Saturday, February 26, 2011
पानी में डूबे दस करोड़
चूरू। धोरों में मीठा पानी मुहैया करवाने वाली आपणी योजना के दस करोड़ से अधिक रुपए पानी में डूब गए हैं। अभियंता छह साल से प्रयासरत हैं, परन्तु एक भी रुपया वापस नहीं निकल पा रहा है। यह सब चूरू व झुंझुनूं जिले के 99 गांवों के अपने वादे से मुकरने के कारण हुआ है। गांवों में दफन 120 किलोमीटर लम्बी पाइप लाइन, बूंद-बूंद पानी को तरसतीं पेयजल टंकियां और धूल फांकते पेयजल उपकरण इसके गवाह हैं। सूचना का अधिकार के तहत जानकारी मांगने पर आपणी योजना और ग्रामीणों की यह हकीकत सामने आई है।
योजना के तहत 2000-2005 के दौरान शेखावाटी की चूरू, झुंझुनूं व अलसीसर पंचायत समिति के 71 गांवों को मीठा पानी उपलब्ध करवाने के लिए 8.72 करोड़ रुपए खर्च कर 120 किलोमीटर लम्बी पाइप लाइन डालने के साथ ही गांव गाजसर व जुहारपुरा में पांच-पांच सौ किलोमीटर क्षमता की पेयजल टंकियों का निर्माण किया गया। इनमें सरदारशहर पंचायत समिति के 28 गांवों के लिए खर्च की गई राशि शामिल की जाए तो आंकड़ा दस करोड़ रुपए से ऊपर जाता है। योजना का कार्य पूर्ण होने के बाद सभी 99 गांवों ने मीठा पानी लेने से साफ इनकार कर दिया है। ऐसे में पाइप लाइन और पेयजल टंकियां कोई काम नहीं आ रही हैं।
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इसलिए मुकरे वादे से
आधिकारिक जानकारी के अनुसार योजना की शुरुआत में ग्रामीणों ने मीठा पानी लेने की सहमति जताई थी, लेकिन बाद में अपने वादे से मुकर गए। इस पर ग्रामीणों के अपने तर्क हैं। ग्रामीणों को घर-घर पेयजल कनेक्शन चाहिए जबकि योजना में सामुदायिक नल की व्यवस्था है। योजना के पानी की नियमित आपूर्ति और गुणवत्ता पर ग्रामीणों भी को संदेह है। आपणी योजना से जुडऩे के बाद गांव में पीएचईडी के जलस्रोतों से जलापूर्ति बंद हो जाती है। ऐसे में ग्रामीण अपने पुराने जलस्रोत नहीं खोना चाहते। पीएचईडी की ओर से कई गांवों में खारा पानी मुफ्त में पिलाया जाता है। जबकि आपणी योजना के पानी की कीमत प्रति व्यक्ति प्रति माह पांच रुपए है। हालांकि पैसों के लालच में लोग खारा पानी पीकर खुद अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। ग्रामीणों ने घर-घर में बरसाती कुण्ड बना रखे हैं, जिनसे गर्मियों में भी पानी की कमी नहीं अखरती।
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थमाए नोटिस दर नोटिस
आपणी योजना से जोड़े जाने के बावजूद पानी नहीं लेने पर अधिकारियों ने संबंधित ग्राम पंचायत व गांव की जल एवं स्वास्थ्य समिति के अध्यक्ष को गत छह वर्ष के दौरान अनेक नोटिस जारी किए हैं। 26 अगस्त 2010 को जारी नोटिस में तो यहां तक लिखा गया कि अगर गांव वाले मीठा लेने को तैयार नहीं हुए तो पीएचईडी की ओर से खारा भी बंद करवा दिया जाएगा, परन्तु नोटिसों का जवाब नहीं आया और ना ही पीएचईडी से जलापूर्ति बंद करवाई गई।
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क्या है योजना
जर्मन सरकार की उच्च तकनीक व आर्थिक सहयोग से करीब पांच अरब रुपए की आपणी योजना चूरू, झुंझुनंू व हनुमानगढ़ जिले में एक दशक से संचालित है। वर्तमान में योजना के तहत तीनों जिले में 508 गांव के लोग मीठा पानी पी रहे हैं।
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इन्होंने किया मना
सरदारशहर व चूरू पंचायत समिति में गांव आ्सलू, ढाढऱ, लाखाऊ, झारिया, दूधवाखारा, बूंटियां, गाजसर, घंटेल, कड़वासर, सहजूसर, मेघसर, देपालसर, खासोली, ऊंटवालिया, हणुतपुरा, थैलासर, मेहरावनसर, सोमासी, छाजूसर, जुहारपुरा, मोलीसर बड़ा, रायपुरिया, सहनाली बड़ी, सहनाली छोटी, सातड़ा, सूरतपुरा, ढाढ़रिया चारणान, धोधलिया, नाकरासर, धीरासर बीकान, चारणान, शेखावतान, जासासर, जसरासर, बालरासर तंवरान, दांदू, घांघू, राणासर, हरियासर घड़सोतान, चारणवासी, ढाणी सुवाना, मेहरासर चाचेरा, सवाई बड़ी, बलवानिया, दूलरासर, मांगासर, गोमटिया, रामसीसर भेड़वालिया, चन्नाई, छजलानिया, भीकमसरा, पनपालिया, मेलूसर, अड़मालसर, राणासर बिकान, भैंरूसर, खींवासर, पूलासर, बरलाजसर, मेहरी रिजवान, पुरोहितान, कामासर, जीवणदेसर, आसासर, अजीतसर व उदासर बीदावतान तथा झुंझुनूं व पंचायत समिति अलसीसर के गांव हनुतपुरा, बाजला, बीदासर, भीखनसर, बिसनपुरा, चंदवा, चूडेला, डाबड़ी, धीरासर, डिलाई, दूलचास, हंसासरी, हमीरवास रिजानी, हनुमानपुरा, कंकडेउ खुर्द, कालियासर, कांट, खिदरसर, लादूसर, नांद, पाडासी, पाटोदा, श्री किशनपुरा, टांई, ढाणी चारण, हंसासर, कमलासर, कोलिण्डा, लूट्टू, मेहनसर, सोनासर, धनूरी व श्यामपुरा आपणी योजना का पानी लेने को तैयार नहीं है।
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इनका कहना है...
