Thursday, June 17, 2010

एक शाम ग्रामीणों के नाम

पंचायतों में लगेगी चौपाल, अधिकारी सुनेंगे गांव की समस्या
चूरू. गांव की मुख्य समस्याओं के समाधान को लेकर ग्रामीणों को अब अधिकारियों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे, क्योंकि अधिकारी खुद ग्रामीणों के बीच एक शाम बिताकर समस्याओं का समाधान करेंगे। इसके लिए प्रशासन की ओर से ग्राम पंचायत मुख्यालय पर शाम को चौपाल लगाई जाएगी। गांव की अधिकांश समस्याओं का समाधान मौके पर ही होगा जबकि शेष समस्याओं को सरकार के पास भेजा जाएगा।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार जिले की कुल 249 ग्राम पंचायतों में से पांच-सात का एक समूह बनाया जाएगा। प्रत्येक समूह पर एक दिन शाम को चौपाल लगाकर अधिकारी ग्रामीणों से रू-ब-रू होंगे। चौपाल का नेतृत्व उपखण्ड अधिकारी, तहसीलदार व नायब तहसीलदार में से कोई एक करेगा। इनके अलावा चौपाल में बिजली, पानी, चिकित्सा, नरेगा व शिक्षा विभाग आदि के अधिकारी तथा सरपंच व ग्राम सेवक और पटवारी भी मौजूद रहेंगे।
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दिन में करेंगे समीक्षा
चौपाल से पूर्व दिन में विभिन्न विभागों के अधिकारी व कर्मचारी गांव में जाकर योजनाओं की समीक्षा करेंगे। शाम को चौपाल में ग्रामीणों के साथ समस्याओं के समाधान पर विस्तार से चर्चा करेंगे। नरेगा श्रमिकों को काम नहीं मिलने, भुगतान में देरी होने, पेयजल किल्लत, विद्यालय में स्टाफ लगाने जैसी समस्याओं का तत्काल समाधान किया जाएगा जबकि विद्यालय, स्वास्थ्य केन्द्र आदि की क्रमोन्नति के प्रस्ताव राज्य सरकार को भिजवाए जाएंगे।
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इनका कहना है...गांवों में चौपाल लगाने की तैयारियां शुरू कर दी हैं। दो ग्राम पंचायतों का कार्यक्रम भी तय कर लिया है। जिले की समस्त ग्राम पंचायतों में चौपाल लगाएंगे। इससे गांव की समस्याओं का समाधान आसानी से किया जा सकेगा।
-डा.केके पाठक, जिला कलक्टर, चूरू

Wednesday, June 16, 2010

गड़बड़ी के सारे सुराख बंद

राज्य में 15 अगस्त से लागू होगा ई-मस्टररोल
सबसे पहले चूरू ने किया था जारी
चूरू। महात्मा गांधी रोजगार गारण्टी योजना में मस्टररोल के जरिए होने वाली गड़बड़ी के सारे सुराख जल्द ही बंद हो जाएंगे। अब मस्टररोल में ना तो श्रमिकों के फर्जी नाम लिखे जा सकेंगे और ना ही हाजिरी में कांट-छांट की जा सकेगी। यह सब ई-मस्टररोल से संभव होगा। ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज विभाग आगामी 15 अगस्त से प्रदेशभर में ई-मस्टररोल व्यवस्था लागू करने जा रहा है।
राज्य में पहली बार ई-मस्टररोल गत वर्ष सितम्बर में चूरू जिला प्रशासन की ओर से अपने सुजानगढ़ ब्लॉक में जारी किया गया था। चूरू जिले में ई-मस्टररोल की सफलता के बाद विभाग ने इसे प्रदेश के अन्य जिलों में भी लागू करने का निर्णय किया है। विभाग ने ग्राम सेवक, ग्राम रोजगार सहायक, मेटों व अन्य संबंधित व्यक्तियों को ई-मस्टररोल व्यवस्था का प्रशिक्षण देने के लिए समस्त जिलों को मार्गदर्शिका भी भेजी है।
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अक्टूबर से होगा अनिवार्य
महानरेगा में 16 अगस्त से शुरू होने वाले पखवाड़़े से जिले की एक पंचायत समिति में ई-मस्टररोल जारी करना होगा। वहां पर पायलट के रूप में यह व्यवस्था 15 सितम्बर तक चलेगी। इस अवधि के अनुभव के आधार पर एक अक्टूबर से शुरू होने वाले पखवाड़े से सम्पूर्ण जिले में ई-मस्टररोल जारी होंगे।
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यूं कसी जाएगी लगाम
फिलहाल नरेगा में श्रमिकों की मांग के आधार पर पंचायत समिति कार्यालय से कार्य का नाम व अवधि अंकित कर मस्टररोल जारी किए जाते हैं। जिनमें मेट मस्टररोल में श्रमिकों के नाम दर्ज कर हाजिरी भरता है। मस्टररोल में श्रमिकों के फर्जी नाम व हाजिरी में गड़बड़ी कर नरेगा की राशि डकारने के मामले आए दिन सामने आते रहते हैं। ई-मस्टररोल भी साधारण मस्टररोल की तरह ही होगा, लेकिन इसे जारी करते समय श्रमिक का नाम, परिवार का बीपीएल नम्बर, मुखिया का नाम और काम की अवधि कम्प्यूटर से दर्ज की जाएगी।
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बैकलॉग भी नहीं रहेगा
ई-मस्टररोल जारी होने से मैनेजमेंट इंर्फोमेशन सिस्टम (एमआईएस) में मस्टररोल डाटा फीडिंग का बैकलॉग भी नहीं रहेगा। साधारण मस्टररोल से कम्प्यूटर में श्रमिकों के तमाम डाटा फीड करने में करीब डेढ़ माह तक बैकलॉग रहता है। जिससे नरेगा में बजट जारी होने में देरी होती है। ई-मस्टररोल में श्रमिकों की अधिकांश सूचनाएं पहले से ही दर्ज होने के कारण पखवाड़ा पूर्ण होने के दूसरे ही दिन एमआईएस में डाटा फीड किए जा सकेंगे।
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महानरेगा में ई-मस्टररोल लागू करने के संबंध में समस्त जिलों को दिशा-निर्देश दिए गए हैं। अगस्त व सितम्बर में इसे पायलट के रूप में लागू कर एक अक्टूबर से अनिवार्य किया जाएगा।इससे निश्चित रूप से मस्टररोल में की जाने वाले गड़बडिय़ां रोकी जा सकेगी।
-तन्मय कुमार, आयुक्त, महानरेगा

