खेती से जुड़ी तमाम जानकारियों के लिए कृषि विभाग के साथ अब रेडियो भी किसानों का मददगार बनेगा। किसानों को घर बैठे खेती की जानकारी उपलब्ध कराने की एक अनूठी योजना पर काम शुरू हो गया है। सब कुछ योजनानुसार हुआ तो जल्द ही प्रदेश के सभी किसान कम्यूनिटी रेडियो के माध्यम से अपने जिले की खेती की समस्त जानकारियां प्राप्त कर सकेंगे। एग्रीकल्चर टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट एजेंसी (आत्मा) की कैफेटेरिया गतिविधि डी-2 के तहत प्रदेश के 32 जिलों में कम्यूनिटी रेडियो स्टेशन स्थापित किया जाएगा।आत्मा की नोडल एजेंसी ने परियोजना निदेशकों को कम्यूनिटी रेडियो स्टेशन स्थापना संबंधी दिशा-निर्देश भेजकर प्रस्ताव मांगे है। नोडल एजेंसी के अधिकारिक सूत्रों के अनुसार प्रदेश के विभिन्न जिलों से कम्यूनिटी रेडियो स्टेशन स्थापना के लिए प्रस्ताव आने शुरू हो गए हैं। अधिकांश रेडियो स्टेशन कृषि विज्ञान केन्द्रों में स्थापित किए जाएंगे। भीलवाड़ा के कृषि विज्ञान केन्द्र में कम्यूनिटी रेडियो स्थापित करने के प्रस्ताव को भारत सरकार की मंजूरी मिल गई है। करौली जिले का प्रस्ताव भी भारत सरकार का भेजा जा चुका है। प्रदेश के शेष जिलों के प्रस्ताव प्रारम्भिक चरण में हैं।

सीमित होगा दायरा

कम्यूनिटी रेडियो की फ्रिक्वेंसी का दायरा जिला स्तर तक ही सीमित होगा। रेडियो स्थापना के प्रस्ताव में शामिल स्थानों में से जिले के बीचों बीच स्थित स्थान को प्राथमिकता दी जा रही है। किसान अपने जिले में कहीं पर भी रेडियो के माध्यम से कृषि की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।


ये जानकारी होंगी हासिल

कम्यूनिटी रेडियो के माध्यम से किसानों को फसलों की बुवाई से लेकर कटाई और मण्डियों में बेचने तक की तमाम जानकारी हासिल हो सकेंगी। इसके लिए कृषि विशेषज्ञों एवं प्रगतिशील किसानों को समय-समय पर रेडियो स्टेशन पर आमंत्रित किया जाएगा।फसलों की पैदावार बढ़ाने, समय के हिसाब फसलों की देखभाल, फसलों के कीट प्रबंधन विशेष जोर दिया जाएगा। इनके अलावा किसानों को घर बैठे-बैठे जिले के प्रगतिशील किसानों की सफलता की कहानी खुद उन्हीं की जुबानी सुनने को मिलेगी।


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भीलवाड़ा के केवीके में कम्यूनिटी रेडियो स्टेशन स्थापित करने के प्रस्ताव को मंजूरी मिल चुकी है। करौली का प्रस्ताव सरकार को भेजा जा चुका है। अन्य जिलों से भी प्रस्ताव मांगे हैं।

-केपी गुप्ता, नोडल प्रभारी, आत्मा सेल, जयपुर-

जिला मुख्यालय पर कम्यूनिटी रेडियो स्टेशन की स्थापना पर विचार किया जा रहा है। जनवरी में परियोजना के बोर्ड की जगह में स्थान तय प्रस्ताव नोडल एजेंसी को भेजेंगे।

-डा. हरजीराम बारुपाल, परियोजना निदेशक आत्मा, चूरूआगे पढ़ें...