चूरू-झुंझुनूं जिले के 99 गांव मीठा पानी पीने को तैयार नहीं हैं, जबकि आपणी योजना के तहत करोड़ों रुपए खर्च कर गांवों तक पाइप लाइन डाली हुई है। वर्षों पूर्व हुए सर्वे के दौरान ग्रामीणों ने मीठा पानी लेने की सहमति जताई थी लेकिन बाद में मना कर दिया। मामला राज्य सरकार के ध्यान में है। सरपंच व ग्राम जल एवं स्वास्थ्य समितियों को इस संबंध में नोटिस में दिए गए, परन्तु किसी ने कोई जवाब नहीं दिया।
-एसके शर्मा, अधीक्षण अभियंता, आपणी योजना चूरू
Wednesday, February 23, 2011
"हक" पर कब्जा,"सम्मान" पर चुप्पी
चूरू । "वतन पर मरने वालों का बाकी यही निशां होगा" कि शहीद वीरांगनाएं अपने हक और पति के सम्मान के खातिर कार्यालय दर कार्यालय चक्कर काटेंगी। बात भले ही गले नहीं उतर रही हो, परन्तु रतनगढ़ के गांव भुखरेड़ी निवासी दो शहीद वीरांगनाओं को प्रशासन ने ऎसा करने पर मजबूर कर रखा है। एक शहीद वीरांगना को भूखण्ड आवंटन के बावजूद उस पर कब्जा नहीं मिल पाया जबकि दूसरी को शहीद स्मारक बनवाने के लिए जमीन आवंटित करने में अधिकारी रूचि नहीं ले रहे हैं।आधिकारिक जानकारी के अनुसार 1986 में ऑपरेशन मेघदूत में शहीद हुए भुखरेड़ी निवासी सिपाही तोलाराम की वीरांगना सुप्यार देवी को 25 अगस्त 2008 को चूरू की सैनिक बस्ती के सेक्टर1-बी-189 में 10.5 गुणा 21 मीटर भूखण्ड आवंटित किया गया। सुप्यार देवी को भूखण्ड का पट्टा भी दिया गया, परन्तु भूखण्ड पर उसे आज तक कब्जा नहीं मिल पाया। प्रशासन की मिलीभगत से भूखण्ड पर अन्य व्यक्ति ने कब्जा कर रखा है। ऎसे में सुप्यार देवी भूखण्ड आवंटन के ढाई वर्ष बाद भी अपने हक से वंचित है। उधर, जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में मच्छाल सेक्टर में 30 जून 2010 को शहीद हुए भुखरेड़ी के मुकेश भास्कर की वीरांगना सुमन उनके सम्मान में शहीद स्मारक बनवाना चाहती है। स्मारक के नाम पर गांव में भूमि आवंटित करने के लिए सुमन ने ग्राम पंचायत, तहसीलदार व कलक्टर कार्यालय में अनेक चक्कर काट चुकी है। बार-बार चक्कर कटवाने से दुखी होकर सुमन ने 21 फरवरी को जिला कलक्टर को ज्ञापन देकर शहीद मुकेश का इस तरह अपमान नहीं करने की गुहार लगाई है।प्रशासन ने केवल पट्टा थमायाप्रशासन ने सैनिक बस्ती में भूखण्ड आवंटित करने में महज कागजी खानापूर्ति की है। पट्टा मिलने पर मैंने नम्बरों के आधार पर भूखण्ड पर ढूंढ़ा तो उस पर किसी अन्य का अवैध कब्जा मिला। अवैध रूप से किया गया कब्जा हटवाकर मुझे अपने भूखण्ड पर कब्जा दिलवाने के लिए मैंने प्रशासन के सामने अनेक बार गुहार लगाई, मगर अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला।-सुप्यार देवी, शहीद तोलाराम की वीरांगनाअधिकारियों ने दबाई फाइलपति के सम्मान में शहीद स्मारक बनवाना चाहती हूं। स्मारक के नाम पर भूमि आवंटित करने की फाइल पहले रतनगढ़ तहसीलदार ने पांच माह तक दबाए रखी और अब तीन माह से फाइल जिला कलक्टर के पास अटकी पड़ी है। गांव में गोचर भूमि पर स्मारक बनाया जा सकता है। जनप्रतिनिधि स्मारक निर्माण के लिए आर्थिक सहयोग देने के लिए तैयार हैं। इसके बावजूद प्रशासन मामले को गंभीरता से नहीं ले रहा है। -सुमन देवी, शहीद मुकेश की वीरांगनाप्रशासन को बताया दोनों ही शहीद वीरांगनाओं के साथ ठीक नहीं हो रहा है। वीरांगना सुप्यार ने भूखण्ड पर कब्जा नहीं मिलने की शिकायत थी, जिससे प्रशासन को अवगत करवा दिया गया। शहीद स्मारक का मामला भी कलक्टर की जानकारी में लाया हुआ है।-रामकुमार कस्वां, जिला सैनिक कल्याण अधिकारी, चूरूदूंगा आर्थिक सहयोगशहीद मुकेश की अत्येष्टि के समय ही मैंने उनके स्मारक के लिए आर्थिक सहयोग देने का वादा किया था और अब भी तैयार हंू। प्रशासन जमीन तो आवंटन करें, राशि की कोई कमी नहीं दी जाएगी।-रामसिंह कस्वां, सांसद, चूरूमुझे जानकारी नहींशहीद वीरांगनाओं की समस्याएं प्राथमिकता से दूरी की जाती हैं। सैनिक बस्ती में शहीद वीरांगना को भूखण्ड आवंटन और गांव भुखरेड़ी में शहीद स्मारक बनवाए जाने का मामला मेरी जानकारी में नहीं है। यदि आप जैसा बता रहे हो, वैसा हो रहा है तो तत्काल दोनों मामलों की जांच करवाएंगे।-विकास एस भाले, कलक्टर, चूूरू विश्वनाथ सैनी
Sunday, January 30, 2011
हर दूसरा शिक्षक लापरवाह
शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान के कार्यक्रमों के प्रति बेरुखी
चूरू। शिक्षक संघों के सम्मेलन, आंदोलन व धरना-प्रदर्शन हो तो शिक्षकों की फौज खड़ी नजर आती है, परन्तु शिक्षा में नवाचार, आधुनिक तकनीक और अध्यापन में दक्षता बढ़ाने की बात आए तो शिक्षक पीठ दिखाने से नहीं चूकते। राजस्थान राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान उदयपुर की ओर से जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डाइट) में चलाए जा रहे कार्यक्रमों से इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।
पिछले ढाई साल में चूरू जिले के पचास फीसदी शिक्षक इन कार्यक्रमों को गंभीरता से नहीं लिया है। कार्यक्रमों के प्रति केवल शिक्षक ही नहीं बल्कि शिक्षा अधिकारी और खुद डाइट प्रबंधन भी लापरवाह है। शिक्षा अधिकारी कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में उपस्थित नहीं हुए जबकि डाइट प्रबंधन ने अनेक कार्यक्रम आयोजित ही नहीं किए। डाइट कार्यालय से सूचना के अधिकार के तहत सूचना मांगने पर यह खुलासा हुआ है।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार एक अप्रेल 2008 से 30 नवम्बर 2010 के दौरान प्रशिक्षण, कार्यगोष्ठी एवं प्रसार के 474 कार्यक्रमों में 12 हजार 128 शिक्षकों, बीईईओ व एबीईईओ को बुलाया गया, लेकिन 6 हजार 75 ने ही उपस्थिति दर्ज करवाई। उधर, डाइट प्रबंधन में ढाई साल में प्रस्तावित 555 कार्यक्रमों में से 81 कार्यक्रम आयोजित नहीं किए।