मस्टररोल के माध्यम से नरेगा में गड़बड़ी की बढ़ती शिकायतों को देखते हुए पिछले साल सितम्बर में चूरू ने सुजानगढ़ ब्लॉक में राज्य में पहला ई-मस्टररोल जारी किया था। बाद में इसका सॉफ्टवेयर जोधपुर को भी उपलब्ध करवाया गया। अब यह व्यवस्था प्रदेशभर में लागू होने जा रही है।
-डा.केके पाठक, जिला कलक्टर, चूरू

Tuesday, June 15, 2010

पढाई होगी रूचिकर

चूरू । कला संकाय में इतिहास हो या विज्ञान में शरीर की संरचना या फिर वाणिज्य में वर्षो पुरानी लेखा पद्धतियां। सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थी इन सबके बारे में किताबों में पढने के साथ कम्प्यूटर पर इनसे संबंघित फोटो, विजुअल, डायग्राम व ग्राफ आदि भी देख सकेंगे।शिक्षा निदेशालय ने माध्यमिक स्तर के हजारों विद्यालयों में नए सत्र की पढाई के साथ इस नई व्यवस्था को शुरू करने की तैयारी कर ली है।
राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत नई व्यवस्था के प्रस्तावों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। प्रस्तावों को केन्द्र सरकार की मंजूरी मिलने के बाद विद्यालयों में नई व्यवस्था से संबंघित सामग्री खरीदी जाएगी। इसमें विभिन्न विषयों से संबंघित सीडी शामिल हैं।
शुरूआत साढे चार हजार स्कूलों से
नई व्यवस्था की शुरूआत प्रदेश के उन साढे चार हजार माध्यमिक विद्यालयों से होगी, जिनमें कम्प्यूटर की सुविधा उपलब्ध है। प्रदेश में फिलहाल ढाई हजार सरकारी विद्यालय कम्प्यूटर शिक्षा से जुडे हुए हैं। आगामी दो-ढाई माह में आईसीटी प्रोजेक्ट के जरिए दो हजार विद्यालयों को कम्प्यूटर शिक्षा से और जोडा जाएगा।
अपने स्तर पर खरीदेंगे सामग्री
निदेशालय की ओर से संबंघित विद्यालयों को नई व्यवस्था में शामिल किए गए विषय की सूची उपलब्ध करवाई जाएगी। विद्यालय प्रबंधन को अपने स्तर पर कम्प्यूटर से पढाई की सामग्री खरीदनी होगी। इसमें पत्र-पत्रिकाओं के लिए उपलब्ध करवाए जाने वाला बजट काम में लिया जा सकेगा।
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साढे चार हजार सरकारी विद्यालयों में तीनों संकायों में पढाई की नई व्यवस्था लागू करने की तैयारियां शुरू कर दी है। नए सत्र से इसकी शुरूआत की उम्मीद है। इससे विद्यार्थी संबंघित विषय को रूचि लेकर समझ सकेंगे। साथ ही कम्प्यूटर का भी ज्ञान हो जाएगा।
-भास्कर ए सावंत, निदेशक, माध्यमिक शिक्षा, बीकानेर

Monday, June 14, 2010

लिंग्वा लैब सिखाएगी अंगे्रजी

शिक्षा संभाग मुख्यालयों पर होगी सुविधा
निदेशालय ने बनाया प्रस्ताव

चूरू।
नए शिक्षा सत्र में सरकारी विद्यालयों के बच्चे फर्राटेदार अंग्रेजी बोल सकेंगे। इसके लिए बच्चों को अलग से इंग्लिश स्पीकिंग का कोर्स करने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। यह सब लिंग्वा लैब से संभव होगा। शिक्षा निदेशालय ने शिक्षा संभाग मुख्यालय पर एक-एक लिंग्वा लैब खोलने की तैयारी शुरू कर दी है। राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के अन्तर्गत खुलने वाली लिंग्वा लैबों के प्रस्तावों को अंतिम रूप दे दिया गया है। तीस जून से पूर्व समस्त प्रस्ताव स्वीकृति के लिए केन्द्र सरकार को भिजवाए जाएंगे। सब कुछ ठीक रहा तो नए शिक्षा सत्र में सभी लिंग्वा लैब शुरू हो जाएंगी। प्रत्येक लैब में एक साथ कम से कम तीस विद्यार्थियों को प्रशिक्षण दिया जा सकेगा।
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राज्य में सात लैब
शिक्षा संभाग मुख्यालय चूरू, जयपुर, जोधपुर, भरतपुर, कोटा, उदयपुर व अजमेर पर स्थित माध्यमिक विद्यालय में लिंग्वा लैब खोली जाएंगी। प्रस्ताव को मंजूरी मिलते ही विद्यालय का चयन किया जाएगा। लैब में संबंधित विद्यालय समेत आस-पास के कई सरकारी विद्यालयों के बच्चे अंगे्रजी बोलने का प्रशिक्षण प्राप्त कर सकेंंगे।
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ऐसे सही होगा उच्चारण
लैब में जरूरत के हिसाब से विभिन्न विशेष मशीनें उपलब्ध करवाई जाएगी। जिनमें रिकॉर्डर की भी सुविधा होगी। विद्यार्थी मशीन के सामने बैठकर अंग्रेजी में बोले गए शब्दों व वाक्यों को हैडफोन के जरिए फिर से सुन सकेंगे। साथ ही मशीन अंग्रेजी में बात भी करेगी, जिससे विद्यार्थी अपना उच्चारण सुधार सकेंगे।
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इनका कहना...
शिक्षा में नवाचारों के तहत लिंग्वा लैब खोलने की योजना तैयार कर ली है। लैब के प्रस्ताव इसी माह केन्द्र सरकार को भेजे जाएंगे। नए शिक्षा सत्र से लैबों की शुरुआत की उम्मीद है। योजना सफल रही तो अन्य विद्यालयों में भी इसे लागू करने पर विचार करेंगे।