जी का जंजाल बना परिवार नियोजन

चूरू।छोटा परिवार-सुखी परिवार की नसीहत देने वाले परिवार नियोजन कार्यक्रम ने जिले में कई परिवारों को दुखी कर दिया है। कार्यक्रम के तहत शिविरों में नसबंदी करवाने वाले महिला व पुरूषों को शिविर के दौरान चिकित्सा विभाग द्वारा बरती गई लापरवाही का खामियाजा भुगतना पडा है।गत दो वर्ष के आंकडों पर गौर करें तो चूरू जिले में ऎसे परिवारों की संख्या करीब 64 है जिन्हें नसबंदी ऑपरेशन विफल हो जाने के कारण मानसिक परेशानी भगुतनी पडी है। नसबंदी ऑपरेशन विफल होने पर हाल ही 20 महिलाओं को मुआवजा राशि के रूप में तीस-तीस हजार रूपए के चेक वितरित किए गए हैं मगर जिले के 24 परिवारों को अभी मुआवजे का इंतजार है।
बढा विफलता का ग्राफ
कार्यक्रम के तहत वर्ष 2006-07 के दौरान लगभग आठ हजार एक नसबंदी ऑपरेशन किए गए। इनमें से 20 ऑपरेशन विफल हो गए। वर्ष 2007-08 में आठ हजार 307 महिला/पुरूषों का नसबंदी ऑपरेशन किया गया। इनमें विफल ऑपरेशन का आंकडा 44 रहा। इनमें तीन पुरूष भी शामिल हैं।फिर पति की बारीजिले में अघिकांश ऑपरेशन दूरबीन की सहायता से किए गए हैं। महिला का नसबंदी ऑपरेशन विफल होने पर दूरबीन से दुबारा ऑपरेशन करना लगभग संभव नहीं है। ऎसे में महिला को या तो सर्जरी से ऑपरेशन करवाना पडता या फिर उसके पति को ऑपरेशन के लिए आगे आना पडता है।
ऎसे होते हैं प्रोत्साहित
कार्यक्रम के तहत सरकारी अस्पताल में नसबंदी ऑपरेशन करवाने पर सरकार की ओर से संबंघित महिला को 600 तथा पुरूष को 1100 रूपए दिए जाते हैं। महिला को ऑपरेशन के लिए प्रेरित करने वाले को 150 तथा पुरूष को प्रेरित करने वाले को 200 रूपए दिए जाते हैं। ऑपरेशन विफल होने पर बीमा कम्पनी की ओर से एक ही बार मुआवजा दिया जाता है।
नका कहना...
जिले में नसबंदी के 0।6 से 2 प्रतिशत तक ऑपरेशन विफल होते हैं। पीडित परिवार को बीमा योजना के तहत मुआवजा दिया जाता है। शेष रहे 24 परिवारों को आगामी दो माह में मुआवजे का भुगतान हो जाएगा।
प्रशांत खत्री, उपमुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अघिकारी, चूरू