क्या हैं कार्यक्रम
डाइट में प्रतिवर्ष समय-समय पर प्रशिक्षण, कार्यगोष्ठी एवं प्रसार कार्यक्रम के माध्यम से शिक्षकों तथा शिक्षा अधिकारियों को कार्यानुभव, मूल्यांकन, पाठ्य पुस्तकों की समीक्षा, क्षेत्रीय सम्पे्रषण, अध्यापन दक्षता, योजनाएं बनाने, स्कूल प्रबंधन, इनोवेटिव नॉलेज और शिक्षा की आधुनिक तकनीक की विस्तृत जानकारी एवं प्रशिक्षण दिया जाता है। जिसका लाभ अप्रत्यक्ष रूप से बच्चों को होता है। कार्यक्रम के लिए लाखों रुपए भी खर्च किए जाते हैं। जिनमें संभागियों को आने-जाने का किराया भी देय है।
एक हजार से अधिक अधिकारी लापरवाह
ब्लॉक प्रारम्भिक शिक्षा अधिकारी तथा अतिरिक्त ब्लॉक प्रारम्भिक शिक्षा अधिकारियों को उनके ब्लॉक के विद्यालयों से जुड़ीं तमाम योजनाएं बनाने एवं विद्यालयों के बेहतर संचालन के लिए विभिन्न कार्यक्रमों से लाभान्वित किया जाता है। इसके लिए एक अप्रेल 2008 से तीस नवम्बर 2010 के दौरान एक हजार 881 शिक्षा अधिकारियों को डाइट बुलाया गया परन्तु एक हजार 32 शिक्षक आनाकानी कर गए।
आंकड़ों की जुबानी
कार्यक्रम ~~~~बुलाए~~~~आए
प्रशिक्षण ~~~~८५७६~~~~ ४१८५
कार्यगोष्ठी~~~~ 2478 ~~~~१३८२
प्रसार~~~~ १०७४~~~~ ५०८
कुल ~~~~१2128 ~~~~६०७५
(आंकड़े एक अपे्रल 09 से 30 नवम्बर 10 तक)
पूरा नहीं हुआ लक्ष्य
वर्ष~~~~ प्रस्तावित~~~~ आयोजित
2008-09 ~~~~२४४~~~~२३०
2009-10 ~~~~१९४ ~~~~१७३
2010 ~~~~११७ ~~~~७१
कुल ~~~~555~~~~ 474
(कार्यक्रमों में प्रशिक्षण, कार्यगोष्ठी व प्रसार शामिल)
इनका कहना है...
यह सही है कि अनेक शिक्षक डाइट में लगाए जा रहे कार्यक्रमों को गंभीरता से नहीं ले रह हैं। कार्यक्रम में प्रस्तावित संभागियों की सूची समस्त बीईईओ को भेजते हैं। कई बार तो बीईईओ शिक्षकों को कार्यक्रम में भाग लेने के लिए पाबंद नहीं करते जबकि कई शिक्षक खुद लापरवाह हैं। कार्यक्रम समाप्ति के बाद अनुपस्थित शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई के लिए डीईओ व बीईईओ को लिखा जाता है।
-महावीर सिंघल-डाइट, प्राचार्य, चूरू
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शिक्षकों को कार्यक्रम में भाग लेने के लिए केवल आने-जाने का किराया देय है। ठहरने का भत्ता नहीं दिया जाता। ऐसे में एकाध शिक्षक कार्यक्रम से नदारद रहता है। हजारों शिक्षकों के अनुपस्थित रहने के बारे में आपने बताया है। लापरवाह शिक्षकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेंगे।
-हीरालाल आर्य, जिला शिक्षा अधिकारी(प्रारम्भिक), चूरू
Thursday, January 6, 2011
'भूगोल' मे छिपी ठण्ड की 'केमिस्ट्री'
प्रदेश के बीकानेर, श्रीगंगानगर, जैसलमेर व बाडमेर आदि जिलों की तरह चूरू भी मैदानी है। ऎसे में यहां पर सूर्य से आने वाला विकिरण धरातल से परावर्तित होकर तेजी से वायुमण्डल में चला जाता है। वायुमण्डल में जल वाष्प की अघिक मौजूदगी परावर्तित विकिरण को रोक कर तापमान बढाने में सहायक होती है। लेकिन चूरू के वायुमण्डल में मौजूद वायु शुष्क होने के कारण परावर्तित विकिरण बिना किसी रूकावट के ऊपर चला जाता है, जिससे यहां अन्य जिलों की तुलना में पारा नीचे दर्ज होता है।
प्रदेश के मरूस्थलीय जिलों में चूरू सबसे पूर्व में स्थित है। इसलिए पश्चिम से आने वाली हवाओं के साथ बालू मिट्टी के बारिक कण भी यहां आकर जमा होते हैं। ये कण आपस में पूरी तरह से जुडे रहते हैं और सूर्य के ताप को ज्यादा गहराई तक जाने से रोकते हैं। ऎसे में धरातल का ऊपरी भाग जितना जल्दी गर्म होता है उतना ही जल्दी ठण्डा हो जाता है। जिले की मिट्टी की ऊष्मा ग्रहण करने की क्षमता अन्य जिलों की तुलना में कम होेने के कारण ठण्ड के तेवर अघिक तीखे रहते हैं।
चूरू की स्थिति देशान्तरीय रूप में जम्मू कश्मीर के भागों से दक्षिण में स्थित है। उत्तरी भारत के बर्फबारी वाले क्षेत्रों से चलने वाली शीतलहर जिले में सीधी पहंुचती हैं। जो नश्तर चुभती हैं। हालांकि जम्मू-कश्मीर व चूरू के बीच प्रदेश के श्रीगंगानगर व हनुमानगढ जिले भी स्थित हैं, लेकिन यहां पर नहरी पानी की उपलब्धता के कारण आद्रüता अघिक रहती है। जिससे तापमान अमूमन शून्य से नीचे नहीं जा पाता है। चूरू से पश्चिम में बीकानेर स्थित है, परन्तु वहां अघिक प्रदूष्ाण के चलते तापमान चूरू की अपेक्षा अघिक रहता है। उधर, उत्तरी हवाओं के रास्ते से बाडमेर व जैसलमेर की दूरी ज्यादा है। ऎसे में उत्तरी हवाओं से सबसे अघिक प्रभावित चूरू ही होता है।
Tuesday, December 14, 2010
प्रशासन तक होगी सीधी पहुंच
चूरू। प्रदेश में जाति प्रमाण पत्र बनवाने से लेकर हथियार लाइसेंस के लिए आवेदन करने वाले लोगों तक को अब अधिकारी और कर्मचारियों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। जन-जन की यह परेशानी सुगम प्रोजेक्ट दूर करेगा। प्रोजेक्ट के तहत प्रदेश के जिला और तहसील स्तर पर एक-एक सुगम सेंटर खोला जाएगा। सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार विभाग ने सेंटर शुरू करने की अंतिम तिथि 31 मार्च 2011 निर्धारित की है। सेंटर पर कम्प्यूटर, प्रिंटर, स्केनर व विभिन्न प्रमाण पत्र के आवेदन फार्म उपलब्ध कराए जाएंगे। सब कुछ योजनानुसार हुआ तो आमजन की न केवल प्रशासन तक पहुंच आसान होगी बल्कि प्रमाण पत्र बनवाने में लगने वाला समय और अनावश्यक खर्च भी बचाया जा सकेगा।