-भास्कर ए सावंत, निदेशक, माध्यमिक शिक्षा, बीकानेर

Sunday, June 6, 2010

वन्य जीवों को भाए धोरे

वन्यजीव गणना-2010 : आंकड़ा दस हजार के पार
विश्वनाथ सैनी @ चूरू। थळी की आबो-हवा वन प्राणियों को खासी रास आ रही है। यही कारण है कि धोरों में वन्यजीवों का कुनबा बढ़ गया है। जिले के वन क्षेत्र में वन प्राणियों का आंकड़ा दस हजार पार हो चुका है।
इस की वन्यजीव गणना में गत वर्ष की तुलना में 900 से अधिक नए वन्यजीव सामने आए हैं। जंगली बिल्ली के अलावा किसी भी वन प्राणी की संख्या में कमी नहीं आई है। सबसे अधिक इजाफा साण्डा की संख्या में हुआ है।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार जिले के कुल 71 सौ हैक्टेयर वन क्षेत्र में दस हजार 336 वन्यजीव विचरण कर रहे हैं। इनमें 934 वन्यजीव इस बार बढ़े हैं। इस साल 28 व 29 अप्रेल को जिले में वन्यजीवों को गिना गया था।
वन क्षेत्र में जलस्रोतों व वन्यजीवों के आने-जाने के मुख्य रास्तों पर वनकर्मियों ने चौबीसों घंटे नजर रख गणना की थी। वन्यजीव गणना की रिपोर्ट को विभाग ने हाल ही अंतिम रूप दिया है।
अभयारण्य में आधे से ज्यादा
जिले के कुल वन क्षेत्र के करीब दस फीसदी हिस्से में फैले विश्व प्रसिद्ध कृष्ण मृग तालछापर अभयारण्य में आधे से ज्यादा वन्य जीवों ने डेरा डाल रखा है। वन अधिकारियों की मानें तो अभयारण्य व उसके आस-पास के क्षेत्र में छह हजार 329 विचरण करते देखे गए हैं। अभ्यारण्य में इस बार कृष्ण मृगों की संख्या 1910 से बढ़कर 2025 हो गई है। कृष्ण मृगों की संख्या और भी बढ़ सकती थी, लेकिन गत वर्ष मई के अंतिम सप्ताह में बारिश व तेज तूफान के कारण छह दर्जन से अधिक कृष्ण मृग अकाल मौत का शिकार हो गए।
बढऩे के कारण
वन अधिकारी जिले में वन्यजीवों की संख्या बढऩे को अच्छा संकेत मान रहे हैं। अधिकारियों की मानें तो वन क्षेत्र में सघन पौधरोपण, जन जागरुकता एवं वनकर्मियों की सतर्कता से वनजीव खुद को पहले से अधिक सुरक्षित महसूस करने लगे हैं। इस बार ईको रिस्टोरेशन के तहत भी वन क्षेत्रों में वन्यजीवों के लिए विशेष कार्य करवाए जाने की कवायद की जा रही है।
आंकड़ों की जुबानी
वन्यजीव---------2009--------- बढ़े
काले हरिण-------1910---------115
मरु लोमड़ी-------116-----------०8
चिंकारा-----------2663---------42
नीलगाय---------976------------60
मरु बिल्ली------०4--------------15
गिद्ध-------------42-------------०6
चील/बाज----------71--------- 70
साण्डा---------3489---------620
जंगली बिल्ली131----------- ०2 (घटे)
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वन्यजीवों की संख्या बढऩा अच्छा संकेत है। विभाग भी यही प्रयास करता है कि वन्यजीवों को जिले में अनुकूल वातावरण मिले। इस बार ईको रिस्टोरेशन के तहत भी वन क्षेत्र में वन्यजीवों को पानी उपलब्ध करवाने समेत कई काम करवाए जाने प्रस्तावित हैं।
-केसी शर्मा, डीएफओ, चूरू

Wednesday, June 2, 2010

सशक्तीकरण खुद से शुरू

राजस्थान के चूरू में पैदा हुई मंजु राजपाल अभी भीलवाडा जिले की कलेक्टर हैं। अपने बेहतरीन काम के बलबूते बेस्ट कलेक्टर का अवार्ड पाने वाली मंजु से खास बातचीत।

क्या बचपन से ही आईएएस बनने का ख्वाब था
मैं पढाई में बचपन से होनहार थी। तभी प्रशासनिक सेवा में जाना तय कर लिया था। पोस्ट गे्रजुएट (अर्थशास्त्र) में गोल्ड मैडल हासिल किया। इसके बाद कभी किसी दूसरे क्षेत्र के बारे में सोचा तक नहीं। मैंने ठान लिया था कि प्रशासनिक सेवा में जाकर रहूंगी। पहली बार आरएएस बनी। फिर आईआरएस और उसके बाद छठी रैंक हासिल करके आईएएस बनने का ख्वाब पूरा हुआ।

सपनों को पूरा करने में परिवार की मदद।
परिवार का सपोर्ट नहीं मिलता तो शायद यहां नहीं होती। हमारे परिवार में लडके इतना नहीं पढ पाए, लेकिन हम लडकियों ने पढकर आगे बढना चाहा तो सबने हौसला बढाया। मैंने सिविल परीक्षा की तैयारी चूरू जैसे छोटे शहर में रहकर की। यह सब परिवार की सोच और सहयोग से ही मुमकिन हुआ।