कोष पर अफसरों की कुंडली

सशस्त्र सेना झंडा दिवस के स्टीकरों के लाखों रूपये बकाया
चूरू, 15 जनवरी। देश की आन, बान और शान के लिए जान की बाजी लगाने वाले सपूतों के परिवार और उनके आश्रितों के कल्याण की राशि पर शेखावाटी के अफसर कुंडली मारे बैठे हैं। देश को सबसे अघिक फौजी देने वाले शेखावाटी में अघिकारियों की लापरवाही के चलते चूरू, सीकर, झुंझुनूं , नीमकाथाना और चिडावा सैनिक कल्याण कार्यालय का लक्ष्य प्रतिवर्ष अधूरा रह जाता है। अंचल के घिकांश विभाग सैनिक कल्याण कार्यालय के माध्यम से सशस्त्र सेना झण्डा दिवस के स्टीकरों की धनराशि एकत्रित करने के प्रति गंभीर नहीं हैं।
वितरित करने होते हैं स्टीकर
सैनिक कल्याण कार्यालय की ओर से विभिन्न विभाग और संस्थाओं को सशस्त्र सेना झण्डा दिवस (7 दिसम्बर) के स्टीकर उपलब्ध करवाए जाते हैं। विभाग को जन समूह में स्टीकरों का वितरण कर धनराशि एकत्रित करनी होती है। स्टीकर शर्ट की जेब व वाहनों पर चस्पा किए जाते हैं। स्टीकरों के बदले एकत्रित की गई धनराशि सैनिक कल्याण कार्यालय के माध्यम से अमल गमैटेड फण्ड में भेजी जाती है। सैनिक परिवार एवं उनके आश्रितों के लिए संचालित कल्याणकारी योजनाओं में इस राशि का उपयोग किया जाता है।
12 साल से नहीं ली
चूरू और सुजानगढ केतहसीलदारों पर स्टीकरों की राशि 1996 से बकाया है। इनके अलावा सार्वजनिक निर्माण विभाग के अघिशाषी अभियंता, जोधपुर विद्युत वितरण निगम के सहायक व अघिशाषी अभियंता, समाज कल्याण अघिकारी, एसपी कार्यालय, सीएसडी कैंटीन, सरदारशहर बीईईओ व चूरू, माध्यमिक के डीडी, आपणी योजना, सभी नगरपालिकाएं, तहसीलदार, विकास अघिकारी, उपपंजीयक अघिकारी पर 1996 से 2007 तक के 1 लाख 73 हजार 8 91 रूपए बकाया हैं।
दो साल के 70 हजार बकाया
नीमकाथाना सैनिक कल्याण कार्यालय में दो साल से तीन तहसीलों के विभिन्न विभाग एवं अघिकारियों पर लगभग 70 हजार रूपए बकाया हैं। इनमें श्रीमाधोपुर आगार प्रबंधक के 5 हजार, तहसीलदार के दस हजार, तीनों तहसीलों के विकास अघिकारियों के 41 हजार 6 00, श्रीमाधोपुर व नीमकाथाना विकास अघिकारी के 11 हजार 200 रूपए शामिल हैं।
नहीं चुकाए लाखों रूपए
चिडावा सैनिक कल्याण कार्यालय में चार तहसीलोे के थानाघिकारियों, एसडीएम, तहसीलदार व बीडीओ व कुछ महाविद्यालयों पर 2004 से पहले के 6 3 हजार 127 रूपए, 2005 के 56 हजार 540 रूपए, 2006 के 1 लाख 75 हजार 125 रूपए तथा 2007 के एक लाख 6 4 हजार 26 5 रूपए बकाया हैं। चिडावा में अक्टूबर 2004 से सैनिक कल्याण कार्यालय खोला गया था।
बताने को तैयार नहीं
अफसोस की बात है कि खुद फौज में रह चुके सीकर और झुंझुनूं सैनिक कल्याण अघिकारी झण्डा दिवस के स्टीकरों की बकाया राशि नहीं चुकाने वाले विभागों का नाम बताने से भी कतराते हैं। जबकि दोनों ही अघिकारी स्वीकार करते हैं कि उनके जिले में भी अघिकारियों पर स्टीकरों के लाखों रूपए बकाया हैं।
नका कहना है...
.सशस्त्र सेना झण्डा दिवस के स्टीकरों की राशि करीब तीस विभागों पर बकाया है। कई विभागों के सहयोग के अभाव में सैनिक कल्याण कार्यालय का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाता है।-मेजर रामकुमार कस्वां, जिला सैनिक कल्याण अघिकारी, प्रतिक्रियाएँ: 6 टिप्पणियाँ इस संदेश के लिए लिंक