प्रारूप पर नहीं उठेगी अंगुली
सुगम सेंटर शुरू होने के बाद प्रदेशभर में जाति, मूल निवास व आय समेत अनेक प्रमाण पत्र का स्टैण्डर्ड प्रारूप तय हो जाएगा। जिससे नौकरी के दौरान या अन्य कभी आवश्यकता पडऩे पर प्रमाण पत्र के प्रारूप पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकेगा। साथ ही फर्जी प्रमाण पत्र बनवाने पर भी काफी हद तक अंकुश लगेगा। फिलहाल प्रदेशभर में प्रमाण पत्रों के अलग-
अलग प्रारूप प्रचलित हैं।
जाति नहीं करा सकेगी गड़बड़ी
सुगम सेंटर पर उपलब्ध 'सुगम सॉफ्टवेयरÓ में एससी, एसटी व ओबीसी वर्ग में भारत सरकार की ओर से निर्धारित जाति एवं उनकी उप जाति की सूची फीड रहेगी। प्रमाण पत्र बनवाते समय किसी जाति विशेष के वर्ग को लेकर विवाद होने पर सूची में मिलान किया जा सकेगा। इससे गलत जाति का प्रमाण पत्र बनवाने की संभावना पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। वर्तमान में किसी वर्ग विशेष में शामिल जाति का मिलान करने के लिए कार्मिकों को काफी समय खपाना पड़ता है।
ऐसे होगा आवेदन, यूं मिलेगा प्रमाण पत्र
आवेदक को सेंटर से फार्म लेना होगा। जिस पर फार्म के साथ संलग्र किए जाने वाले अन्य दस्तावेजों की सूची भी रहेगी। फार्म जमा कराने पर आवेदक को जमा की रसीद या नम्बर देने के साथ ही भविष्य में सेंटर पर आकर प्रमाण पत्र प्राप्त का दिन और समय भी बताया जाएगा। प्रमाण पत्र पर संबंधित अधिकारियों के हस्ताक्षर एवं मोहर लगवाने का काम सेंटर अपने स्तर पर पूरा करेगा।
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प्रदेश के एकाध जिले में सुगम प्रोजेक्ट चल रहा है, मगर तहसील स्तर पर सेंटर पहली बार बना रहे हैं। जिला कलक्टरों को इस संबंध में दिशा-निर्देश दिए जा रहे हैं। जाति, मूल निवास, राशन कार्ड व लाइसेंस बनवाने समेत अनेक सुविधाएं सेंटर पर उपलब्ध करवाई जाएगी। जिला कलक्टर स्व विवेक से सेंटर पर अन्य सुविधाएं बढ़ा भी सकेंगे।
-संजय मलहोत्रा, सचिव व आयुक्त
सूचना प्रौद्योगिकी एवं संचार विभाग
जिला व तहसील स्तर पर सुगम सेंटर स्थापित करने के लिए कार्य शुरू कर दिया है। एक अप्रेल से हर हाल में लोगों को इनका लाभ मिलने लगेगा। सेंटर से संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। फिलहाल भवन की तलाश व अन्य संसाधन जुटाए जा रहे हैं।
-विकास एस भाले, जिला कलक्टर, चूरू
Tuesday, December 7, 2010
कल्याण की राह में अधिकारी रोड़ा
चूरू। शहीदों की शहादत पर गर्व महसूस करने वाले अधिकारी ही उनके परिवार और आश्रितों के कल्याण की राह में बाधा बने हुए हैं। बात भले ही गले नहीं उतर रही हो, परन्तु सरकारी कार्यालयों में धूल फांकते सशस्त्र सेना झण्डा दिवस के स्टीकर और ध्वज देख इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। आलम यह है कि अधिकांश अधिकारी शहीदों के आश्रितों को संभल प्रदान करने मेंं कतई गंभीर नहीं है। झण्डा दिवस के मौके पर पत्रिका टीम ने जिला सैनिक कल्याण अधिकारी कार्यालय के रिकॉर्ड खंगाले तब अधिकारियों का यह दूसरा चेहरा सामने आया।
जिलेभर में 63 अधिकारी शहीदों के आश्रितों के कल्याण के 11 लाख 62 हजार 750 रुपयों पर कुंडली मारे बैठे हैं। अधिकारियों को इस राशि के स्टीकर और ध्वज 1996 से 2009 के दौरान वितरित किए गए थे। ऐसे में अधिकारियों के भरोसे शहीदों के परिवारों का मनोबल बढ़ाने की सोचना बेमानी होगा। हालांकि प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी जिलेभर के 96 अधिकारियों को 100 से 6000 स्टीकर व ध्वज वितरित किए जाएंगे। लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ अगर कोई कदम नहीं उठाया गया तो इस साल के स्टीकरों और ध्वज को भी सरकारी कार्यालयों में धूल फांकने में देर नहीं लगेगी।
बढ़ता बकाया का आंकड़ा
वर्ष ------बकाया
1996------ 2000
1997------ 2000
1998------ 500
1999------ 2300
2000------ 1200
2001------ 400
2003------ 13000
2004------ 3000
2005------ 5700
2006------ 26920
2007------ 43600
2008------ 476800
2009------ 585330
कुल------ 11,62,750
सर्वाधिक लापरवाह डीटीओ
कल्याण की राह में रोड़ा बनने वाले अधिकारियों में बकाया के लिहाज से जिला परिवहन अधिकारी पहले पायदान पर हैं। डीटीओ पर वर्ष 2008 के एक लाख 97 हजार रुपए तथा वर्ष 2009 के दो लाख 25 हजार रुपए बकाया हैं। पीएचईडी के एसई व एसपी पर बकाया का आंकड़ा एक लाख को पार कर चुका है। बकाया के मामले में अन्य अधिकारियों की स्थिति भी ज्यादा अच्छी नहीं है।
क्या झण्डा दिवस
देश की आन, बान और शान के लिए जान की बाजी लगाने वाले शहीद की याद और सेवारत सैनिकों के साथ राष्ट्र की एकजुटता दर्शाने के उदे्श्य से प्रतिवर्ष सात दिसम्बर को देशभर में झण्डा दिवस मनाया जाता है। इस दिन विभिन्न विभागों को विशेष प्रकार के ध्वज व स्टीकर वितरित किए जाते हैं। जिन्हें वाहनों पर लगाकर या जन समूह को वितरित कर राशि जुटाई जाती है। यह राशि जिला सैनिक कल्याण कार्यालय के माध्यम से अमल गमैटेड फण्ड में भेजी जाती है। जिसका उपयोग युद्ध विकलांग एवं शहीदों के परिवारों का पुर्नवास, सेवानिवृत व सेवारत सैनिकों एवं उनके परिवारों के लिए संचालित कल्याणकारी योजनाओं में किया जाता है।