प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाने के दौरान कोई मुश्किल क्षण।
डूंगरपुर में कलेक्टर रहते हुए (2006 में) मैंने जिन चुनौतियों सामना किया, वो आज भी स्मृतियों में है। पूरा इलाका बाढ के पानी से घिर गया था। चारों ओर हाहाकार मच गया। लोग डूब रहे थे। उन्हें बचाने वाला कोई नहीं था। उच्च अघिकारियों से हमारा संपर्क टूट चुका था। उस दौरान बाढ पीडितों को चिकित्सा और राशन सुविधा मुहैया करवाने के साथ-साथ उन्हें यकीन दिलाना जरूरी था कि प्रशासन उनके साथ है। हमने रातों-रात सारी व्यवस्था दुरूस्त की। पीडितों तक समय पर भोजन सामग्री पहुुंचाई और उन्हें सुरक्षित स्थानों पर भेजा।

फील्ड में ज्यादातर लोगों की क्या मांगें रहती हैं
लोगों की मांगें क्षेत्र विशेष निर्भर पर करती हैं। भीलवाडा में रोजगार की कोई कमी नहीं है, मगर यहां लोग पानी को लेकर सबसे अघिक परेशान रहते हैं। डूंगरपुर में सबसे बडी समस्या रोजगार की थी। सीकर में लोग शिक्षित हैं। वहां लोगों में प्रशासनिक सिस्टम को लेकर अच्छी समझ है। यही कारण है कि सीकर जिले में लोग कोई विशेष्ा मांग करने की बजाय सिस्टम में बदलाव चाहते हैं।

प्रशासनिक काम के बीच जनप्रतिनिघियों के बेवजह दखल के बारे में राय।
इस मामले में अब तक भाग्यशाली हूं। कहीं भी इस तरह की समस्या का सामना नहीं करना पडा। मेरा मानना है कि जनता की पहली पहुंच जनप्रतिनिघि हंै। जनता की समस्या प्रशासन के पास चाहे सीधी आए या जनप्रतिनिघि के माध्यम से, प्रशासन को इसे अपने काम में दखलअंदाजी नहीं मानना चाहिए। वैसे भी प्रशासन का लक्ष्य जनता की समस्याओं का समाधान करना है। इस बीच जनप्रतिनिघियों का सुझाव और मार्गदर्शन मिले तो बेहतर होगा।

जीवन की सबसे बडी खुशी।
करीब चार साल पहले डूंगरपुर में एक साथ दो से ढाई लाख लोगों को राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के माध्यम से रोजगार दिलाया तो बडी खुशी हुई। दरअसल डूंगरपुर ट्राइबल एरिया है। वहां रोजगार काफी कम था। लोग पलायन करने को मजबूर थे, लेकिन अघिक पढे-लिखे नहीं होने के कारण दूसरों शहरों में भी अच्छा रोजगार नहीं मिल पा रहा था। मुझे खुशी इस बात की है कि डूंगरपुर में नरेगा की शुरूआत मेरे समय में हुई।

महिलाओं से क्या कहना चाहेंगी
महिलाओं को तय करना चाहिए कि जिन कठिन परिस्थितियों से उन्हें गुजरना पडा है, उस स्थिति से उनकी बेटी को न गुजरना पडे। इसका एकमात्र रास्ता शिक्षा है। शिक्षा से ही महिलाएं आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बन सकती हैं। वैसे भी सशक्तीकरण खुद से आता है। बाल विवाह और अशिक्षा महिलाओं के लिए सबसे बडी चुनौतियां हैं।

Saturday, May 29, 2010

'गजलर' बुझाएंगे प्यास

पांच स्थानों का चयन, सालभर मिल सकेगा पानी
विश्वनाथ सैनी @ चूरू।
वन्यजीवों को भीषण गर्मी में प्यास बुझाने के लिए अब जंगल में ज्यादा नहीं भटकना पड़ेगा। वन विभाग ने वन्यजीवों के पानी के लिए होने वाले पलायन को रोकने तथा वन सम्पदा को संरक्षित और संवद्धित बनाने के लिए महती योजना बनाई है।
जयपुर के डेली न्यूज़ में छपी खबर

इसके तहत वन क्षेत्रों में पानी के ऐसे कुण्ड विकसित किए जाएंगे जहां बरसात का पानी एकत्र कर वन्य जीवों को सालभर पानी उपलब्ध कराया जा सकेगा। विशेष तौर पर बनने वाले कुण्डों को गजलर कहा जाएगा।
शुरुआती चरण में तालछापर कृष्णमृग अभयारण्य समेत वन क्षेत्र में पांच स्थानों का गजलर के लिए चयन किया गया है। योजना सफल रही तो इनकी संख्या बढ़ाई जाएगी। समस्त गजलर राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के माध्यम से विभाग की ईको रिस्टोरेशन योजना के तहत बनेंगे। विभाग ने गजलर के प्रस्ताव हाल ही मुख्यालय को भिजवाए

हैं।

चालू वित्तीय वर्ष में इनका निर्माण कार्य शुरू होने की उम्मीद है।
वन क्षेत्र में वन्यजीवों के लिए वर्तमान में बने जलस्रोतों की तुलना में गजलर में 35 से 40 हजार लीटर से अधिक पानी संग्रहित किया जा सकेगा। बारिश के पानी से एक बार गजलर भर जाने पर सालभर तक पानी की कमी नहीं रहेगी। बारिश नहीं हुई तो टैंकर के जरिए गजलर को भरा जा सकेगा।

बूंद-बूंद आ सकेगी काम
गजलर का डिजाइन इस तरह तैयार किया गया है, जिससे बारिश के पानी की बूंद-बूंद वन्यजीवों के काम आ सकेगी। बारिश का पानी सबसे पहले चालीस हजार लीटर क्षमता के एक कुण्ड में जमा होगा। कुण्ड ऊपर से बंद होगा, लेकिन उसके पास बनने वाले विशेष घाट में कुण्ड का पानी पहुंचेगा, घाट पर पानी की उपलब्धता कुण्ड में भरे पानी के दबाव के अनुपात में कम-ज्यादा होती रहेगी। इससे पानी की छीजत नहीं होगी।जहां वन्यजीव हलक तर कर सकेंगे।