मैं और मेरी तनहाई

जब दिल की बात जुबां पर नहीं आए...बार-बार समझाने के बावजूद गले तक आकर अटक जाए...दिल में हल्की सी आहट हो...दिलों-दिमाग काम करना बंद कर दें...मन हल्का और सिर भारी हो जाए...हालात ऐसे कि ना दुआ लगे और ना ही दवा...रगों में दौड़ रहे खून की दौड़ मानो थम सी जाए...दिल को कहीं भी सुकून नहीं मिले...मन उदास हो जाए...हाल-ए-दिल किसी भी तरह बयां न हो तो मैं मेरा वर्षों पुराना फार्मूला अपनाता हूं...मैं गुमसुम बैठकर उसका इंतजार करता हूं...उसकी आहट ही मुझे सुकून देना शुरू कर देती है...उसके आगमन पर कदमों की आहट मुझे स्पष्ट सुनाई देती है...ऐसे हालात में वह बिना किसी देरी के मेरे पास आ जाती है...कुछ ही देर में वह मेरे साथ होती है...हमारे पास कोई दूजा नहीं होता....जब हम दोनों अकेले होते हैं तो घंटों बतियाते हैं...वह ज्यादा कुछ नहीं बोलती बस हरामखोर मेरी सुनती ही जाती है...लोग इसे तन्हाई के नाम से जानते हैं...मगर मैं इससे दोस्त के रूप में परिचित हूं...मेरी इस दोस्त को कभी कम मत आंकना क्योंकि यह बड़े काम की चीज है...इसने अच्छे-अच्छे लोगों का दुख की घड़ी में साथ निभाया है...जितना मैं इसे जानता हूं... उसके आधार कहना गलत नहीं होगा कि तन्हाई यूं ही किसी का साथ नहीं देती...साथ दे भी तो यह बात नहीं करती और बात कर भी ले तो यह अपने बारें में कभी कुछ नहीं बताती....मगर मेरे साथ यह ऐसा नहीं करती...इसका कारण तो मुझे पता नहीं...मगर मैं उसे अच्छी तरह जानता हूं...कई बार इसने मेरा साथ दिया है...मेरी सुनी ही नहीं बल्कि अपनी भी काफी बातें मुझे बताई है...एक दिन यह बता रही थी कि इसका कोई स्थायी ठिकाना नहीं है...इसे यह भी पता नहीं होता है कि इसे कहां जाना है...कब वापस आना है...कहीं जाकर करना क्या है...कितनी देर रहना है...ये तमाम परेशानियों के बावजूद यह वर्षों से लोगों का साथ दे रही है...मैंने एक दिन इससे पूछा कि तुम्हे कैसे पता लगता है कि मैं तुम्हे याद कर रहा हूं...तुम्हारी जरूरत महसूस कर रहा हूं... और कभी भी ऐसा नहीं होता कि तुम कहीं दूसरी जगह व्यस्त हो...जवाब सुन तो मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई....एक हल्की सी सांस लेते कहा कि जब कोई दिल टूट जाए...कोई मुझे दिल से याद करे...कोई मेरे बिना रह नहीं सके.. तो मुझे आना ही पड़ता है...मैं अपने साथी को कभी एकेलापन महसूस नहीं होने देती हूं...पागल, मैं तो हवा हूं कहीं व्यस्त कैसे हो सकती हूं. हां इतना जरूर है कि मेरा साथ लोगों को जरूर महसूस होता है...मेरे आने का पता तो लग जाता है मगर कब गई इसकी किसी को भनक तक नहीं लगती...क्या करूं दोस्तों, मैं अक्सर मेरी तन्हाई के साथ घंटों बैठकर बतियाता हूं...इसे मेरी कमजोरी कहे या मेरी होशियारी मगर मुझे तन्हाई के साथ कुछ पल बिताने की आदत सी हो गई है...आप भी ऐसा करके देखना बड़ा सुकून मिलेगा....
प्रस्तुतकर्ता विश्वनाथ सैनी
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1 टिप्पणियाँ:

manoj said...
meri tanhaaii ka lekh pada aur mujhe bahut achchh laga.
February 19, 2009 11:18 AM

वो तो दिल में बसता है...