यूं जमा होगी राशि
इस वर्ष प्रति स्टीकर दस रुपए तथा प्रति वाहन पताका (ध्वज) पचास रुपए निर्धारित किए गए हैं। स्टीकर व ध्वज से एकत्रित की गई राशि अधिकारियों को नकद, ड्राफ्ट या चेक के माध्यम से जिला सैनिक कल्याण अधिकारी कार्यालय में जनवरी तक जमा करानी होगी।
अधिकारियों के वेतन में से काटेंगेइस वर्ष स्टीकर एवं ध्वज का वितरण करने के एक माह ही इसकी समीक्षा की जाएगी। वर्षों पुराने बकाया की भरपाई संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों के वेतन में से काटकर करेंगे। इस बार बचे हुए स्टीकर व ध्वज को कार्यालय में रखने की बजाय सैनिक कल्याण अधिकारी कार्यालय वापस लौटा देंगे।
-विकास एस भाले, जिला कलक्टर एवं जिला सैनिक बोर्ड के अध्यक्ष, चूरू
Monday, December 6, 2010
घर छोटा परिवार बढ़ा
चूरू। काले हिरणों के विश्व प्रसिद्ध तालछापर अभयारण्य वर्षों से अपने विस्तार को तरस रहा है। अभयारण्य में हिरणों का कुनबा लगातार बढ़ता जा रहा है, मगर क्षेत्रफल जस का तस है। स्थिति यह है कि यहां पर हिरणों की संख्या क्षमता से दोगुनी अधिक है। यही वजह है कि भोजन तलाश एवं स्वच्छंद विचरण के लिए अभयारण्य सीमा से बाहर निकलकर कई हिरण अकाल मौत का शिकार हो रहे हैं। वन विभाग पिछले तीन वर्ष से अभयारण्य के विस्तार का प्रयास कर रहा है, परन्तु प्रशासनिक शिथिलता और राज्य सरकार की अनदेखी के चलते योजना को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है। जिम्मेदार जनप्रतिनिधि भी इस कार्य में रुचि लेते नहीं दिख रहे हैं।
वन विभाग अभयारण्य की दक्षिणी-पश्चिमी से सटी से सरकारी भूमि को अभयारण्य में मिलाकर इसके विस्तार का प्रयास कर रहा है। लगभग चार सौ हैक्टेयर में फैली इस भूमि पर नमक की 34 इकाइयां स्थापित हैं। इनमें से 10 इकाइयों के पट्टे निरस्त कर दिए गए हैं जबकि दो इकाइयां बंद हैं। अभयारण्य के विकास को लेकर होने वाली बैठकों में यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया जाता रहा है। इस साल 24 जून को जिला कलक्टर की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में जिला उद्योग केन्द्र के महाप्रबंधक नमक की आठ इकाइयों की भूमि, जिस पर कोई नहीं की वजह से वन विभाग को सौंपे जाने की सहमति जता चुके हैं। इसी बैठक में सुजानगढ़ के तहसीलदार ने अभयारण्य के विस्तार के लिए नमक की शेष इकाइयों के पट्टों का नवीनीकरण रोकने तथा पट्टाधारियों को नावा या अन्यत्र क्षेत्र में स्थानांनतरित करने का सुझाव दिया था। आधिकारिक सूत्रों की मानें तो अभयारण्य के विस्तार का प्रस्ताव और नमक इकाइयों के सर्वे की रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी हुई है। लेकिन सरकार अभी तक इस मुदद्े को गंभीरता से नहीं लिया है।
यूं बढ़ेगा क्षेत्रफल
तालछापर अभयारण्य 719 हैक्टेयर में फैला हुआ है। नमक इकाइयों की लगभग 16 सौ बीघा भूमि मिलने पर अभयारण्य का क्षेत्रफल तकरीबन चार सौ हैक्टेयर बढ़कर एक हजार 119 हैक्टेयर हो सकता है। वन विशेषज्ञों के मुताबिक एक हिरण को स्वच्छंद विचरण करने के लिए करीब एक हैक्टेयर क्षेत्रफल की आश्यकता होती है। हालांकि इस लिहाज यह क्षेत्रफल भी पर्याप्त नहीं कहा जा सकता।
इसलिए विस्तार जरूरी
-हिरणों को स्वच्छंद विचरण के लिए मिलेगा अधिक क्षेत्र।
-चारागाह विकसित कर प्राकृतिक चारे की कमी दूरी होगी।
-मीठे पानी के जलस्रोतों की संख्या में होगा इजाफा।
-हिरणों का नमक इकाइयों के गड्ढ़ों में गिरना बंद होगा।
-आवारा कुत्तों व शिकारियों से अधिक सुरक्षित होंगे हिरण।
साल दर साल बढ़ते हिरण
चूरू जिले की सुजानगढ़ तहसील के छापर कस्बे में स्थित अभयारण्य में हिरणों का कुनबा तेजी से बढ़ रहा है। अपे्रल 2010 में की गई वन्यजीव गणना के मुताबिक अभयारण्य में हिरणों की संख्या एक हजार 910 से बढ़कर दो हजार 25 हो गई है। हिरणों की संख्या अधिक बढ़ सकती थी, मगर बीते दो वर्ष के दौरान तेज अंधड़ व बारिश की वजह से तकरीबन सौ हिरण अकाल मौत का शिकार हो गए थे। अभयारण्य के विस्तार की आवश्यकता सात-आठ वर्ष पूर्व ही महसूस की जाने लगी थी, परन्तु इस दिशा में तीन वर्ष पूर्व कदम बढ़ाए गए हैं।
जसवंतगढ़ में भी तलाशी जगह
हिरणों की संख्या बढऩे के साथ-साथ अभयारण्य के विस्तार का दबाव भी बढ़ता जा रहा है। ्रऐसे में वन विभाग ने नागौर जिले की लाडऩूं तहसील के जसवंतगढ़ कस्बे में हिरणों के लिए अनुकूल जगह तलाशी है। यहां पर तकरीबन पांच सौ हिरण स्थानांनतरित करने की योजना पर विचार किया जा रहा है, लेकिन वहां भारी मात्रा में जूली फ्लोरा होना योजना की राह में
सबसे बड़ी बाधा है।
कुरजां भी हैं पहचान
तालछापर में काले हिरणों के अलावा कुरजां, जंगली बिल्ली, मरु लोमड़ी, साण्डा, गिद्धसमेत अन्य कई वन्यजीव पाए जाते हैं। सात समंदर पार से हर साल सैकड़ों की संख्या में आने वाली कुरजां भी अभयारण्य की पहचान हैं। कुरजां यहां पर अक्टूबर-मार्च तक शीतकालीन प्रवास करती हैं। इस वर्ष अभयारण्य में विश्व स्तर पर संकटग्रस्त पक्षी सोशिएबल लैप विंग भी नजर आया था।
इनका कहना है...
