Wednesday, June 23, 2010

ऊपर वाले से जोड़ लो कनेक्शन

दोस्तों, बचपन में हमने दो ही कनेक्शनों का नाम सुना था। एक पानी का और दूसरा बिजली का। पानी के कनेक्शन को लेकर घर में हल्ला तब होता था जब नल से पानी की बजाय हवा आकर रह जाती थी। उस वक्त बाबा पानी महकमे के अधिकारियों को न केवल खूब खरी-खरी सुनाते बल्कि पानी का कनेक्शन ही बदलने तक का मानस बना लेते थे।
बिजली का कनेक्शन तो हर चार-छह महीने बाद घर में बवाल मचा ही देता था। सैकड़ों में आने वाला बिजली का बिल अचानक हजारों में आता देख परिवार में हर किसी को जोर का झटका धीरे से लगता। घर में तीन लट्टू और एक पंखे पर खर्च की गई बिजली के पेटे डेढ़ हजार से अधिक का बिल आने पर बाबा बिल की राशि में संशोधन कराने के लिए महकमे के एईएन, जेईएन व कभी-कभी तो एसई तक पर भड़ास निकाल आते। अधिकारी एक ही जवाब देते कि आपका विद्युत मीटर धीमे चलता है। पिछले कई माह के बिलों की राशि इस बार जुड़कर आ गई। ऐसा वाकया कई बार होने पर बाबा ने एक बार तो बिजली का कनेक्शन ही कटवा दिया था। हालांकि बाद में बिल में संशोधन भी हो गया और हमारा घर रोशन भी।
खैर, छोड़ो उस वक्त हम निकर पहना करते थे, लेकिन पतलून पहननी शुरू की तब एक और कनेक्शन का नाम सुना। वो था टेलीफोन का कनेक्शन। मोहल्ले में एक फैक्ट्री मालिक ने पहली बार टेलीफोन का कनेक्शन लिया तो उन्होंने हर घर में मिठाई बांटी। वो बात बात में ऐसा महसूस कराते कि पूरी दुनिया से उनका घर बैठे कनेक्शन जुड़ गया। मोहल्ले में किसी के भाई, बेटे या रिश्तेदार का उनके टेलीफोन पर फोन आ जाता तो वे ऐसे बुलाने जाते जैसे फोन नहीं बल्कि वो व्यक्ति खुद चलकर उनसे बात करने आया हो।
भाई, मुद्दे की बात तो यह है कि अल्ला की मेहरबानी से हम पढ़ लिख लिए और दो पैसे कमाने भी लगे। मगर पिछले दिनों कालू कसाई की छोरी को छेड़ने के एक झूठे मामले में हम फंस गए। तब हमें हमारे तीन साल पुराने एक भायले ने एक और कनेक्शन के बारें में बताया। और वो था डीटीजी। पड़ गए ना सोच में। डीटीजी यानि डायरेक्ट टू गॉड।
जी, हां दोस्तों जिसने डीटीजी को जान लिया उसने मानों जिंदगी की आधी जंग जीत ली। ऊपर वाले से अगर सीधा जुड़ाव हो तो हमारी बिजली-पानी की तो क्या जीवन की बड़ी से बड़ी परेशानी को हल होते देर नहीं लगती। बशर्त उस अदृश्य शक्ति से हमारा कनेक्शन मजबूत हो यानि उसके प्रति अटूट आस्था और श्रद्धा में कोई कमी नहीं हो। उसने हमारे जीवन में जो होना है और जो ना होना है...वह पहले ही तय कर रखा है। किसी अनहोनी की आशंका में दिल घबरा जाए तो सब कुछ ऊपर वाले पर छोड़ दो। और इस विश्वास के साथ आगे बढ़ जाओ कि लाइफ में जो होगा अच्छा होगा...और जो नहीं हो रहा वो भी अच्छा हो रहा है...हमारे साथ कभी गलत नहीं होगा क्योंकि ऊपर वाले के साथ अपना कनेक्शन अच्छा है।