जिसका नाम लेने भर से रूह को सुकून मिलता है...दुनियाभर के लोग जिसकी आस्था के समुद्र में गोता लगा रहे हैं...जिसके बारे में कहा जाता है कि उसके घर देर है मगर अंधेर नहीं...जिसे लोग हर लम्हा हर पल अपने पास महसूस करते हैं...वह लोगों की खुशियों में भी शरीक होता है और दुखों में भी...गमों का पहाड़ टूटने पर वह जीने का सहारा बनने से भी नहीं कतराता...एक दिन मेरा पागल मन उसको खोजने निकल पड़ा...उसे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरजाघर में ढूंढा...राह में मिलने वाले हर बंदे से उसका ठिकाना पूछा...मगर हर चौखट पर उसका रूप बदला हुआ था...और हर गली में उसका नाम अलग था...उसके इतने सारे रूप देख और नाम सुन तो पागल मन और बावला हो गया...बेचारे मन के कुछ भी समझ में नहीं आया...मुझसे बोल रहा था कि उसे खुदा कहूं या भगवान, उसका नाम रब है या परमेश्वर...रहीम चाचा को तो वो हाथों की लकीरों में दिखाई देता है...और राम को दीये की लो में...करतार सिंह तो पंचों में भी उस परमेश्वर को देख लेता है...और माइकल तो उसे हर लम्हा अपने नजदीक मानता है...दुनिया में वो ही एक ऐसा शख्स है... जो लोगों को आंखें बंद करने के बाद भी साफ नजर आता है...पागल मन का हाल जान तो मैं भी अजीब उलझन में फंस गया...क्योंकि ना तो मैंने कभी उस शख्स को देखा है और ना ही कभी उससे बात की है...बेचैन मन को कैसे समझाऊं कि वह कौन है?...जो संगीत में है...माँ-बाबा में दिखाई देता है...गरीब की दुआओं में जिसका जिक्र होता है...जो हवाओं की दिशा बदलने की ताकत रखता हो...नदियों और नालों की रूख जो मोड़ दे...जिसका वास्ता देने पर लोगों की रूह कांप उठती हो...जिसे लोग पत्थर में देखते हैं... पूजते हैं...यहां तक की उससे बात भी करते हैं...जिसे अग्नि का रूप मान लोग सात जन्मों तक प्यार के बंधन में बंध जाते हैं...जिसको साक्षी मान प्रेमी जोड़े जिंदगीभर के लिए एक-दूसरे के हो जाते हैं...हर शख्स उसके लिए 24 घंटों में से कुछ समय निकालता है...पागल मन ने मेरे चैहरे को पढ़ लिया...उसने भांप लिया कि मैं उस अनदेखे शख्स की टोह लेने में कामयाब नहीं हुआ...उसे बता नहीं पाऊंगा कि वो कौन है?... पागल ने लम्बी सांस ली और तस्सली से मेरे पास आकर बैठ गया...मैं जिस मन को लम्बे समय से पागल समझ रहा था...उसकी बातें सुन तो मेरा वर्षों पुराना भ्रम मिनटों में टूट गया...एकाएक मेरी नजरें उसके सामने झुक गई...उस मन ने मुझे बताया कि मंदिर में भी वही शख्स है जो मस्जिद में है...गुरुद्वारा और गिरजाघर के उसके रूप में भी कोई अंतर नहीं है...इन चारों का असली रूप तो हमारे दिल में बसता है...उसे हम किसी भी नाम से जानें...यह उसने हम पर छोड़ रखा है...---विश्वनाथ सैनी
प्रस्तुतकर्ता विश्वनाथ सैनी
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2 टिप्पणियाँ:

Pankaj Mishra said...
बहूत अच्छा लिखा है आपने
September 14, 2009 2:05 PM

Ram said...
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September 14, 2009 2:31 PM