चयन का रखा खास आधार
वन विभाग ने गजलर निर्माण के चयन का खास आधार रखा है। गजलर उन स्थानों पर बनाया जाएगा जहां वर्तमान में वन सम्पदा की स्थिति खराब है। पेड़-पौध, झाड़, खरपतवार, घास आदि विकसित नहीं हो पा रही है। साथ ही वहां पानी के अभाव में वन्यजीवों को विचरण नहीं हो पाता है। गजलर के निर्माण से वन्यजीव पानी पीने तो वहां पहुंचेंगे ही साथ ही पानी होने पर आस-पास के क्षेत्र में बीजारोपण के माध्यम से पौध, घास आदि विकसित कर क्षेत्र को हराभरा किया जा सकेगा।

कटाई व चराई पर प्रतिबंध
नए सिरे से विकसित किए गए क्षेत्र में पौधों व पेड़ों की कटाई व चराई पर प्रतिबन्ध रहेगा। इनक्षेत्रों को तारबंदी कर सुरक्षित किया जाएगा। ग्रामीण इलाकों से लगते क्षेत्र में पक्की दीवार का निर्माण कराया जाएगा।

चयनित वन क्षेत्र
-लीलकी बीड़
-सांखू बीड़
-तालछापर कृष्णमृग अभयारण्य
-तारानगर बीड़
-ढाणी लालसिंह पुरा बीड़

जिले में वन्यजीव
काले हरिण -2025
चिंकारा -2705
नीलगाय -1036
जंगली बिल्ली -129
मरु लोमड़ी -124
गिद्ध -48
चील/बाज -141
साण्डा -4109

इनका कहना है...
महानरेगा के माध्यम से ईको रिस्टोरेशन योजना के तहत गजलर निर्माण के प्रस्ताव मुख्यालय को भेजे हैं। प्रस्ताव को मंजूरी मिलते ही निर्माण कार्य शुरू करवा देंगे। जिले में गजलरों की शुरुआत पांच स्थानों से होगी।
-केसी शर्मा, डीएफओ, चूरू

Wednesday, May 26, 2010

पढ़बा सूं रैग्या टाबर

सर्वे में हुआ खुलासा, सर्वाधिक सरदारशहर में
नए शिक्षा सत्र से जोडऩे के होंगे खास प्रयास

विश्वनाथ सैनी @ चूरू
जिले में करीब सात हजार बच्चे शिक्षा से महरूम हैं। इनमें अधिकांश ने तो स्कूल की दहलीज पर कभी कदम ही नहीं रखा जबकि शेष ने बीच में पढ़ाई छोडऩे के बाद फिर कभी स्कूल की सुध नहीं ली। सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से हाल ही करवाए गए चाइल्ड ट्रेकिंग सर्वे में यह आंकड़ा सामने आया है।
सर्वे के दौरान बच्चे पढऩे-लिखने की उम्र में घरेलू कामों में जुटे अथवा गली-मोहल्लों में मटरगस्ती करते मिले। परिवार की माली हालत खराब होने के कारण कई बच्चे कहीं ना कहीं मजदूरी करते भी पाए गए। सर्वे में इन बच्चों को अनामांकित व ड्रापआउट के रूप में चिह्नित किया गया है। अब नए शिक्षा सत्र में इन बच्चों को शिक्षा की मुख्य धारा से जोडऩे के विशेष प्रयास किए जाएंगे।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार जिलेभर में कुल 6 हजार 956 बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। छह से चौदह साल तक के इन बच्चों में से अधिकांश कभी स्कूल नहीं गए। शेष ने स्कूल में कभी ना कभी दाखिला तो लिया लेकिन आठवीं कक्षा से पूर्व ही पढ़ाई छोड़ दी।
शिक्षकों ने विद्यालय रिकॉर्ड तथा घर-घर जाकर बच्चों का सर्वे किया है। पढ़ाई से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रखने वाले सबसे अधिक 1 हजार 795 बच्चे सरदारशहर ब्लॉक तथा सबसे कम 276 बच्चे सादुलपुर ब्लॉक में सामने आए हैं।

नए सत्र मे पढ़ाएंगे
सर्वे में चिह्नित किए गए बच्चों का जुलाई से शुरू हो रहे प्रवेशोत्सव के दौरान स्कूलों में दाखिला करवाने का प्रयास किया जाएगा। अभिभावकों को बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित भी करेंगे। इसके अलावा आवासीय ब्रिज कोर्स, गैर आवासीय ब्रिज कोर्स, शिक्षा मित्र केन्द्र, कस्तूरबा गांधी विद्यालय आदि में भी बच्चों के लिए पढऩे-लिखने की वैकल्पिक व्यवस्था की जाएगी।

कहां कितने वंचित
ब्लॉक बच्चे
तारानगर- 1025
सरदारशहर- 1795
राजगढ़- 276
चूरू- 670
रतनगढ़- 1680
सुजानगढ़- 1510
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16 से 21 मई तक हुए सर्वे के दौरान जिले में करीब सात हजार बच्चे अनामांकित व ड्रापआउट हैं। सर्वे की रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को भेज दी है। नए शिक्षा सत्र में इन बच्चों को पढ़ाया जाएगा।
-मोहन लाल त्रिवेदी, प्रभारी अधिकारी, वैकल्पिक शिक्षा (एसएसए) चूरू