Thursday, June 17, 2010

एक शाम ग्रामीणों के नाम

पंचायतों में लगेगी चौपाल, अधिकारी सुनेंगे गांव की समस्या
चूरू. गांव की मुख्य समस्याओं के समाधान को लेकर ग्रामीणों को अब अधिकारियों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे, क्योंकि अधिकारी खुद ग्रामीणों के बीच एक शाम बिताकर समस्याओं का समाधान करेंगे। इसके लिए प्रशासन की ओर से ग्राम पंचायत मुख्यालय पर शाम को चौपाल लगाई जाएगी। गांव की अधिकांश समस्याओं का समाधान मौके पर ही होगा जबकि शेष समस्याओं को सरकार के पास भेजा जाएगा।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार जिले की कुल 249 ग्राम पंचायतों में से पांच-सात का एक समूह बनाया जाएगा। प्रत्येक समूह पर एक दिन शाम को चौपाल लगाकर अधिकारी ग्रामीणों से रू-ब-रू होंगे। चौपाल का नेतृत्व उपखण्ड अधिकारी, तहसीलदार व नायब तहसीलदार में से कोई एक करेगा। इनके अलावा चौपाल में बिजली, पानी, चिकित्सा, नरेगा व शिक्षा विभाग आदि के अधिकारी तथा सरपंच व ग्राम सेवक और पटवारी भी मौजूद रहेंगे।
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दिन में करेंगे समीक्षा
चौपाल से पूर्व दिन में विभिन्न विभागों के अधिकारी व कर्मचारी गांव में जाकर योजनाओं की समीक्षा करेंगे। शाम को चौपाल में ग्रामीणों के साथ समस्याओं के समाधान पर विस्तार से चर्चा करेंगे। नरेगा श्रमिकों को काम नहीं मिलने, भुगतान में देरी होने, पेयजल किल्लत, विद्यालय में स्टाफ लगाने जैसी समस्याओं का तत्काल समाधान किया जाएगा जबकि विद्यालय, स्वास्थ्य केन्द्र आदि की क्रमोन्नति के प्रस्ताव राज्य सरकार को भिजवाए जाएंगे।
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इनका कहना है...गांवों में चौपाल लगाने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। दो ग्राम पंचायतों का कार्यक्रम भी तय कर लिया है। जिले की समस्त ग्राम पंचायतों में चौपाल लगाएंगे। इससे गांव की समस्याओं का समाधान आसानी से किया जा सकेगा।
-डा.केके पाठक, जिला कलक्टर, चूरू