Sunday, February 7, 2010

हाइटेक होगा लोहिया महाविद्यालय

वेबसाइट पर होंगी समस्त सूचनाएं
चूरू, 21 जून। जिला मुख्यालय पर स्थित लोहिया महाविद्यालय से जुड़ी तमाम सूचनाएं अब दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर प्राप्त की जा सकेंगी। चालू सत्र में विद्यार्थियों को कॉलेज के संकाय, सीटों की संख्या, स्टाफ, विभागाध्यक्ष, गत वर्षों का परीक्षा परिणाम, कॉलेज के होनहार छात्रों की सूची समेत कई जानकारी प्राप्त करने के लिए महाविद्यालय के गलियारों में चक्कर नहीं लगाने पडेंग़े। यह सब जानकारी महाविद्यालय की वेबसाइट पर होगी। इस बार महाविद्यालय में छात्राओं के कॉमन रूम का विस्तार करने के साथ ही पांच कक्षा-कक्षों का भी निर्माण करवाया गया है। गत वर्ष शुरू किए गए नॉलेज सेंटर के साथ-साथ इस बार महाविद्यालय के विद्यार्थियों को नेटवर्क रिसोर्स सेंटर की भी सुविधा उपलब्ध करवाई जाएगी।
नेट से होंगे अपडेट
महाविद्यालय की वेबसाइट डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट एलसीसी डॉट एसी डॉट इन को हर दिन अपडेट किया जाएगा। फिलहाल वेबसाइट पर महाविद्यालय की सूचनाएं लोड की जा रही हैं। वेबसाइट पर विद्यार्थी महाविद्यालय के संबंध में सुझाव भी दे सकेंगे।एनआरसी करेगा मददइस बार महाविद्यालय में नेटवर्क रिसोर्स सेटर स्थापित किया गया है जो सरकारी कॉलेजों के पीजी विभागों को आपस में जोडऩे के साथ ही उनका यूजीसी से सम्पर्क करवाएगा। सेंटर से विद्यार्थी और व्याख्याता नवीन शोधपत्रों की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।
----महाविद्यालय को पूरी तरह से हाइटेक बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है। इससे न केवल विद्यार्थी बल्कि महाविद्यालय स्टाफ भी लाभान्वित होगा।-जीएस महला, इंचार्ज, तकनीकी टीम, लोहिया महाविद्यालय, चूरू
प्रस्तुतकर्ता विश्वनाथ सैनी