तालछापर में हिरणों की संख्या क्षमता से अधिक हो जाने के कारण गत तीन वर्ष से इसके विस्तार का प्रयास कर रहे हैं, मगर अभी तक सफलता नहीं मिली है। अभयारण्य के पास स्थित सरकारी भूमि को अधिगृहित करने के मामले के निर्णय राज्य सरकार के स्तर पर होना है। जिला प्रशासन, जिला उद्योग केन्द्र व राज्य सरकार को समय-समय पर पत्र लिखते रहते हैं, मगर अभयारण्य का विस्तार कब होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। इसके अलावा लाडनूं के जसवंतगढ़ के पास हिरणों के लिए अनुकूल जगह तलाशी है।
-केसी शर्मा, उप वन संरक्षक, चूरू
नमक इकाइयों का सर्वे करके रिपोर्ट विभाग के उच्चाधिकारियों को सौंप दी है। कुल 34 इकाइयों में से 22 कार्यरत हैं। कइयों के मामले न्यायालय में विचारधीन हैं। उक्त भूमि को अभयारण्य में मिलाए जाने का निर्णय उच्च स्तर पर होना है।
-जितेन्द्र सिंह शेखावत, जिला उद्योग अधिकारी, सुजानगढ़
Sunday, December 5, 2010
'खाकी' के सामने बेबस है 'करंट'
Monday, November 29, 2010
पानी की चाबी अब 'टाइमर' के पास
अत्याधुनिक तकनीकी से निर्मित टाइमर लगने के बाद कुएं और नलकूप अपने आप संचालित होंगे। इन्हें चालू या बंद करने के लिए ना तो पीएचईडी के कर्मचारियों को रातभर जगना पडेगा और ना ही घरों में रात को बिना आवश्यकता के जलापूर्ति होगी।
उपभोक्ताओं से पूछेंगे टाइम
शहर में पीएचईडी के लगभग सौ जलस्त्रोत संचालित हैं। स्टाफ की कमी या कार्मिकों की लापरवाही की वजह से अघिकांश जलस्त्रोत ना तो समय पर चालू हो पाते हैं ना ही बंद। कई जलस्त्रोत चौबीस घंटे चालू रहते हैं, जिनका पानी नलों के जरिए नालियों में व्यर्थ बह जाता है। विभागीय अभियंताओं की मानें तो जलस्त्रोत पर लगाए जाने वाले टाइमर में जलापूर्ति शुरू या बंद करने का समय उससे जुडे उपभोक्ताओं से राय-मशविरा करके सेट किया जाएगा। ताकि विभाग और उपभोक्ता के बीच तालमेल बना रहे।
यूं करता है काम
टाइमर की साइज मोबाइल से थोडी बडी है। इसेकुएं या नलकूप के पम्प को संचालित करने वाले पैनल बोर्ड के साथ लगाया जाएगा। जिससे पम्प को चालू या बंद करने वाले स्टार्टर पर टाइमर का पूरा नियंत्रण हो सके। खास बात यह है कि टाइमर में पम्प को चालू या बंद करने का समय पूर्व में निर्घारित किया जा सकेगा। निर्घारित समय पर बिना किसी व्यक्ति की मदद से पम्प स्वत: चालू या बंद हो जाएगा। टाइमर में एक बार टाइम सेट करने पर लम्बे समय तक बदलने की जरूरत नहीं पडेगी। हालांकि आवश्यकता पडने पर टाइमर के समय में कभी भी फेरबदल किया जा सकेगा।
शुरूआत में दो, बाद में पचास
विभाग ने चूरू के चांदनी चौक व गढ के पास स्थित नलकूप पर टाइमर लगाकर योजना की शुरूआत कर दी है। शहर के नौ तथा ग्रामीण क्षेत्र के दो जलस्त्रोतों पर भी जल्द ही टाइमर लगेगा। फिलहाल जलस्त्रोत चिह्नित किए जा रहे हैं। उन जलस्त्रोतों को प्राथमिकता दी जा रही है, जहां पानी अघिक व्यर्थ बहता हो। आगामी दो माह के दौरान कुल पचास जलस्त्रोतों पर टाइमर लगाया जाएगा।
ये भी होंगे फायदे
टाइमर का सबसे बडा फायदा पानी को व्यर्थ बहने से रोकना होगा। जलस्त्रोत चालू या बंद करने में लगा स्टाफ विभाग के अन्य कार्यो में काम लिया जा सकेगा। इसके साथ चौबीसों घंटे जलस्त्रोत चलने की वजह से मोटर जलने तथा पेयजल टंकियां ओवर फ्लो होने की समस्या भी अब नहीं रहेगी।
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पानी व बिजली की बचत तथा स्टाफ की कमी को दूर करने के लिए शहर में विभाग के जलस्त्रोतों पर पहली बार टाइमर लगा रहे हैं। पहले दिन दो जगह टाइमर लगाए हैं। आगामी दो माह में पचास जलस्त्रोत पर टाइमर लगाएंगे। -अम्बिका प्रसाद तिवाडी, एक्सईएन, पीएचईडी
Sunday, November 14, 2010
तालछापर में नजर आया दुर्लभ पक्षी
कजाकिस्तान से शीतकालीन प्रवास पर भारत के सूखी घास और सूखे मैदानी इलाकों में आने वाला यह पक्षी इस बार देशभर में सबसे पहले तालछापर में नजर आया है। फिलहाल अभयारण्य में ऎसे पांच पक्षी विचरण करते देखे जासकते हैं। रेड डेटा बुक में लुप्तप्राय प्रजातियों में शामिल सोशिएबल लैप विंग अभयारण्य में 12 साल बाद पहुंची है। अभयारण्य के रिकॉर्ड के मुताबिक इससे पूर्व 1998 में इसने अभयारण्य में पहुंचकर सर्दियां गुजारी थी। एक दशक से अधिक लम्बे अंतराल के बाद इसके यहां दुबारा आगमन को वन अधिकारी अभयारण्य के बदलते वातावरण के लिए शुभ संकेत मान रहे हैं।दुनिया भर में सिमटी संख्या
इण्डियन बर्ड्स कन्जर्वेशन नेटवर्क के स्टेट कोऑर्डिनेटर सुरेश चन्द्र शर्मा के अनुसार रेड डाटा बुक में विश्व में सोशिएबल लैप विंग की संख्या काफी कम बताई गई है। भारत में गुजरात का कुछ हिस्सा और सम्पूर्ण राजस्थान में इनके आवास के अनुकूल वातावरण है। मगर दोनों प्रदेशों में लम्बे समय से इनके दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। राजस्थान में मुख्य रूप से तालछापर, केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान व अन्य छोटे दलदली क्षेत्रों में यह पक्षी कभी-कभार ही दिखाई देता है।
बड़ा शर्मिला पक्षी
लगभग तीस सेंटीमीटर लम्बा यह पक्षी बड़ा शर्मिला है। सफेद भौंहे, सिर पर चमक और पेट पर काला व मेहरून धब्बा इसकी खास पहचान है। इस मेहमान पक्षी का मुख्य भोजन कीड़े-मकोड़े हैं। कजाकिस्तान में बर्फ गिरने के कारण अक्टूबर में शीतकालीन प्रवास के लिए यह अफगानिस्तान होता हुआ तालछापर पहुंचा है। यहां पर यह पक्षी मार्च तक प्रवास करेगा।