Wednesday, June 16, 2010

गड़बड़ी के सारे सुराख बंद

राज्य में 15 अगस्त से लागू होगा ई-मस्टररोल
सबसे पहले चूरू ने किया था जारी
चूरू। महात्मा गांधी रोजगार गारण्टी योजना में मस्टररोल के जरिए होने वाली गड़बड़ी के सारे सुराख जल्द ही बंद हो जाएंगे। अब मस्टररोल में ना तो श्रमिकों के फर्जी नाम लिखे जा सकेंगे और ना ही हाजिरी में कांट-छांट की जा सकेगी। यह सब ई-मस्टररोल से संभव होगा। ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग आगामी 15 अगस्त से प्रदेशभर में ई-मस्टररोल व्यवस्था लागू करने जा रहा है।
राज्य में पहली बार ई-मस्टररोल गत वर्ष सितम्बर में चूरू जिला प्रशासन की ओर से अपने सुजानगढ़ ब्लॉक में जारी किया गया था। चूरू जिले में ई-मस्टररोल की सफलता के बाद विभाग ने इसे प्रदेश के अन्य जिलों में भी लागू करने का निर्णय किया है। विभाग ने ग्राम सेवक, ग्राम रोजगार सहायक, मेटों व अन्य संबंधित व्यक्तियों को ई-मस्टररोल व्यवस्था का प्रशिक्षण देने के लिए समस्त जिलों को मार्गदर्शिका भी भेजी है।
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अक्टूबर से होगा अनिवार्य
महानरेगा में 16 अगस्त से शुरू होने वाले पखवाड़़े से जिले की एक पंचायत समिति में ई-मस्टररोल जारी करना होगा। वहां पर पायलट के रूप में यह व्यवस्था 15 सितम्बर तक चलेगी। इस अवधि के अनुभव के आधार पर एक अक्टूबर से शुरू होने वाले पखवाड़े से सम्पूर्ण जिले में ई-मस्टररोल जारी होंगे।
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यूं कसी जाएगी लगाम
फिलहाल नरेगा में श्रमिकों की मांग के आधार पर पंचायत समिति कार्यालय से कार्य का नाम व अवधि अंकित कर मस्टररोल जारी किए जाते हैं। जिनमें मेट मस्टररोल में श्रमिकों के नाम दर्ज कर हाजिरी भरता है। मस्टररोल में श्रमिकों के फर्जी नाम व हाजिरी में गड़बड़ी कर नरेगा की राशि डकारने के मामले आए दिन सामने आते रहते हैं। ई-मस्टररोल भी साधारण मस्टररोल की तरह ही होगा, लेकिन इसे जारी करते समय श्रमिक का नाम, परिवार का बीपीएल नम्बर, मुखिया का नाम और काम की अवधि कम्प्यूटर से दर्ज की जाएगी।
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बैकलॉग भी नहीं रहेगा
ई-मस्टररोल जारी होने से मैनेजमेंट इंर्फोमेशन सिस्टम (एमआईएस) में मस्टररोल डाटा फीडिंग का बैकलॉग भी नहीं रहेगा। साधारण मस्टररोल से कम्प्यूटर में श्रमिकों के तमाम डाटा फीड करने में करीब डेढ़ माह तक बैकलॉग रहता है। जिससे नरेगा में बजट जारी होने में देरी होती है। ई-मस्टररोल में श्रमिकों की अधिकांश सूचनाएं पहले से ही दर्ज होने के कारण पखवाड़ा पूर्ण होने के दूसरे ही दिन एमआईएस में डाटा फीड किए जा सकेंगे।
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महानरेगा में ई-मस्टररोल लागू करने के संबंध में समस्त जिलों को दिशा-निर्देश दिए गए हैं। अगस्त व सितम्बर में इसे पायलट के रूप में लागू कर एक अक्टूबर से अनिवार्य किया जाएगा।इससे निश्चित रूप से मस्टररोल में की जाने वाले गड़बडिय़ां रोकी जा सकेगी।
-तन्मय कुमार, आयुक्त, महानरेगा

मस्टररोल के माध्यम से नरेगा में गड़बड़ी की बढ़ती शिकायतों को देखते हुए पिछले साल सितम्बर में चूरू ने सुजानगढ़ ब्लॉक में राज्य में पहला ई-मस्टररोल जारी किया था। बाद में इसका सॉफ्टवेयर जोधपुर को भी उपलब्ध करवाया गया। अब यह व्यवस्था प्रदेशभर में लागू होने जा रही है।
-डा.केके पाठक, जिला कलक्टर, चूरू

Tuesday, June 15, 2010

पढाई होगी रूचिकर

चूरू । कला संकाय में इतिहास हो या विज्ञान में शरीर की संरचना या फिर वाणिज्य में वर्षो पुरानी लेखा पद्धतियां। सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थी इन सबके बारे में किताबों में पढने के साथ कम्प्यूटर पर इनसे संबंघित फोटो, विजुअल, डायग्राम व ग्राफ आदि भी देख सकेंगे।शिक्षा निदेशालय ने माध्यमिक स्तर के हजारों विद्यालयों में नए सत्र की पढाई के साथ इस नई व्यवस्था को शुरू करने की तैयारी कर ली है।
राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत नई व्यवस्था के प्रस्तावों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। प्रस्तावों को केन्द्र सरकार की मंजूरी मिलने के बाद विद्यालयों में नई व्यवस्था से संबंघित सामग्री खरीदी जाएगी। इसमें विभिन्न विषयों से संबंघित सीडी शामिल हैं।
शुरूआत साढे चार हजार स्कूलों से
नई व्यवस्था की शुरूआत प्रदेश के उन साढे चार हजार माध्यमिक विद्यालयों से होगी, जिनमें कम्प्यूटर की सुविधा उपलब्ध है। प्रदेश में फिलहाल ढाई हजार सरकारी विद्यालय कम्प्यूटर शिक्षा से जुडे हुए हैं। आगामी दो-ढाई माह में आईसीटी प्रोजेक्ट के जरिए दो हजार विद्यालयों को कम्प्यूटर शिक्षा से और जोडा जाएगा।
अपने स्तर पर खरीदेंगे सामग्री
निदेशालय की ओर से संबंघित विद्यालयों को नई व्यवस्था में शामिल किए गए विषय की सूची उपलब्ध करवाई जाएगी। विद्यालय प्रबंधन को अपने स्तर पर कम्प्यूटर से पढाई की सामग्री खरीदनी होगी। इसमें पत्र-पत्रिकाओं के लिए उपलब्ध करवाए जाने वाला बजट काम में लिया जा सकेगा।
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साढे चार हजार सरकारी विद्यालयों में तीनों संकायों में पढाई की नई व्यवस्था लागू करने की तैयारियां शुरू कर दी है। नए सत्र से इसकी शुरूआत की उम्मीद है। इससे विद्यार्थी संबंघित विषय को रूचि लेकर समझ सकेंगे। साथ ही कम्प्यूटर का भी ज्ञान हो जाएगा।
-भास्कर ए सावंत, निदेशक, माध्यमिक शिक्षा, बीकानेर