Tuesday, May 25, 2010

तपिश से बुझेगी धोरों की प्यास

इस बार अच्छी बारिश के आसार
मानसून एक जुलाई तक आने की उम्मीद

कार्यालय संवाददाता @ चूरू. थळी में पड़ रही भीषण गर्मी भले ही लोगों के पसीने छुड़ा रही हो, लेकिन यह अच्छी बारिश का संकेत भी है। सब कुछ ठीक रहा तो इस बार थळी के धोरों की प्यास पूरी तरह बुझ सकेगी। थळी की भौगोलिक एवं पारस्थितिकी स्थितियां इस तरह की हैं कि यहां जितनी तेज गर्मी पड़ती है उतनी ही अधिक बारिश की संभावना बनती है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार इस बार गत वर्षों की तुलना में इन्द्रदेव अधिक मेहरबान होने के आसार बन रहे हैं।
चूरू में इस सत्र का सर्वाधिक तापमान 48 .4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया जा चुका है। इसके अलावा सर्दियों में इस बार गत वर्ष की तुलना में अधिक बर्फबारी हुई थी। फिलहाल अधिकतम तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है।
साथ ही आंधियों के चलने का क्रम भी जारी है। ऐसे में प्रदेश के पश्चिमी इलाके में निम्न दबाव का क्षेत्र बनता जा रहा है। जो पूर्व की ओर से आने वाले मानसून को तेजी से अपनी ओर खींचेगा। पूर्व से मानसून के दिल्ली व हरियाणा होते हुए 25 जून तक प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में दस्तक देने की उम्मीद है। शेखावाटी में मानसून के 1 जुलाई को पहुंचने का अनुमान है।
तो झूमके बरसेंगे बदरा
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार वर्तमान में जिले की परिस्थितियां अच्छी बारिश के अनुकूूल हैं। जब-जब भी ऐसे ही हालात बने हैं। तब-तब प्रदेशभर के खेतों में बदरा झूमकर बरसे हैं। इसके अलावा अगर जून में ज्यादा बारिश ना हो तो अच्छा है। क्योंकि इससे पश्चिमी इलाकों में निम्न दबाव का क्षेत्र बना रहे ताकि जून के अंतिम सप्ताह में पूरे वेग के साथ मानसून प्रदेश में पहुंच सके।
मिट्टी की करामात
थळी के धोरों की मिट्टी की करामात के कारण जिले को सर्दियों में कड़ाके की ठण्ड और गर्मियों में भीषण गर्मी की सौगात मिली है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार जिले की मिट्टी की स्पेसिफिक हीट कैपेसिटी काफी कम है। इस वजह से गर्मियों में मिट्टी जल्दी गर्म और सर्दियों में जल्दी ठण्डी हो जाती है।
बारिश का रास्ता
प्रदेश में बंगाल की खाड़ी से उठने वाला मानसून मेहरबान होता है। खाड़ी से चलकर मानसून हिमालय की वादियों में पहुंचता है। यहां से बर्मा की पहाडिय़ों से टकराने के बाद पूर्व से पश्चिम की ओर रुख करता है। पश्चिम की ओर पहुंचते-पहुंचते मानसून कमजोर पड़ता जाता है। पश्चिमी इलाकों में जितना अधिक निम्न दबाव का क्षेत्र बनेगा। मानसून भी उतनी तेजी के साथ दस्तक देगा।
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इस बार मानसून पूरी तरह मेहरबान होने की संभावना है क्योंकि लगातार आंधियां चल रही है और सर्दियों में बर्फबारी भी ज्यादा हुई है। साथ ही तापमान भी बढ़ रहा है। कुल मिलाकर परिस्थितियां मानसून को बुलाने के अनुकूल है।
- जिलेसिंह राव, प्रभारी अधिकारी, मौसम केन्द्र, चूरू

Wednesday, May 12, 2010

दवा खरीद में नियम हवा

चूरू सहकारी उपभोक्ता होलसेल भण्डार की दवा की दुकानों पर दवाइयो की आड में भ्रष्टाचार की बेल पनप रही है। जिला प्रशासन की ओर से गठित एक विशेष कमेटी की जांच में यह खुलासा हुआ है। जिले में होलसेल भण्डार की 11 दुकानों के लिए प्रतिवर्ष करोडों रूपए की दवाइयां बिना किसी निविदा प्रक्रिया अपनाएं खरीदी जा रही हैं।
वित्तीय वर्ष 2009-10 में दो करोड 13 लाख 73 हजार रूपए की दवाइयां बिना निविदा के खरीदी गई हैं। इनमें साठ से सत्तर फीसदी दवाइयां ब्रांडेड हैं, जो जेनरिक दवा के मुकाबले दो-तीन गुना अघिक महंगी होती हैं। जबकि होलसेल भण्डार की दुकानों पर अघिक से अघिक जेनरिक दवाइयां ही होनी चाहिए, ताकि रोगियों को सस्ती दर पर दवाइयां उपलब्ध हो सके।
यूं हुआ खुलासा
दस दिन पूर्व जिला कलक्टर डा. केके पाठक ने राजकीय भरतीया अस्पताल स्थित उपभोक्ता होलसेल भण्डार के तीन नम्बर मेडिकल स्टोर का औचक निरीक्षण किया तो वहां जेनरिक के स्थान पर ब्रांडेड दवाइयां बिकती मिली। इस पर पाठक ने उपखण्ड अघिकारी उम्मेद सिंह, माध्यमिक शिक्षा उपनिदेशक कार्यालय के एएओ देवीदत्त पारीक, राजकीय भरतीया अस्पताल के कनिष्ठ लेखाकार रतनलाल सैनी, डा. बीएल नायक तथा कोषाघिकारी अंजू गोयल की एक कमेटी गठित कर मामले की जांच करवाई। फिलहाल कमेटी वर्ष 2009-10 में खरीदी गई दवाओं के नाम, दर, मात्रा समेत अन्य बिन्दुओं की जांच कर रही है।
प्रदेश भर में गडबडझाला
निरीक्षण के बाद होलसेल भण्डार ने कारण बताओ नोटिस के जवाब में माना कि दवा की खरीद में गडबडझाला चूरू ही नहीं बल्कि प्रदेश भर में हो रहा है। दवा खरीदने में कहीं पर भी निविदाएं आमंत्रित नहीं की जाती। प्रदेश में होलसेल भण्डार की दवा की करीब 520 दुकानें हैं। गत वित्तीय वर्ष के दौरान पडोसी जिले सीकर में एक करोड 75 लाख तथा झुंझुनूं में 2 करोड 4 लाख 82 हजार रूपए की दवाइयां इसी तरह से खरीदी गई हैं।
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चिकित्सक ब्रांड बदल-बदल कर दवाइयां लिखते हैं। इसलिए निविदा प्रक्रिया संभव नहीं है। जेनरिक दवाइयों की मांग काफी कम है। प्रशासन के निर्देश पर अब निविदा प्रक्रिया शुरू करने तथा जेनरिक दवाओं की मात्रा बढाने की तैयारी कर रहे हैं।
-रामावतार स्वामी,
अघिशासी अघिकारी (कार्यवाहक),
सहकारी उपभोक्त होलसेल भण्डार, चूरू
भण्डार की दुकानों पर बडे पैमाने पर अनियमितताएं हैं। यह सब मिलीभगत से हो रहा है। प्रारम्भिक जांच में गत वित्तीय वर्ष के दौरान दो करोड से अघिक की दवा बिना निविदा के खरीदने की जानकारी मिली है। कमेटी से मामले की विस्तृत जांच करवा रहे हैं। दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेंगे। -डा. केके पाठक, जिला कलक्टर, चूरू