पहुंच से दूर होता पानी

मानसून पूर्व सर्वे की रिपोर्ट चिंताजनक
मीठा पानी 1.25 मीटर और नीचे चला गया
चूरू, 27 अगस्त। थळी में पानी पहुंच से दूर होता जा रहा है। लोगों को हलक तर करने के लिए धरती में सुराख हर साल गहरे करने पड़ रहे हैं। हालात इस कदर बिगड़ते जा रहे हैं कि जिले में मीठे पानी का भूजल स्तर ऊपर आने का नाम नहीं ले रहा है। खारा पानी भी पाताल की राह पकड़ चुका है। बारिश की बूंद-बूंद को सहेजने के प्रति बेरुखी यूं ही बरकरार रही तो वह दिन दूर नहीं जब बूंद-बूंद के लिए तरसना पड़ सकता है। भूजल विभाग की ओर से 15 मई से 15 जून तक किए गए सर्वे में चिंताजनक तथ्य सामने आए हैं। थळी के लिए यह बात चौंकाने वाली बात है कि बीते एक साल में ही मीठा पानी का स्तर 1.25 मीटर और नीचे चला गया है।
ब्लॉकों के बिगड़ते हालात
भूजल स्तर के मामले में जिले के तारानगर के अलावा सभी ब्लॉक की स्थिति विकराल होती जा रही है। तारानगर ब्लॉक में पानी अत्यधिक खारा होने के कारण वैसे भी पीने योग्य नहीं है। वर्ष 2008 से पहले जिले का राजगढ़ ब्लॉक डार्क जोन (अत्यधिक चिंताजनक) में था। अब इस श्रेणी में सुजानगढ़ ब्लॉक भी शामिल हो गया है। रतनगढ़ ब्लॉक की स्थिति संतोषजनक से चिंताजनक की ओर तेजी से बढ़ रही है। चूरू व सरदारशहर की स्थिति केवल संतोषजनक ही है।
बचा लो बारिश की बूंद-बूंद
जिलेवासियों को भविष्य में हलक आसानी से तर करने के लिए अभी से बारिश की बूंद-बंूद सहेजनी होगी। पानी के अंधाधुंध दोहन की बजाय भूजल के पुनर्भरण के प्रति अधिक जागरूक होना होगा। जिले में जल संरक्षण के लिए कूप पुनर्भरण समेत कई सरकारी योजनाएं चल रही हैं मगर नतीजे उत्साहजनक नहीं हैं। इतना नीचे गया पानीजिले में मीठा पानी तेजी से पाताल में समा रहा है। वर्ष 1995 के बाद से चूरू ब्लॉक के गांव लाखाऊ जोन में 6.87 मीटर, राजगढ़ ब्लॉक के गांव थिरपाली बड़ी जोन में 17.77 मीटर, रतनगढ़ ब्लॉक के गांव जेगणिया बीदावतान जोन में 6.15 मीटर, सरदारशहर ब्लॉक के गांव राजासर बीकान जोन में 4.68 मीटर, सुजानगढ़ ब्लॉक के गांव तेहनदेसर जोन में 24.83 मीटर तक मीठा पानी पाताल में समा चुका है।
भारी पड़ेगी मानसून की बेरुखी
इस बार भूजल स्तर बढ़ाने में मानसून की बेरुखी भी भारी पड़ेगी। कृषि विभाग के अनुसार जिले में 23 अगस्त तक औसत 200 एमएम बारिश हुई है, जो सामान्य से 160 एमएम कम है। चूरू में 130 एमएम, सरदारशहर व रतनगढ़ में 176 एमएम, सुजानगढ़ में 328 एमएम, राजगढ़ में 174 तथा तारानगर में 217 एमएम बारिश हो पाई है।
घटता भूजल स्तर
ब्लॉक~~~~1995~~~~२००९
चूरू~~~~~34.49~~~~36.२२
राजगढ़~~~~37.25~~~~42.०३
रतनगढ़~~~~50.26~~~~53.०३
सरदारशहर~~~~51.28~~~~51.५१
सुजानगढ़~~~~48.38~~~~51.५२
तारानगर~~~~25.44~~~~*23.९९
(*तारानगर ब्लॉक में पानी खारा होने के कारण पुनर्भरण की तुलना में दोहन कम होने से भूजल स्तर बढ़ा है, आंकड़े मीटर में)
~~~~~~
जिले में भूजल स्तर की स्थिति दिनोंदिन बिगड़ती जा रही है। मानसून पूर्व सर्वे में इस बार भी स्थिति चिंताजनक पाई गई है। लोगों को जल संरक्षण के प्रति अविलम्ब जागरूक होने की दरकरार है।
-लक्ष्मण सिंह राठौड़, कनिष्ठ, भूजल वैज्ञानिक, चूरू
प्रस्तुतकर्ता विश्वनाथ सैनी
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1 टिप्पणियाँ:

swrsrk said...