Monday, June 14, 2010

लिंग्वा लैब सिखाएगी अंगे्रजी

शिक्षा संभाग मुख्यालयों पर होगी सुविधा
निदेशालय ने बनाया प्रस्ताव

चूरू।
नए शिक्षा सत्र में सरकारी विद्यालयों के बच्चे फर्राटेदार अंग्रेजी बोल सकेंगे। इसके लिए बच्चों को अलग से इंग्लिश स्पीकिंग का कोर्स करने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। यह सब लिंग्वा लैब से संभव होगा। शिक्षा निदेशालय ने शिक्षा संभाग मुख्यालय पर एक-एक लिंग्वा लैब खोलने की तैयारी शुरू कर दी है। राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के अन्तर्गत खुलने वाली लिंग्वा लैबों के प्रस्तावों को अंतिम रूप दे दिया गया है। तीस जून से पूर्व समस्त प्रस्ताव स्वीकृति के लिए केन्द्र सरकार को भिजवाए जाएंगे। सब कुछ ठीक रहा तो नए शिक्षा सत्र में सभी लिंग्वा लैब शुरू हो जाएंगी। प्रत्येक लैब में एक साथ कम से कम तीस विद्यार्थियों को प्रशिक्षण दिया जा सकेगा।
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राज्य में सात लैब
शिक्षा संभाग मुख्यालय चूरू, जयपुर, जोधपुर, भरतपुर, कोटा, उदयपुर व अजमेर पर स्थित माध्यमिक विद्यालय में लिंग्वा लैब खोली जाएंगी। प्रस्ताव को मंजूरी मिलते ही विद्यालय का चयन किया जाएगा। लैब में संबंधित विद्यालय समेत आस-पास के कई सरकारी विद्यालयों के बच्चे अंगे्रजी बोलने का प्रशिक्षण प्राप्त कर सकेंंगे।
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ऐसे सही होगा उच्चारण
लैब में जरूरत के हिसाब से विभिन्न विशेष मशीनें उपलब्ध करवाई जाएगी। जिनमें रिकॉर्डर की भी सुविधा होगी। विद्यार्थी मशीन के सामने बैठकर अंग्रेजी में बोले गए शब्दों व वाक्यों को हैडफोन के जरिए फिर से सुन सकेंगे। साथ ही मशीन अंग्रेजी में बात भी करेगी, जिससे विद्यार्थी अपना उच्चारण सुधार सकेंगे।
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इनका कहना...
शिक्षा में नवाचारों के तहत लिंग्वा लैब खोलने की योजना तैयार कर ली है। लैब के प्रस्ताव इसी माह केन्द्र सरकार को भेजे जाएंगे। नए शिक्षा सत्र से लैबों की शुरुआत की उम्मीद है। योजना सफल रही तो अन्य विद्यालयों में भी इसे लागू करने पर विचार करेंगे।