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-हरकीरत सिंह सांगा, वन्यजीव विशेषज्ञ
तालछापर अभयारण्य में सात रोज पूर्व ही सोशिएबल लैप विंग नजर आई है।इससे पूर्व इसे अभयारण्य में 1998 में देखा गया था। रेड डाटा बुक में शामिल इस पक्षी का एक दशक बाद यहां पहुंचना अभयारण्य के वातावरण तथा पक्षी संवर्द्धन के लिहाज से अच्छा संकेत है।
-सूरत सिंह पूनिया, क्षेत्रीय वन अधिकारी, तालछापर
अभयारण्य में प्रवासी पक्षियों के प्राकृतिक आवास को बढ़ावा देने के लिए लम्बे समय से अनेक काम किए जा रहे हैं। यही वजह है विश्वभर में दुर्लभ पक्षी मानी जा रही सोशिएबल लैप विंग यहां नजर आई है।
-केसी शर्मा, डीएफओ, चूरू
फाइलों में अटके सामुदायिक कुण्ड
चूरू। सामूहिक प्रयासों से बड़े कुण्ड बनाकर धोरों को हरा-भरा करने की सामुदायिक कुण्ड निर्माण योजना दो साल से फाइलों में अटकी हुई है। योजना में लाखों रुपए के अनुदान का प्रावधान होने के बावजूद जिले में एक भी कुण्ड नहीं बन पाया है।
आधिकारिक जानकारी के अनुसार चालू वित्तीय वर्ष में 12 कुण्ड बनाए जाने का लक्ष्य है, परन्तु अभी तक सात ही समूहों ने आवेदन किया है। फिलहाल इन्हीं समूहों के आवेदनों को भी अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। ऐसे में इस बार तय लक्ष्य निर्धारित समय में हासिल होने की सोचना बेमानी होगी।
योजना के तहत कम से कम पांच किसानों को मिलकर सामुदायिक कुण्ड निर्माण के लिए आवेदन करना होता है। 50 मीटर लम्बा व इतना ही चौड़ा और तीन मीटर गहरा कुण्ड बनाने पर राज्य सरकार की ओर से साढ़े सात लाख रुपए का अनुदान उपलब्ध करवाया जाता है। शेष राशि किसान समूह को मजदूरी जैसे मिट्टी खुदाई करके वहन करनी होती है।
इस साल बदले प्रावधान
विभागीय जानकारी के अनुसार पहले वर्ष योजना के तहत अनुदान की राशि तथा कुण्ड की लम्बाई-चौड़ाई दोगुनी थी। जिले की भौगोलिक स्थिति व बारिश की कमी की वजह से इतना बड़ा कुण्ड बन पाना संभव नहीं हुआ। ऐसे में इस वर्ष 12 अक्टूबर को योजना की अनुदान राशि व कुण्ड की साइज में घटाई गई है।
इन्होंने किया आवेदन
कुण्ड निर्माण के लिए गांव परसनेऊ के रामरख मेघवाल, दांदू के जगदीश मेघवाल, पृथ्वीराज मेघवाल व औंकार मेघवाल, बास जैसे का के चूनाराम जाट, ढाणी रणवा के भंवर लाल तथा खण्डवा के अम्मीलाल बुरड़क ने आवेदन किया है।
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चालू वित्तीय वर्ष के दौरान जिले में 12 कुण्ड बनाए जाने हैं। फिलहाल सात आवेदन प्राप्त हुए हैं। आवेदन के आधार पर किसानों का चयन किया जा रहा है। निर्धारित समय में कुण्ड निर्माण का लक्ष्य प्राप्त करने के पूरे प्रयास कर रहे हैं।
-डॉ. होशियार सिंह, उप निदेशक, कृषि विभाग, चूरू
Saturday, November 13, 2010
बिजली होगी अधिक 'दबंग'
चूरू। जोधपुर विद्युत वितरण निगम ने चूरू सर्किल के ग्रामीण इलाकों की बिजली में नई जान फूंकने वाले तंत्र पर काम करना शुरू कर दिया है। इसके लिए ग्रिड सब स्टेशनों (जीएसएस) की संख्या बढ़ाने के साथ ही 11केवी के लम्बे फीडरों के बीच की दूरी घटाई जाएगी। यही नहीं बल्कि अब प्रत्येक ग्राम पंचायत का अपना अलग फीडर भी होगा। यह सब ग्राम पंचायत विद्युत वितरण योजना के तहत होगा। सब कुछ योजनानुसार हुआ तो जल्द ही बिजली वर्तमान की तुलना में अधिक 'दबंग' हो जाएगी। गांवों को चौबीस घंटे थ्री फेज बिजली मिल सकेगी। फिलहाल गांवों को कृषि कनेक्शनों की तर्ज पर छह से आठ घंटे तक ही थ्री फेज बिजली मिल रही है।

चालू वित्तीय वर्ष से शुरू हुई इस योजना के तहत सर्किल की प्रत्येक तीन ग्राम पंचायतों पर एक-एक 33 केवी जीएसएस स्थापित होगा। चूरू जिले की कुल 249 व लाडऩू उपखण्ड की 32 ग्राम पंचायतों को ध्यान में रखते हुए 43 जीएसएस स्वीकृत किए गए हैं। इनमें से चालू वित्तीय वर्ष के अंत तक 26 जीएसएस स्थापित किए जाने की उम्मीद है। शेष जीएसएस का काम इनके बाद पूरा किया जाएगा।
योजना के तहत 11केवी के लम्बी दूरी वाले फीडरों की दूरी घटाई जाएगी। दो फीडरों के बीच नए खम्भे लगाएंगे। इससे गांवों में ढीले तारों की समस्या नहीं रहेगी। छीजत घटने के साथ ही विद्युत व्यवधान भी कम हो जाएगा।
ब्लॉक --------गांव
चूरू के चलकोई बीकान
तारानगर के राजपुरा, धीरवास बड़ा, आनंदसिंहपुरा, मिखाला, झाड़सर कांधलान, लूणास व रैयाटुण्डा
राजगढ़ के चैनपुरा छोटा, राघा बड़ी व ढढ़ाल लेखू
सरदारशहर के रामसीसर, खींवणसर, बुकनसर, बिल्यूबास व मालसर
रतनगढ़ के नौसरिया, गौरीसर व बछरारा
सुजानगढ़ के शोभासर, रणधीसर व लोडसर
लाडनूं के मिठड़ी, बलदू, जसवंतगढ़ व रोडू
(शेष 17 जीएसएस अगले वित्तीय वर्ष में स्थापित होंगे।)
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नई योजना के तहत सर्किल में 43 जीएसएस की स्वीकृति मिली है। जल्द ही काम शुरू होगा। इसके बाद तीन पंचायतों पर एक जीएसएस हो जाएगा। साथ ही प्रत्येक ग्राम पंचायत को अपना अलग फीडर भी स्थापित करेंगे।
-केएल गुगरवाल, एसई, जेवीवीएनएल, चूरू
Wednesday, November 10, 2010
कमाल की कृष्णा
किस तरह पहुंचीं इस मंजिल तक?