लीबिया में कामगारों पर संकट

मजदूरों को ना तो पगार मिली है और ना ही राशन
चूरू, 11 मई।
खाड़ी देश लीबिया में कमाने गए भारतीय मजदूर संकट में हैं। एक निजी कम्पनी ने मजदूरों को बंधक बना रखा है। पांच माह से मजदूरों को ना तो पगार मिली है और ना ही राशन। मजदूर समुद्र का खारा पीने तथा राहगीरों से भीख मांगने को मजबूर हैं।
देशभर के करीब सौ मजदूरों को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा रहा है। इनमें चूरू जिले के सोलह मजदूर शामिल हैं। मजदूरों ने सोमवार को अपने परिजनों को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत करवाया है। परिजनों ने मंगलवार को जिला कलक्टर डा. केके पाठक से मुलाकात कर मजदूरों की रिहाई की गुहार लगाई है।
परिजनों की ओर से कलक्टर को सौंपे गए ज्ञापन में लिखा है कि लीबिया में अल एकलेल कॉन्ट्रेक्ट कम्पनी ने मजदूरों का भुगतान रोककर उन्हें चार दीवारी में बंद कर रखा है। मजदूर सीकर जिले की फतेहपुर तहसील के गांव अठवास निवासी एजेंट सांवरमल झाझडिय़ा के माध्यम से नौ माह पहले लीबिया गए थे।
प्रोजेक्ट पूरा हो गया
जानकारी के अनुसार कम्पनी विला निर्माण के एक प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी। करीब दो माह पहले प्रोजेक्ट पूरा हो गया। नया प्रोजेक्ट शुरू नहीं हो पाने के कारण मजदूरों को ना तो रोजगार मिल पा रहा है और ना ही बकाया पगार।
आधे से ज्यादा शेखावाटी के
मजदूरों को लीबिया भेजने वाले एजेंट झाझडिय़ा की मानें तो अल एकलेल कॉन्ट्रेक्ट कम्पनी में ऐसी स्थिति का सामना चूरू जिले के सोलह मजदूर ही नहीं बल्कि देशभर के करीब सौ मजदूरों को करना पड़ रहा है। इनमें से पचास-साठ मजदूर अकेले शेखावाटी के हैं। विला निर्माण का प्रोजेक्ट पूरा होने तथा नया प्रोजेक्ट शुरू होने में हो रही देरी के कारण मजदूर परेशान हैं। मजदूर बकाया मजदूरी की मांग को लेकर कम्पनी का राशन लेने से भी इनकार कर रहे हैं।
ये हैं वो मजदूर
सोलह मजदूरों में चूरू तहसील के गांव जुहारपुरा का भींवाराम, भागीरथ मल, धीरासर का राजूराम, रायपुरिया का प्रभूदयाल, तारानगर तहसील के गांव सोमसीसर का मेधाराम, रतनगढ़ तहसील के गांव गोगासर का पूर्णमल, सेहला का बजरंग, चैनपुरा का भजनलाल, नरेश कुमार, रघुनाथपुरा का बृजलाल, खिलेरिया का आसूदास, लोहा का तोलाराम, लधासर का मेंधाराम, नागरमल, सुजानगढ़ तहसील का गणेशाराम यादव, गांव भींवसर का बेगाराम शामिल है।
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लीबिया गए सोलह मजदूरों के परिजनों ने उन्हें रिहा कराने की मांग की है। इस संबंध में प्रमुख सचिव को लिखा गया है। साथ ही पुलिस को मामले की जांच के निर्देश दिए हैं। -डा. केके पाठक, जिला कलक्टर, चूरू

Friday, May 7, 2010

मां तुझमें रब दिखता है...

मां...बस तुम्हारा नाम लेने भर से रूह को सुकून मिल जाता है...तुम्हें दूर से भी देख लूं तो फिर दुनिया में कुछ देखने की हसरत नहीं रहती...तेरी परछाई में भी मैं अपना वजूद ढूंढ लेता हूं...तेरी धुंधली तस्वीर में भी मुझे अपना अक्श साफ नजर आता है...तेरे आंचल की ओट मिल जाए तो जेठ की तपती दुपहरी हो या पौष की सर्द रात बिना उफ किए गुजार दूं...तू रख दे अगर हाथ सिर पर तो फिर जमाने से मुझे कुछ नहीं चाहिए...मैं तो तेरा स्पर्श पाकर ही निहाल हो उठता हूं।

सच में मां तुम ऐसी थीं...ऐसी हों और खुदा के वास्ते ऐसी ही रहना...। बचपन से मुझे लगता आया है कि भले ही तुम्हारे चेहरे पर झुर्रियां 
पड़ जाए...बाल झक सफेद हों जाए...पर तुम्हारा प्यार कभी कम नहीं होगा। मां में कई बार सोचता हूं कि जब मैंने बचपन में तुतलाती जुबान से पहली बार तुम्हें 'मां' कहकर पुकारा तो तू शायद हँसी होगी या फिर मेरी नकल की होगी...यह तो तू ही जानें...पर मैं दावे से कह सकता हूं कि तेरी हँसी में भी सुखद अहसास था...तेरी नकल ने मुझे कुछ और शब्द सीखने को प्रेरित किया होगा।