-भास्कर ए सावंत, निदेशक, माध्यमिक शिक्षा, बीकानेर

Sunday, June 6, 2010

वन्य जीवों को भाए धोरे

वन्यजीव गणना-2010 : आंकड़ा दस हजार के पार
विश्वनाथ सैनी @ चूरू। थळी की आबो-हवा वन प्राणियों को खासी रास आ रही है। यही कारण है कि धोरों में वन्यजीवों का कुनबा बढ़ गया है। जिले के वन क्षेत्र में वन प्राणियों का आंकड़ा दस हजार पार हो चुका है।
इस की वन्यजीव गणना में गत वर्ष की तुलना में 900 से अधिक नए वन्यजीव सामने आए हैं। जंगली बिल्ली के अलावा किसी भी वन प्राणी की संख्या में कमी नहीं आई है। सबसे अधिक इजाफा साण्डा की संख्या में हुआ है।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार जिले के कुल 71 सौ हैक्टेयर वन क्षेत्र में दस हजार 336 वन्यजीव विचरण कर रहे हैं। इनमें 934 वन्यजीव इस बार बढ़े हैं। इस साल 28 व 29 अप्रेल को जिले में वन्यजीवों को गिना गया था।
वन क्षेत्र में जलस्रोतों व वन्यजीवों के आने-जाने के मुख्य रास्तों पर वनकर्मियों ने चौबीसों घंटे नजर रख गणना की थी। वन्यजीव गणना की रिपोर्ट को विभाग ने हाल ही अंतिम रूप दिया है।
अभयारण्य में आधे से ज्यादा
जिले के कुल वन क्षेत्र के करीब दस फीसदी हिस्से में फैले विश्व प्रसिद्ध कृष्ण मृग तालछापर अभयारण्य में आधे से ज्यादा वन्य जीवों ने डेरा डाल रखा है। वन अधिकारियों की मानें तो अभयारण्य व उसके आस-पास के क्षेत्र में छह हजार 329 विचरण करते देखे गए हैं। अभ्यारण्य में इस बार कृष्ण मृगों की संख्या 1910 से बढ़कर 2025 हो गई है। कृष्ण मृगों की संख्या और भी बढ़ सकती थी, लेकिन गत वर्ष मई के अंतिम सप्ताह में बारिश व तेज तूफान के कारण छह दर्जन से अधिक कृष्ण मृग अकाल मौत का शिकार हो गए।
बढऩे के कारण
वन अधिकारी जिले में वन्यजीवों की संख्या बढऩे को अच्छा संकेत मान रहे हैं। अधिकारियों की मानें तो वन क्षेत्र में सघन पौधरोपण, जन जागरुकता एवं वनकर्मियों की सतर्कता से वनजीव खुद को पहले से अधिक सुरक्षित महसूस करने लगे हैं। इस बार ईको रिस्टोरेशन के तहत भी वन क्षेत्रों में वन्यजीवों के लिए विशेष कार्य करवाए जाने की कवायद की जा रही है।
आंकड़ों की जुबानी
वन्यजीव---------2009--------- बढ़े
काले हरिण-------1910---------115
मरु लोमड़ी-------116-----------०8
चिंकारा-----------2663---------42
नीलगाय---------976------------60
मरु बिल्ली------०4--------------15
गिद्ध-------------42-------------०6
चील/बाज----------71--------- 70
साण्डा---------3489---------620
जंगली बिल्ली131----------- ०2 (घटे)
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वन्यजीवों की संख्या बढऩा अच्छा संकेत है। विभाग भी यही प्रयास करता है कि वन्यजीवों को जिले में अनुकूल वातावरण मिले। इस बार ईको रिस्टोरेशन के तहत भी वन क्षेत्र में वन्यजीवों को पानी उपलब्ध करवाने समेत कई काम करवाए जाने प्रस्तावित हैं।
-केसी शर्मा, डीएफओ, चूरू

Wednesday, June 2, 2010

सशक्तीकरण खुद से शुरू

राजस्थान के चूरू में पैदा हुई मंजु राजपाल अभी भीलवाडा जिले की कलेक्टर हैं। अपने बेहतरीन काम के बलबूते बेस्ट कलेक्टर का अवार्ड पाने वाली मंजु से खास बातचीत।

क्या बचपन से ही आईएएस बनने का ख्वाब था
मैं पढाई में बचपन से होनहार थी। तभी प्रशासनिक सेवा में जाना तय कर लिया था। पोस्ट गे्रजुएट (अर्थशास्त्र) में गोल्ड मैडल हासिल किया। इसके बाद कभी किसी दूसरे क्षेत्र के बारे में सोचा तक नहीं। मैंने ठान लिया था कि प्रशासनिक सेवा में जाकर रहूंगी। पहली बार आरएएस बनी। फिर आईआरएस और उसके बाद छठी रैंक हासिल करके आईएएस बनने का ख्वाब पूरा हुआ।