एक शादी समारोह में मेरे पिता की वीरेंद्रजी से मुलाकात हुई। उस दौरान वीरेंद्र देश के टॉप एथलीट्स में से एक थे। पहली बार में ही पिता ने उनको मेरे लिए पसंद कर लिया। मैं फाइनल ईयर में आई तो हमारी शादी हो गई। मेरी हाइट और पर्सनेलिटी को देखकर वीरेंद्र ने शादी के बाद खेल जारी रखने की इच्छा जाननी चाही। मैंने बिना कुछ सोचे-समझे हां कर दी। इसके बाद मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
पति ही आपके कोच हैं। कैसे तालमेल बिठाते हैं? घर पर किसकी चलती है?
दूसरी महिला खिलाडियों की तुलना में खुद को अधिक खुशनसीब मानती हूं। खेल के मैदान में पहुंचते ही हमारा रिश्ता बदल जाता है। हम पति-पत्नी की बजाय कोच और खिलाड़ी की तरह एक-दूसरे के साथ व्यवहार करते हैं। लेकिन मैदान के बाहर हमारे बीच एक अलग तरह का प्यारभरा रिश्ता है। मैदान में वीरेंद्र कोच के रूप में डांटते-फटकारते हैं तो घर पर पति का फर्ज भी बखूबी निभाते हैं। प्रशिक्षण के दौरान मेरी तकनीकी खामियों को लेकर अक्सर गुस्सा करते हैं, पर मैंने कभी बुरा नहीं माना। क्योंकि उस वक्त वे पति नहीं, बल्कि कोच की भूमिका निभा रहे होते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि हमने मैदान की बातों को कभी घरेलू जिंदगी में नहीं आने दिया।
प्रशिक्षण के वक्त पति के साथ का रोमांचक वाकया?
प्रशिक्षण के समय हम दोनों में छोटा-मोटा मजाक तो चलता रहता है। वैसे हम अलग तरह के रिजर्व नेचर के कपल हैं। पति में हमेशा से ही मैच्योरिटी रही है। वे ना तो अधिक गंभीर रहते हैं और ना ही लापरवाह। हमने अपना दायरा तय कर रखा है और उसी में रहकर खुद को पूरी तरह एंजॉय करते हैं। दोनों को ही बड़ी पार्टियां अच्छी नहीं लगतीं, पर घर पर अपनों के बीच समय बिताने का कभी कोई मौका नहीं छोड़ते।
बचपन की कोई याद?
मैं शुरू से संयुक्त परिवार में रही। बचपन में खूब मस्ती करते थे। घर में 200 भैंसें हुआ करती थीं। घर पर उनका दूध निकालती थी, बड़ा मजा आता था।
बेटे लक्ष्यराज को अकेला छोड़कर प्रेक्टिस करना... कितना मुश्किल रहा?
बेटे से दूर जाने का मन नहीं करता, पर खेल के लिए सब कुछ करना पड़ता है। पर खुशी इस बात की है कि लक्ष्यराज संयुक्त परिवार में रहकर संस्कार सीख रहा है। वह अपनी दादी और चाची के पास भी बड़ा खुश रहता है।
खाली समय में क्या करती हैं?
मुझे पढ़ना पसंद है। प्रेक्टिस और घरेलू कामों के बाद समय मिलता है तो गीता, रामायण जैसी धार्मिक पुस्तकें पढ़ती हूं।
मैं हूं ऑलराउंडर
अपने आप को सेलिब्रिटी या आम गृहिणी की बजाय ऑलराउंडर कहना चाहूंगी। एक ऎसी ऑलराउंडर जो खेल, घर-परिवार और रेलवे की डयूटी को बखूबी पूरा करती हूं। जब घर पर होती हूं तो खाना बनाने और कपड़े धुलाने से लेकर बर्तन तक साफ करवा देती हूं। यह सब देख सास और देवरानियां मुझे घरेलू काम करने की बजाय आराम करके प्रशिक्षण की थकान मिटाने की सलाह देती नहीं थकतीं।
घर वालों का प्यार
देवर सतीश, विनोद और देवरानी ओम और राजबाला ने मेरे बेटे लक्ष्यराज को मम्मी-पापा का प्यार दिया। यही वजह है कि बेटे को एक वर्ष का छोड़कर मैं तैयारियो में जुट गई थी। 2004 के बाद तो साल-साल भर तक बेटे से दूर रही। बेटे के स्कूल में पैरेंट्स मीटिंग में कभी नहीं जा पाई, मगर देवर-देवरानियों ने कभी मेरी कमी महसूस नहीं होने दी। इसी वजह से मैंने बेटे की चिंता किए बगैर दिन-रात खेल पर ध्यान दिया। रही बात सास के रवैये कि तो यही कहूंगी कि उनके कोई बेटी नहीं है और मैंने बचपन में अपनी मां को खो दिया था। अब सास के रूप में मुझे मां और उन्हें मेरी जैसी बेटी मिल गई है। हमारा परिवार संयुक्त होने के बावजूद मुझे कभी किसी से गिला-शिकवा नहीं रहा। घर के प्रत्येक सदस्य का रवैया कुछ ऎसा है कि लगता है मैं ससुराल नहीं,बल्कि अभी भी मायके में ही रह रही हूं।