जब मैंने चलने के लिए पहली बार जमीन पर कदम बढ़ाया तो मेरे नन्हें हाथों ने तेरी अंगुली जरूर थामी होगी...मुझे पल भर के लिए भी गिरने नहीं दिया होगा...या कभी लडख़ड़ाकर गिर भी गया तो तुमने आंसू नहीं आने दिए होंगे...। तुम्हारे हाथों का स्पर्श ही मेरी चोट पर मरहम का काम कर गया होगा...।

मां मैं तुम्हारे लिए तो वहीं नन्हा बच्चा हूं...और रहूंगा, पर दुनिया की नजर में मैं 23 होली, दिवाली और बसंत देख चुका हूं...मुझसे लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं...पढऩे वाला हर बंदा सोच रहा होगा कि आज एकाएक मुझे तुम्हारी याद कैसे आ गई...तेरे नाम पर मेरी कलम क्यों चल पड़ी...।

बता दूं कि मां मैं तुझे शब्दों में ढालना चाहता हूं...तेरी यादों को फिर से दिल के करीब लाने की चाहत है मेरी...मुझे तेरा प्यार भरा स्पर्श आज भी याद है...तेरे हाथ की रोटी का कसेला स्वाद तो मैं कैसे भूल जाऊं...तेरी डांट-फटकार में भी प्यार छिपा होता था...जिसे भूल जाना मेरे बस की बात नहीं...।

मेरे बचपन में ही पिताजी के गुजरने का गम तो मुझे ताउम्र सालता रहेगा पर तुमने कभी उनकी कमी महसूस नहीं होने दी...मां होते हुए तुमने मुझे पिता का भी प्यार दिया...। आज मैं जहां भी हूं...जिस हाल में भी हूं...सब का श्रेय लेने का हक है...तुम्हें। सच कहूं तो मां तुझमें रब दिखता है...।

Saturday, May 1, 2010

18 सौ अंकतालिका रद्दी की टोकरी में

डाइट स्टाफ की भूल, संस्था प्रधानों की लापरवाही
सैकड़ों परीक्षार्थियों का परिणाम प्रभावित
चूरू, 30 अप्रेल। आठवीं बोर्ड परीक्षा को गंभीरता से नहीं लेने की वजह से इस बार अठारह सौ परीक्षार्थियों की अंकतालिकाएं रद्दी की टोकरी में डाल दी गई हैं। यह सब डाइट कर्मचारियों की मानवीय भूल व संस्था प्रधानों की लापरवाही के चलते हुआ है।
हैरत की बात है कि जहां डाइट परीक्षार्थियों की मूल अंकतालिका में बोनस अंक दर्ज करना ही भूल गया तो संस्था प्रधान सत्रांक तक सही नहीं भेज पाए। हालांकि डाइट ने अब त्रुटियां सुधारकर प्रभावित परीक्षार्थियों को नई अंकतालिकाएं जारी कर दी हैं।
इससे कई परीक्षार्थी फेल से पास तो कई फेल पूरक की श्रेणी में आ गए हैं। जिलेभर के कुल 1 हजार 798 परीक्षार्थियों का परिणाम प्रभावित हुआ है। अंकतालिकाओं की त्रुटियां सुधरवाने से परीक्षार्थियों को नुकसान की बजाय फायदा ही हुआ है, लेकिन परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद परीक्षार्थियों और उनके अभिभावकों को मानसिक रूप से तो परेशान होना ही पड़ा है। इसकी कोईजवाबदेही तय नहीं की गई है।
गौरतलब है कि बोर्ड परीक्षा परिणामों के तनाव के कारण विद्यार्थियों में बढ़ती आत्महत्या करने की प्रवृति पर प्रभावी अंकुश के मद्देनजर केन्द्र और राज्य सरकार बोर्ड परीक्षा प्रक्रिया ही बदलने जा रही है।
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परीक्षार्थी ऐसे हुए प्रभावित
डाइट ने किसी विषय में सत्रांक समेत कुल 35 अंक हासिल करने वाले परीक्षार्थियों को बोनस के रूप में एक अंक दिया था, जो तकनीकी खामी की वजह से अंकतालिका में दर्ज नहीं किया जा सका। इससे 778 परीक्षार्थियों का मूल परीक्षा परिणाम तो 718 का पूरक परीक्षा परिणाम प्रभावित हुआ है। शेष की अंकतालिका में मामूली अंतर आया है।
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मांगे साठ भेज दिए बीस
आठवीं कक्षा के अधिकांश विषयों के सत्रांक बीस में से भेजे जाते हैं जबकि कार्यानुभव, कला शिक्षा व स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा विषय के सत्रांक 6 0 में से भेजने होते हैं। सुजानगढ़ तहसील के गांव धात्री के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय ने अपने समस्त 25 परीक्षार्थियों के तीनों विषयों के सत्रांक 6 0 की बजाय 20 में से भेज दिए। डाइट ने विद्यालय प्रबंधन को गलती की जानकारी दी तो अब फिर से सत्रांक भेजे गए हैं। ऐसे में सभी विद्यार्थियों को नई अंकतालिका जारी करनी पड़ी है।
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1998 में भी हुआ ऐसा
डाइट सूत्रों के अनुसार 1998 में जन्मतिथि गलत दर्ज हो जाने के कारण एक हजार से अधिक अंकतालिकाएं बेकार हो गई थीं। इसके बाद इतनी बड़ी संख्या में अंकतालिकाएं कभी खराब नहीं हुई। विद्यालयों की गलती की वजह से दर्जनों अंकतालिकाएं प्रतिवर्ष रद्दी की टोकरी में फेंकनी पड़ती हैं। इस बार डाइट से भी भूल होने के कारण खराब अंकतालिकाओं का आंकड़ा हजार को पार कर गया।
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इनका कहना है....
करीब 18 सौ अंकतालिकाओं में त्रुटियां रह गई हैं। इससे परीक्षार्थियों को किसी प्रकार का नुकसान नहीं होने दिया गया है। त्रुटियां ठीक करवाकर नई अंकतालिकाएं जारी कर दी हैं।
-महावीर सिंह सिंघल, प्राचार्य, डाइट, चूरू