सपनों को पूरा करने में परिवार की मदद।
परिवार का सपोर्ट नहीं मिलता तो शायद यहां नहीं होती। हमारे परिवार में लडके इतना नहीं पढ पाए, लेकिन हम लडकियों ने पढकर आगे बढना चाहा तो सबने हौसला बढाया। मैंने सिविल परीक्षा की तैयारी चूरू जैसे छोटे शहर में रहकर की। यह सब परिवार की सोच और सहयोग से ही मुमकिन हुआ।

प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाने के दौरान कोई मुश्किल क्षण।
डूंगरपुर में कलेक्टर रहते हुए (2006 में) मैंने जिन चुनौतियों सामना किया, वो आज भी स्मृतियों में है। पूरा इलाका बाढ के पानी से घिर गया था। चारों ओर हाहाकार मच गया। लोग डूब रहे थे। उन्हें बचाने वाला कोई नहीं था। उच्च अघिकारियों से हमारा संपर्क टूट चुका था। उस दौरान बाढ पीडितों को चिकित्सा और राशन सुविधा मुहैया करवाने के साथ-साथ उन्हें यकीन दिलाना जरूरी था कि प्रशासन उनके साथ है। हमने रातों-रात सारी व्यवस्था दुरूस्त की। पीडितों तक समय पर भोजन सामग्री पहुुंचाई और उन्हें सुरक्षित स्थानों पर भेजा।

फील्ड में ज्यादातर लोगों की क्या मांगें रहती हैं
लोगों की मांगें क्षेत्र विशेष निर्भर पर करती हैं। भीलवाडा में रोजगार की कोई कमी नहीं है, मगर यहां लोग पानी को लेकर सबसे अघिक परेशान रहते हैं। डूंगरपुर में सबसे बडी समस्या रोजगार की थी। सीकर में लोग शिक्षित हैं। वहां लोगों में प्रशासनिक सिस्टम को लेकर अच्छी समझ है। यही कारण है कि सीकर जिले में लोग कोई विशेष्ा मांग करने की बजाय सिस्टम में बदलाव चाहते हैं।

प्रशासनिक काम के बीच जनप्रतिनिघियों के बेवजह दखल के बारे में राय।
इस मामले में अब तक भाग्यशाली हूं। कहीं भी इस तरह की समस्या का सामना नहीं करना पडा। मेरा मानना है कि जनता की पहली पहुंच जनप्रतिनिघि हंै। जनता की समस्या प्रशासन के पास चाहे सीधी आए या जनप्रतिनिघि के माध्यम से, प्रशासन को इसे अपने काम में दखलअंदाजी नहीं मानना चाहिए। वैसे भी प्रशासन का लक्ष्य जनता की समस्याओं का समाधान करना है। इस बीच जनप्रतिनिघियों का सुझाव और मार्गदर्शन मिले तो बेहतर होगा।

जीवन की सबसे बडी खुशी।
करीब चार साल पहले डूंगरपुर में एक साथ दो से ढाई लाख लोगों को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के माध्यम से रोजगार दिलाया तो बडी खुशी हुई। दरअसल डूंगरपुर ट्राइबल एरिया है। वहां रोजगार काफी कम था। लोग पलायन करने को मजबूर थे, लेकिन अघिक पढे-लिखे नहीं होने के कारण दूसरों शहरों में भी अच्छा रोजगार नहीं मिल पा रहा था। मुझे खुशी इस बात की है कि डूंगरपुर में नरेगा की शुरूआत मेरे समय में हुई।

महिलाओं से क्या कहना चाहेंगी
महिलाओं को तय करना चाहिए कि जिन कठिन परिस्थितियों से उन्हें गुजरना पडा है, उस स्थिति से उनकी बेटी को न गुजरना पडे। इसका एकमात्र रास्ता शिक्षा है। शिक्षा से ही महिलाएं आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बन सकती हैं। वैसे भी सशक्तीकरण खुद से आता है। बाल विवाह और अशिक्षा महिलाओं के लिए सबसे बडी चुनौतियां हैं।

हिसाब-किताब

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