Bhaut Badia Vishwantha JiKhabar pasnad ayye. Lage rahe sukha dur kabhi to hogaBest wishes from Pawan Rana
August 29, 2009 10:17 AM

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Saturday, February 6, 2010

'पधारो म्हारे देश'

शेखावाटी के पर्यटन स्थल पर खर्च होंगे छह करोड़
चूरू, 12 नवम्बर। पर्यटन के लिहाज से विश्वभर में पहचान बना चुके शेखावाटी के पर्यटन स्थल अब नए रंग-रूप में पर्यटकों से कहेंगे पधारो म्हारे देश। इसके लिए सीकर, चूरू और झुंझुनूं के चुनिंदा पर्यटक स्थलों का पुनरूद्धार, सरंक्षण तथा सौंदर्यीकरण किया जाएगा। यह सब केन्द्र सरकार की शेखावाटी सर्किट परियोजना के तहत होगा।
परियोजना के माध्यम से शखावाटी के पर्यटन स्थलों पर ६ करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। इनमें शेखावाटी के गांवों, कस्बों और शहरों में स्थित पर्यटन स्थलों का पुनरूद्धार, नवीनीकरण, संरक्षण तथा साफ-सफाई कार्य करवाएं जाएंगे। जून में तीनों जिलो से मुख्य पर्यटन स्थलों का विकास करवाने का प्रस्ताव केन्द्र सरकार के पास भेजा जा चुका है। प्रस्ताव पास होने के बाद विकास कार्य शुरू हो जाएंगे।
प्रस्ताव में चूरू से सेठाणी जोहड, चूरू किला, टकनेत की छतरी, तालछापर इत्यादी के पुनरूद्धार, संरक्षण, साफ-सफाई तथा नवीनीकरण के लिए एक करोड़ २० लाख रुपए का प्रस्ताव भेजा गया है। इसके अलावा तालछापर में पर्यटकों के विश्राम के लिए पांच भवन बनेंगे, शौचालय की सुविधा होगी तथा पार्किग माकूल व्यवस्था की जाएगी।
इसी तरह से झुंझुनूं के पर्यटन स्थलों पर २ करोड़ १० लाख खर्च करने का प्रस्ताव भेजा गया है। इसमें मेड़ता की बावड़ी, चौबिस कोसी परिक्रमा में आने वाले पर्यटक स्थल, किरोड़ी स्थित कुण्ड का विकास करना तथा लोहार्गल में पर्यटक विश्रामगृह व शौचालय बनाना शामिल है। नवलगढ़ के घेर का मंदिर तथा सादुलपुर की छतरी का सौन्दर्यीकरण व झुंझुनूं में स्थित पर्यटक स्वागत केन्द्र तथा गांधी चौक का जीर्णोद्धार होगा। झुंझुनूं, खेतड़ी और मंडावा की सड़कों पर पर्यटन स्थलों के दिशा-निर्देश बोर्ड भी लगेंगे। झुंझुनूं और चूरू की तरह ही सीकर के चुनिंदा पर्यटक स्थलों का विकास किया जाएगा।
चूरू के जिला कलेक्टर अर्जुन मेघवाल के अनुसार शेखावाटी सर्किट परियोजना के माध्यम से शेखावाटी के तीनो जिलों के मुख्य पर्यटन स्थलों को एक सर्किट से भी जोड़ा जाएगा। सर्किट से जुडऩे के बाद सभी पर्यटन स्थलों का भ्रमण एक साथ ही किया जा सकेगा। यह भ्रमण यात्रा बस द्वारा झुंझुनूं के मंडावा के पर्यटन स्थलों से शुरू होगी। मात्र दो दिन में पर्यटकों को शेखावाटी के मुख्य पर्यटन स्थलों का भ्रमण करवाकर वापस मंडावा पहुंचेगी। परियोजना में पर्यटक स्थलों पर पर्यटकों के रात्रि विश्राम की व्यवस्था करने का पूरा ध्यान रखा जाएगा।

इनका कहना है
इस योजना के तहत शेखावाटी के तीनो जिलो के पर्यटक स्थलों पर खर्च होने वाली राशि का प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजे गए है। संभवत इस साल के अंत तक प्रस्ताव पास हो जाएंगे। प्रस्तावा में पास होने वाली राशि ही प्रत्यके जिले में खर्च की जाएगी। सीकर से भेजे गए प्रस्ताव में कुछ बदलाव हुआ है, जिसकी सूचना अभी हमारे पास नहीं है।
संजय जौहरी-सहायक निदेशक पर्यटन विभाग,
12नवम्बर 07 को राजस्थान पत्रिका में छपी

हिसाब-किताब

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